लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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संजय सक्सेना

लगता है वर्तमान सरकारों को जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी का अहसास नहीं रह गया है। चाहें केन्द्र की सरकार हो या फिर राज्य सरकारें दोनों को ही अक्सर आइना दिखाना पड़ता है, तब जाकर उनको अपने कृतव्यों का अहसास होता है। आइना दिखाने का काम विपक्ष तो समय-बेसमय करता ही रहता है लेकिन इसमें सबसे महत्वपूर्ण ‘रोल’ देश की विभिन्न अदालतों का हो गया है। एक औसत अनुमान है कि देश की विभिन्न अदालते हफ्ते में कम से कम एक बार केन्द्र और राज्य सरकारों को उनकी जिम्मेदारी का अहसास कराते हुए कोई न कोई आदेश जरूर पारित करती हैं। मामला चाहे बिगड़ती कानून-व्यवस्था, सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी का हो या फिर मंत्रियों की मनमानी का। जिम्मेदारी का दम भरने वाली सरकारें जब तक पानी सिर से ऊपर नहीं हो जाता, आंखे मूंदे बैठी रहती हैं। सरकारें गुंगो-बहरों और अपंगों जैसा व्यवहार करती हैं। किसी और देश में इस तरह की सरकारें होती तो जनविद्रोह कब तक इनको उखाड़ फेंक चुका होता, लेकिन हिन्दुस्तानी सरकारों का यह सौभाग्य है कि यहां की जनता ‘सोती’ रहती है। न देश में कोई दूसरा ‘जननायक’ (जय प्रकाश नारायण्ा) पैदा हो रहा है न शुध्द समाजवादी राज नारायण जैसा कोई जिद्दी नेता। जनता अपने अधिकार भूल गई तो विपक्षी पार्टियां उन मुद्दों को ही हवा देतीं जो उनके लिए राजनैतिक फायदा पहुंचाने वाले होते। इस बात की मिसाल है करीब दो हफ्ते तक ठप रहा लखनऊ-दिल्ली रेल मार्ग(वाया बरेली, मुरादाबाद)।

वोट बैंक की राजनीति में लगी दोनों ही सरकारों (केन्द्र और उत्तर प्रदेश की बसपा सरकार) ने ज्योतिबा फुले नगर (अमरोहा) के निकट के रेलवे स्टेशन काफूरपुर के सामने टे्रक पर धरने पर बैठे जाट नेताओं के खिलाफ तब तक कोई कार्रवाई नहीं कि जब तक कि इलाहाबाद हाईकोर्ट और उसकी लखनऊ खंडपीठ द्वारा इस मामले पर शासन-प्रशासन की कड़ी फटकार नहीं लगाई गई। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जहां एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान रेलवे टै्रक और सड़क खाली कराने का आदेश दिया, वहीं इलाहाबाद की लखनऊ खंडपीठ ने इसे स्वत: संज्ञान में लिया था। अदालत की फटकार के बाद यूपी का प्रशासनिक अमला आनन-फानन में हरकत में आया तो जाट नेताओं को भी समझते देर नहीं लगी कि अगर अब उनकी हठधर्मी से मामला बिगड़ सकता है। उत्तर प्रदेश सरकार के दोहरे मापदंड का ही नतीजा था कि एक तरफ माया सरकार ने समाजवादी पार्टी के काम रोको आंदोलन के खिलाफ तो आवश्यकता से अधिक सख्ती की,लेकिन होली के समय जब लाखों लोग त्योहार मनाने अपने-अपने घरों जाना चाहते थे उन्हें अपना आरक्षण रद्द कराना पड़ गया। दर्जनों टे्रनें कैंसिल हो गई,यह सिलसिला करीब दो हफ्ते तक चलता रहा,लेकिन वोट बैंक की राजनीतिक मजबूरी के चलते माया सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही।उसकी ओर से आवश्यकता से अधिक नरमी दिखाई गई।जिस तरह जाट समुदाय के आंदोलन के प्रति माया सरकार का रवैया समझ से परे था,उसी तरह केन्द्र सरकार का भी। यह समझ में नहीं आया कि जाट नेताओं द्वारा रेल मार्ग अवरूध्द किए जाने के खिलाफ केन्द्र सरकार की सक्रियता केवल राज्य सरकार को पत्र लिखने तक ही क्यों सीमित रही।

