लेखक परिचय

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

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-संजय द्विवेदी

दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम में भाजपा की पराजय की चर्चा हर जुबान पर है। जाहिर तौर पर इस हार ने भाजपा के अश्वमेघ के अश्व को रोक दिया है और नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी के जलवे में भी कमी आई है। दिल्ली का चुनाव सही मायने में बहुत छोटा चुनाव है, किंतु इसके संदेश बहुत बड़े हैं। मुंबई के मेयर से ज्यादा दिल्ली के मुख्यमंत्री का न कार्यक्षेत्र है, न ही बजट। किंतु राज्य तो राज्य है और महापालिका एक छोटी इकाई है। दिल्ली के चुनाव दरअसल जिस वातावरण और हाईपिच पर लड़ा गया, उसने इस छोटे से राज्य की राजनीतिक महत्ता को बहुत बढ़ा दिया है।

अप्रासंगिक कांग्रेसः

आंदोलन से उपजी एक पार्टी के सामने दोनों राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का जो हाल हुआ, उसके सदमे से उबर पाना दोनों के लिए आसान नहीं होगा। पंद्रह साल तक दिल्ली में राज करने वाली कांग्रेस का खाता भी न खुलना और भाजपा का तीन सीटों पर सिमट जाना कोई साधारण सूचना नहीं है। यह बात बताती है कि जनता के बीच किस तरह हमारे राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की हैसियत दिल्ली के अंदर घटी है। जहां तक कांग्रेस की बात है वह दिल्ली के चुनावों में अप्रासंगिक हो चुकी थी। अपने परंपरागत वोट प्रतिशत को भी वह, आप के खाते में जाने से रोक नहीं पाई। वहीं दिल्ली में भाजपा की हार के जो मोटे कारण समझ में आते हैं, वह सब लोगों की समझ में हैं। पता नहीं क्यों यह बात भाजपा का आलाकमान नहीं समझ सका।

काडर की नाराजगीः

भाजपा एक काडर बेस पार्टी है। सालों साल से उसके कार्यकर्ता और संघ परिवार के समविचारी संगठन उसका वोट आधार हैं। यह काडर इस चुनाव में अपने नेताओं के फैसलों से हैरान दिखा। दिल्ली एक बिखरा हुआ राज्य नहीं है, वह एक इकाई है और एक सरीखा सोचती है। वह इतनी बड़ी भी नहीं कि एक जगह का प्रभाव दूसरी जगह न पड़े। दिल्ली भाजपा की उपेक्षा इस चुनाव का सबसे बड़ा कारण है। इसकी शुरूआत हुई दिल्ली भाजपा के सबसे प्रमुख चेहरे डा. हर्षवर्धन के स्वास्थ्य मंत्रालय से हटाए जाने से। यह क्रम जारी रहा। आयातित नेताओं को टिकट देना, मुख्यमंत्री का प्रत्याशी भी आयात करना और स्थानीय नेताओं को घर बिठाना। यहां तक की दिल्ली भाजपा अध्यक्ष सतीश उपाध्याय खुद भी टिकट नहीं ले पाए। लेकिन कृष्णा तीरथ और विनोद कुमार बिन्नी जैसों को घर बैठे टिकट मिल गया। यह उत्तर प्रदेश जैसा राज्य नहीं कि पूरब की घटनाएं पश्चिम को, पूर्वांचल की घटनाएं बुंदेलखंड और रूहेलखंड को प्रभावित न करें। एक इकाई होने के नाते चीजों को होता हुआ देखकर कार्यकर्ता अवाक थे किंतु कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे। मीडिया और पैसे के रूतबे की सवारी गांठ रहे आलाकमान के पास कार्यकर्ताओं को सुनने-गुनने का अवकाश भी नहीं था। कई राज्यों की विजय ने उनके चुनावी प्रबंधन के कौशल को स्थापित कर दिया था। यानी कार्यशैली पर सवाल नहीं उठ सकते थे, क्योंकि सफलता साथ-साथ थी। यह अकेली बात कार्यकर्ताओं को अवसाद में डाल चुकी थी।