हाईकोर्ट के आदेश पर माया सरकार कुभकर्णी नींद से जागी,लेकिन लगता है कि सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग को लेकर 05 मार्च से आंदोलनरत् जाट समुदाय के ऊपर अदालत की फटकार का कोई खास असर नहीं हुआ है।शायद इसी लिए वह आरक्षण की मांग पूरी न होने तक अपना आंदोलन जारी रखने की बात कर रहे हैं।बस बदली है तो आंदोलन की रूपरेखा।अब जाट रेलवे टे्रक पर धरना देने के बजाए दिल्ली का पानी बंद किए जाने जैसी बातें कर रहे हैं।जाट समुदाय जिस तरह से आरक्षण के लिए उल्टे-सीधे कदम उठा रहा है। उससे आम जन तो परेशान हो ही रहा है,जाट समुदाय के लोगों में ही आंदोलन को लेकर भिन्न-भिन्न मत नजर आने लगे हैं।

जाट आरक्षण समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष यशपाल मलिक का कहना है कि जाट अब अपना आंदोलन गुरिल्ला शैली में चलाएगें। इसके लिए अलग-अलग टीमें बनाई गई हैं, जो जिला मुख्यालय, रेलवे स्टेशन, नेशनल हाईवे, केन्द्र सरकार के विभागों पर प्रदर्शन करेगें। इसके विपरीत प्रसिध्द लेखिका तवलीन सिंह जो एक जाट महिला भी है,वह जाट आंदोलन से काफी दुखी दिखीं। उनका कहना था हम जाट भीख नहीं मांगते, आरक्षण को लेकर मेरी आंखों ने जो प्रदर्शन देखे उससे मेरा सिर शर्म से झुक गया और बुरा भी लगा, जब जाटों के बड़े नेता आरक्षण की मांग को लेकर केन्द्र सरकार से मिलने दिल्ली पहुंचे तो मुझे बहुत बुरा लगा। जाटों को ऐसी मांग शोभा नहीं देती। खैर,लेखिका के अपने विचार हैं,लेकिन इसमें भी कोई दो राय नहीं की आरक्षण का फायदा गरीबों को ही मिलना चाहिए।राष्ट्रीय लोकदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष और जाट नेता अजित सिंह भी जाट आंदोलनकारियों के पटरी पर धरना देने को गलत बता चुके हैं।

आज भले ही जाट आरक्षण की मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन कर रहे हों लेकिन बात जहां तक हिन्दुस्तान की है तो यहां आरक्षण का इतिहास करीब सवा सौ साल पुराना है। 1885 में दक्षिण भारत से आरक्षण की शुरूआत हुई। 1885 में मद्रास सरकार द्वारा ‘ग्रांट इन एड कोड’ बनाया गया जिसके अंतर्गत शैक्षिक संस्थाओं को वित्तीय सहायता और दलित वर्ग के विद्यार्थियो के लिए विशेष सुविधाएं दी गईं। इसी प्रकार 1918 में मैसूर के महाराजा ने सर एच सी मिलर की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया था।इसके द्वारा मैसूर के मुख्य न्यायाधीश ने राज्य सेवाओं में ब्राहमणों को छोड़कर अन्य बिरादरी के लोगों की भागीदारी की सिफारिश की थी।1927 में ‘ग्रांट इन एड कोड’का विस्तार कर आरक्षण का क्षेत्र बढ़ा कर सम्पूर्ण राज्य को पांच श्रेणियों में बांट कर सभी के लिए पृथक कोटा निर्धारित कर दिया गया।इसके उपरांत 1928 में ओ एच बी स्टार्ट की अध्यक्षता में एक समिति तत्कालीन बम्बई(अब मुम्बई)सरकार द्वारा गठित की गई थी, जिसको पिछड़े वर्गो का पता लगाकर उनके उत्थान के लिए सिफारिश सरकार को देनी थी।इस समिति ने सन् 1930 में अपनी रिपोर्ट में राज्य को तीन श्रेणियों में विभाजित कर अपनी सिफारिश सरकार को सौंपी। इस दौरान विभिन्न जाति के आंदोलनों को विशेष रूप से दक्षिण में बल मिला ।कई बड़े आंदोलनों के कारण ही स्वतंत्रता प्राप्ति से बहुत पहले ही त्रावनकोर, कोचीन,मद्रास,मैसूर आदि राज्यों में मेडिकल एवं इंजीनियरिंग कालेजों में सीटों का कोटा अलग कर दिया गया था। आजादी के बाद भी दीन-हीन यानि दबे कुचले लोगों को उठाने के लिए समय-समय पर केन्द्र और राज्य सरकारें आरक्षण नीति बनाती और बिगाड़ती रहीं, मकसद था सबको सबके बराबर खड़ा करना।आजादी के बाद से ही देश के विकास के लिए एक ओर जहां पंचवर्षीय योजनाएं बनीं, वहीं वोटों की राजनीति ने पिछड़े वर्ग के कथित उत्थान के लिए के लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4), 16(4), 46 आदि के अंतर्गत विशेष व्यवस्थाएं की गईं। केन्द्र सरकार की मंशा पर पिछडे वर्ग के नाम पर 29 जनवरी 1953 को एक आयोग बनाया गया। काका कालेलकर इसके अध्यक्ष थे। अत: यह आयोग इसी नाम से जाना गया।इस आयोग ने 30 मार्च 1955 को अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपी, लेकिन सरकार ने इस आयोग की सिफारिशें मानने से इंकार कर दिया। इसमें निष्पक्ष और न्यायोचित मानदंड नहीं दिखा था।अपनी कठोर आलोचनाओं के कारण काका काफी दुखी हो गए। यह रपट ठंडे बस्ते में चली गई। इसके बाद करीब 21 वर्ष यों ही गुजर गए। और 1975 के आसपास पिछड़ों की पहचान करके उनको आरक्षण देने का मुद्दा फिर गरमाया तो 21 मार्च 1976 को वी पी मंडल की अध्यक्षता में एक बार फिर आयोग गठित किया गया। मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट 31 दिसंबर 1980 को केन्द्र सरकार को सौंप दी।अपनी सिफारिशों में आयोग ने पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की, आयोग ने अपनी सिफारिशों का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि पिछड़ों को आरक्षण का लाभ देते समय विधि प्रतिबंध का भी ध्यान रखा गया ताकि अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़ों के लिए कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक न हो।यह रिपोर्ट भी करीब दस सालों तक ठंडे बस्ते में पड़ी रही।

उधर, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को आजादी के बाद से ही आरक्षण मिलने लगा था। अनुसूचित जाति के उत्थान के लिए शुरूआत में आरक्षण नीति दस साल के लिए बनाई गई थी,लेकिन बाद में राजनैतिक कारणों से आरक्षण का सिलसिला बढ़ता ही गया। इसमें कोई दो राय नहीं है कि आरक्षण नीति ने आजादी के दो दशक तक एक औषधि की तरह व्यापक असर डाला,लेकिन इसके बाद राजनैतिक दलों ने आरक्षण को वोट बैंक बढ़ाने का हथियार बना दिया। हिन्दुस्तान के तीसरे दशक आते आते इस नीति का पूरा लाभ वे लोग उठाने लगे, जो सियासत के उम्दा जानकार थे। गरीबों के उत्थान के लिए जो योजना बनाई गई थी, उस पर वोटों की राजनीति ने पानी ही फेर दिया। यह विष बेल इतनी बढ़ी कि जिन लोगों को आरक्षण पूरा फायदा मिला और वे बढ़कर क्रीमी लेयर में पहुंच गये लेकिन उन्होंने आरक्षण को इतना दुहना शुरू किया कि उसका गला ही घोंट कर रख दिया। उन्नति के शिखर की तरफ बढ़ रहे प्रदेशों में तो आरक्षण ने जातिवाद का विषैला बीज ही बो दिया । वहीं उत्तर प्रदेश बुरी तरह झुलस गया । आसपास के प्रदेश भी इससे अछूते नहीं रहे। लूले लंगड़ों, गरीब गुनियों के लिए बने आरक्षण में लाभ पाने के लिए वह तबका भी हिस्सा बंटाने पहुंच गया, जो इससे इतर था। पर उससे इसका लेना देना था, आरक्षण की रेवड़ियां बांटी जाएं और कोई हाथ न फैलाए, ऐसा कैसे हो सकता था। इस बात को केन्द्र की सत्ता में काबिज वीपी सिंह ने पहले पहचाना । उन्होंने अपना हित साधन करने के लिए दलितों की तरह पिछड़ों को अपने पाले में करने के लिए मंत्र फूंका और पिछड़ों को आरक्षण देने के लिए मंडल कमीशन बनाकर अपनी उम्मीदों को पूरा किया। मंडल कमीशन की रिपोर्ट आते ही उसे लागू कर दिया गया। अनुसूचित जाति और जनजातियों की तरह पिछड़ों के लिए आरक्षण लागू होने के बाद सामान्य वर्ग के पढ़े लिखे जवानों ने आरक्षण की दीवार खड़ी कर देने से अपने प्राणों की आहुति देनी शुरू कर दी। पर कोई पिघला नहीं। सामान्य वर्ग इस बात से बहुत हताहत हुआ था। आज भी उनके मन में यह टीस बनी हुई है। इसके लिए वीपी सिंह को बहुत कोसा भी गया।