भाजपा और संघ परिवार के कार्यकर्ता आज भी भावनात्मक आधार पर कार्य करने वाला समूह है, यहां यह कहने में संकोच नहीं है कि वे राजनीतिक रूप से उतना विचार नहीं करते। राजनीतिक तरीके से चीजों को न सोचने के कारण वे भावनात्मक आधार पर फैसले करते हैं, जिसका भाजपा को अकसर नुकसान उठाना पड़ता है। ऐसे में निराशा की स्थिति में वे घर बैठना पसंद करते हैं। दिल्ली में जहां आप के कार्यकर्ता राजनीतिक रूप से प्रशिक्षित और आक्रामक थे, घर-घर संवाद कर रहे थे। वहीं भाजपा का कार्यकर्ता चुनाव के करीब आते-आते उदासीन होता गया। चुनाव जब प्रारंभ हुए उस समय का टेम्पो भी भाजपा अंत तक कायम नहीं रख सकी। भाजपा का पूरा चुनाव अभियान मीडिया शोर, साधनों की बहुलता और देश भर के सांसदों, संगठन की सक्रियता के बावजूद, इसी उदासीनता का शिकार हो गया। शायद यह पहली बार था जब ‘टीम मोदी’ को पराजय हाथ लगी है। यह संवाद आम है कि मोदी-शाह-जेटली ही भाजपा बन गए हैं और भाजपा का शेष नेतृत्व स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहा है। चुनावी प्रबंधन, धनशक्ति, दल से बड़ी होती हुई दिखती है। जाहिर तौर पर दिल्ली के चुनावों को इससे अलग करके देखना संभव नहीं है।

आक्रामक और शब्द की हिंसा से भरा चुनावः

कहते हैं दूध का जला छांछ भी फूंक-फूंक कर पीता है। अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम जहां सीधे संपर्क, संवाद और बातचीत में संयम का परिचय दे रही थी, वहीं भाजपा का प्रचार अभियान आक्रामक और शब्द की हिंसा से भरा था। लोकतंत्र में हिस्सा ले रहे लोग नक्सली हैं या बदनसीब हैं, यह बात समझ से परे है। फिर अरविंद केजरीवाल ने उपद्रवी गोत्र को जिस तरह व्याख्यायित किया, वह बात भी भाजपा के खिलाफ गयी। विज्ञापनों में अन्ना की फोटो पर माला, केजरीवाल के परिवार का जिक्र, सब उल्टे पड़े। केजरीवाल एक ऐसे बेचारे की तरह प्रस्तुत होने लगे जैसे भारत की सरकार ने दिल्ली के लोगों पर हमला कर दिया हो। गुजराती अस्मिता की बात करनेवाले प्रधानमंत्री इस बात को गहरे समझ रहे होंगे। बाहरी लोगों, बाहरी ताकतों और बाहरी नेताओं ने इस पूरे चुनाव में भाजपा की एक बड़ी पराजय की भूमिका तैयार की। इस चुनाव में लालकृष्ण आडवानी से लेकर विजय कुमार मल्होत्रा जैसे नेताओं की भूमिका क्या थी? यह भी सवाल पूछे जा रहे हैं। जबकि ऐसे नेता दिल्ली की रगों को जानते हैं, पहचानते हैं। क्योंकि इन सबने नगर निगम से लेकर लोकसभा की राजनीति इसी शहर में की है।

हारे को हरिनामः

अब जबकि भाजपा यह चुनाव हार चुकी है। भाजपा के ताकतवर समूह के सामने चुप रहने वाले लोग भी आवाजें जरूर उठाएंगे। प्रधानमंत्री ने इस चुनाव में स्वयं को झोंककर खुद इस चुनाव को मोदी बनाम केजरीवाल में बदल दिया था। इससे पार्टी यह भले कहती रहे कि यह मोदी की हार नहीं है, इसके कोई मायने नहीं हैं। सच्चाई यह है कि दिल्ली के लोग भाजपा के साथ चलने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने एक चमकीली प्रगति का आश्वासन दे रही राजसत्ता के बजाए एक भगोड़े मुख्यमंत्री के इस आश्वासन पर भरोसा किया है कि वह अब नहीं भागेगा।