तुगलकी सोच रखने वाले वीपी सिंह के प्रधानमंत्रित्व वाली तत्कालीन सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पिछड़े वर्गों को नौकरियों में आरक्षण का लाभ देने वाला एक आदेश अचानक ही अगस्त 1990 में पारित किया था। अचानक मंडल आयोग की सिफारिश लागू किए जाने का जो राजनैतिक कारण समझ में आया उसके अनुसार प्रधानमंत्री वीपी सिंह की सरकार में उप प्रधानमंत्री देवीलाल बने हुए थे। देवीलाल से वीपी सिंह की खटपट हो गई थी,सरकार जाने तक की नौबत बन आई तो अपनी भविष्य की राजनीति को मजबूती प्रदान करने के लिए ही वीपी ने मंडल का कार्ड चल दिया। उन्होंने किसी से विचार-विमर्श किए बिना मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कर दीं। पिछड़ों को 27 प्रतिशत का यह मुद्दा उन दिनों उठाया जब भगवान राम की छतरी की नीचे हिन्दू समाज एकजुट हो रहा था। अचानक आये इस आरक्षण से हिन्दू समाज चरमरा गया।वीपी सिंह ने जो तब प्रधानमंत्री थे,उन्हें कोसा-काटा जाने लगा।इस बीच वीपी सिंह का एक वक्तव्य आया जिसमें कहा गया था कि उन्हें इस बात का अहसास था कि मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद देश का माहौल खराब हो सकता है। आरक्षण विरोधी आंदोलन की आग में युवा वर्ग को कूदता देख वीपी सिंह ने 30 लाख नौकरियों का चारा डाला। युवाओं को एजेंसी और डीलरशिप का वायदा किया,लेकिन यह घोषणा खोखली साबित हुई। बाद में यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा था। संविधान के अनुच्छेद 16 के तहत सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ देने के मामले पर विचार करने के लिए पहली बार नौ सदस्यीय संविधान पीठ का गठन किया गया।प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम एच कानिया की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने बहुमत से लिए फैसले में 16 नवंबर 1992 को कहा कि सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं रखने तथा पिछड़ों में सम्पन्न तबके को आरक्षण के लाभ से अलग रखने की व्यवस्था दी। मण्डल आयोग की रिपोर्ट से विभिन्न वर्गों में फूट पड़ गयी। वीपी सिंह के बाद मुलायम सिंह ने इसकी पूछ ही पकड़ ली। और आज तक नहीं छोडी। राज्य में आरक्षण देने के लिए मुलायम ने 1993 में उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया भाजपा भी इससे अछूती नहीं। वर्ष 1999-2000 में रामप्रकाश गुप्ता के मुख्यमंत्रित्व काल में जाट नेताओं की ओर से ऐसा शिगूफा छोड़ा गया कि उन्हें भी कोटे में सम्मिलित किया जाय। यह तब हुआ था जब उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग ने दो टूक कह दिया था कि जाट आर्थिक और सामाजिक रूप से संपन्न हैं। इसलिए उन्हें आरक्षण देने की जरूरत नहीं है। पर यह आग थमी नहीं। जाट नेताओं ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया। जिसके आगे बीजेपी सरकार को झुकना पड़ा। देशभर में 27 प्रतिशत आरक्षण पाने के लिए विभिन्न जातियों के नेताओं के गुट बनते गये। 1993 में जब पिछड़ा वर्ग आयोग का जन्म हुआ था उस समय 55 जातियों को पिछड़ा मानकर आयोग ने आरक्षण का फायदा दिया था। लेकिन बाद में यह आयोग जम्बोजेट की तरह बढ़ता ही गया और आज तक इसमें कुल 79 जातियां शामिल हो चुकी हैं। पिछड़ा वर्ग की सूची में 2003 के बाद से कोई नई जाति सम्मलित नहीं हुई है। 2003 में कलाल,कलवार और कलार(जायसवाल जाति के उपवर्ग) जाति को पिछड़ा वर्ग की सूची में सम्मलित किया गया था। पिछड़ों को आरक्षण पर इतनी राजनीति गरमायी की पिछड़ा वर्ग ‘वोट बैंक’ ही बन गया।पिछड़ा वर्ग की राजनीति के आगे अनुसूचित जनजाति आयोग बौना पड़ गया। पिछड़ा वर्ग आयोग में शामिल लोगों ने राजनीति को इतनी हवा दी कि दलित और पिछड़े आपस में भिड़ने लगे। भले ही वीपी सिंह पिछड़ों को आरक्षण के जनक माने जाते रहे हों लेकिन बाद में मुलायम और मायावती ने भी इसके बल पर शासन किया। पर एक म्यान में दो तलवारे नहीं रह सकती थी। पिछड़े अलग दलित अलग हो गये।

विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही आरक्षण को लेकर केवल जाट समाज ही आंदोलित नहीं है वरन अन्य कई विरादरियों ने भी यह सुविधा पाने के लए आवाज तेज कर दी है। खुद को अनुसूचित जाति वर्ग में शामिल कराने के लिए पिछड़े समाज की 16 जातियों ने मुददा गरमाना शुरू किया तो आरक्षित कोटे में अलग कोटा सुनिश्चित करने जैसी मांग भी जोड़ पकड़ने लगी है।

आरक्षण की आड़ में वोट बैंक की सियासत कोई नई बात नहीं हैं। चुनावी आहट होते ही आरक्षण लाभ पाने के विभिन्न बिरादरियों के संगठन अचानक सक्रिय होते रहे हैं। केंद्रीय सेवाओं में आरक्षण की मांग पर अखिल भारतीय जाट संघर्ष समिति ने 13 दिन तक रेल ट्रैक जाम कर अन्य बिरादरियों को भी राह दिखा दी है कि विभिन्न सरकारों को शक्ति और एकता के बल पर कैसे झुकाया जा सकता हैं। अनुसूचित वर्ग में शामिल होने की अर्से से मांग कर रही अति पिछड़े वर्ग की कश्यप, निषाद, केवल, मल्लाह, बिंद, कुम्हार व प्रजापति जैसी 16 जातियों के तेवरों में तल्खी दिख रही है। अखिल भारतीय कश्यप निषाद महासंघ के अध्यक्ष विजयपाल सिंह कहते हैं कि केंद्रीय सेवाओं में आरक्षण की मांग पर अखिल भारतीय जाट संघर्ष समिति ने 13 दिन तक रेल ट्रैक जाम कर अन्य बिरादरियों को भी राह दिखा दी है। अनुसूचित वर्ग में शामिल होने की अर्से से मांग कर रही अति पिछडे वर्ग की कश्यप, निषाद, केवल, मल्लाह, बिंद, कुम्हार व प्रजापति जैसी 16 जातियों के तेवरों में तल्खी दिख रही है।

अखिल भारतीय कश्यप निषाद महासंघ के अध्यक्ष विजयपाल सिंह कहते हैं कि यातायात व्यवस्था ध्वस्त करने वालों को वार्ता पर बुलाने से यह साबित होता है कि सरकारें वैधानिक तरीके से उठाए जाने वाले मुद्दों को अनसुना करती हैं। लंबे आंदोलनों के बाद भी कमजोर वर्ग की जायज मांग नहीं सुनी जाती। विजय सिंह ने अप्रैल में जिलावार बैंठकें कर रेल रोको आंदोलन शुरू करने का एलान करते हुए कहा कि अनुसूचित वर्ग में शामिल कराने वाले दल को ही 16 बिरादरियां वोट देंगी। इस आशय के पत्र सभी दल प्रमुखों को प्रेषित कर दिए गये हैं। इसी नक्शे कदम पर अखिल भारतीय प्रजापति महासंघ भी है। अनुसूचित वर्ग की सुविधा पाने को वर्ष 2006 में दिल्ली में प्रदर्शन कर आंदोलन की शुरूआत करने वाले महासंघ अध्यक्ष दारा सिंह प्रजापति एकाएक फिर से माहौल बनाने में सक्रिय हो गये हैं।