कैसे बनी अमीरों की पार्टीः

आखिर आठ महीनों में ऐसा क्या हुआ कि भाजपा और उसके नेता नरेंद्र मोदी जहां हर भारतीय के आशा के केंद्र बने हुए थे, दिल्ली वालों के लिए वे अमीरों की पार्टी और अमीरों के नेता बन गए। यह आम आदमी पार्टी का संवाद कौशल ही कहा जाएगा कि उन्होंने एक चायवाले से अपना जीवन शुरू करने वाले प्रधानमंत्री को कारपोरेट और अमीरों के नेता के रूप में स्थापित कर दिया। मफलर और प्रधानमंत्री के 10 लाख के कोट की कहानियां कैसे जन-मन में स्थापित कर दी गयीं, इस पर भी भाजपा के कम्युनिकेशन विभाग को सोचना चाहिए। एक ऐसी पार्टी जिसने अभी कुछ समय पूर्व, पूरे देश का प्यार पाया है, उसे दिल्ली में एक नई-नवेली पार्टी अगर पराजित करती है, तो यह साधारण नहीं है। इस चुनाव से भाजपा का कुछ नहीं बिगड़ा है, वह बहुत बड़ी पार्टी है और अगले पांच सालों के लिए देश की राजसत्ता के लिए जनादेश से संयुक्त है। किंतु भाजपा का जो बिगड़ा है, वह है उसकी और उसके नेता की छवि, जिसकी भरपाई के लिए उसने आज से कोशिशें शुरू नहीं कीं, तो कल बहुत देर हो जाएगी। सत्ता, संगठन, प्रभावी नेतृत्व और धन तो ठीक है किंतु जनता का भरोसा भी चाहिए। बहुत कम समय में मोदी- शाह और भाजपा को यह संदेश दिल्ली की जनता ने दिया है, यह उनके ऊपर है कि वे दिल्ली को सिर्फ एक राज्य का संदेश मानते हैं या देश की जनता का संयुक्त संदेश… मरजी टीम मोदी की।

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2 Comments on "भाजपा की हार या आप की जीत !"

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आर. सिंह
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भक्त लोगों का अधिकार है कि वे जो भी अनर्गल बकना चाहे बक सकते हैं.भक्तों की दृष्टि में दिल्ली की अधिकतर जनता अपढ़ ,गवार और जाहिल है,क्योंकि वे अपना देश छोड़कर स्वेटों की जी हुजूरीकरने नहीं गए. ऐसे यह जनता पिछले अप्रैल में बहुत जागरूक और देशभक्त थी,क्योंकि उसने भगवान के चरणों में दिल्ली की सातों लोकसभा सीट अर्पित कर दी थी,पर न जाने क्या हुआ कि उस जनता का नौ महीने में ही मोह भंग हो गया और उसने वह कर दिखाया,जो सच्चे भक्तों को पागल करने के लिए काफी था. यह तो हुई भक्तों की बात,पर सच कहा… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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संजय जी का आलेख पढने पर भी मुझे मेरे प्रश्नका संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। प्रश्न: इस आम आदमी पार्टी को मत देने के पीछे “दिल्लीवालों ने आ आ पा की किस उपलब्धिपर ऐसा निर्णय लिया? कोई उत्तर है? क्या ये सारे मत अनपढ लोगों के थे? आप भा ज पा को पाठ सिखाने के लिए, क्या अपने पैरोंपर कुल्हाडी मार लोगे? ऐसी तो पाकिस्तानी मानसिकता होती है। क्या आधार था, ऐसे निर्णय का? आ आ पा का सफल शासन का अनुभव? या उसका विदूषकी ढोल पीटना? या सारा निःशुल्क देनेका वादा? क्या ऐसा संभव भी है? अब देखते जाओ। केजरीवाल… Read more »
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