उधर, हवा का रूख भांप कर लखनऊ में महा सम्मेलन कर पासी समाज अपनी बिरादरी को अति पिछड़ा का अलग आरक्षण कोटा तय करने की मुहिम आरम्भ कर चुका है। महा सचिव रामकृपाल पासी का कहते हैं कि लाभ असली हकदार को ही मिलना चाहिए। अनुसूचित वर्ग में आरक्षण का लाभ एक जाति विशेष को मिलने का आरोप लगाते हुए वाल्मीकि महासभा के प्रदेश अध्यक्ष जुगल किशोर भी अलग से कोटा सुनिश्चित करने की पैराकारी करते हैं। अखिल भारतीय वाल्मिकी कल्याण समिति के प्रवक्ता प्रमोद चौधरी ने अप्रैल के महीने में लखनऊ में बड़े प्रदर्शन करने की बात कहीं। हिन्दुओं में कई बिरादरियों को आरक्षण मिलने की कसक अल्पसंख्यकों में भी दिखने लगी है। उलेमा काउंसिल के नेता तो एक कदम आगे बढ़ते हुए आरक्षण कोटा जातियों पर आधारित नहीं आर्थिक आधार पर होने की पैराकारी कर रहे हैं। कौमी एकता पिछड़ा वर्ग सोसाइटी ने मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर मुस्लिमों का कोटा निर्धारित करने को पत्र लेखन अभियान चला रखा है। आरक्षण के जरिए वोट पाने की जुगत में सियासी दल भी लगे हैं। सपा व रालोद मुस्लिमों को आरक्षण देने की सिफारिश कर रही हैं । इतना ही फायर बोड हिंदू नेता साध्वी उमा भारती भी मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के कार्यक्रम में अति पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण देने से कोई गुरेज न होने की घोषणा कर चुकी है।

बहरहाल, आरक्षण के अंदर आरक्षण की बात लाजिमी है । पर यह आरक्षण अपने पंख ज्यादा फैलाता गया तो आरक्षण का लाभ जिनके लिए मूल रूप से बनाया गया था उन तक नहीं पहुंच सकेगा। इसे बीच वाले ही बंदरबांट करने की जुगत भिड़ाने से नहीं चूकेंगे। राजनीति करने वाले भी इसकी आड़ में रोटियां सेकेंगे । एक वर्ग में इतनी जातियां इकट्टा हो जाना देश को हिस्सो में बांट देने के सामान होगा। सत्ता या समाज में केन्द्रीकरण ठीक नहीं होता। लोकतंत्रीय देश में विकेन्द्रीकरण ही आक्सीजन दे सकता है। और केन्द्रीकरण तानाशाह पैदा कर सकता है।

 

 

केन्द्र बदलेगा कानून

 

राज्य सरकारें सरकारी नौकरियों में आरक्षण के मामले पर अक्सर गेंद केन्द्र सरकार के पाले में डालकर अपना दामन बचा लेती हैं,यह बात केन्द्र समझता भी है लेकिन वह कर कुछ नहीं पाता। इसकी ताजी बानगी जाट आंदोलन में दिखाई दी।माया सरकार ने इसे केन्द्र का मसला बता कर गेंद केन्द्र के पाले में डाली तो गले की फांस बनते जा रहे जाट आरक्षण आंदोलन से निपटने के लिए केद्र सरकार अब अन्य पिछड़ी जाति आयोग कानून में बदलाव करने जा रही है ताकि आयोग जाट आरक्षण से संबंधित प्रस्ताव पर पुनर्विचार कर सके। आयोग के मौजूदा संविधान के अनुसार जिस विषय पर एक बार विचार हो जाता है उस पर दोबारा विचार करने का प्रावधान नहीं है। केन्द्रीय पिछड़ा आयोग जाटों को आरक्षण देने के प्रस्ताव को एक बार खारिज कर चुका है लेकिन उत्तर प्रदेश राजस्थान और हरियाणा में जारी जाट आरक्षण आंदोलन की गंभीरता को भांपते हुए केंद्र सरकार को अब कानून में बदलाव करने पर विचार करना पड़ रहा है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय को अन्य पिछड़ी जाति आयोग के कानून में बदलाव करने को कह दिया हैं अब शीघ्र ही इस कानून में संशोधन कर लिया जाएगा। इसके बाद आयोग जाट आरक्षण मामले पर दोबारा से विचार कर सकेगा।

 

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