लेखक परिचय

शिवानंद द्विवेदी

शिवानंद द्विवेदी "सहर"

मूलत: सजाव, जिला - देवरिया (उत्तर प्रदेश) के रहनेवाले। गोरखपुर विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र विषय में परास्नातक की शिक्षा प्राप्‍त की। वर्तमान में देश के तमाम प्रतिष्ठित एवं राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में सम्पादकीय पृष्ठों के लिए समसामयिक एवं वैचारिक लेखन। राष्ट्रवादी रुझान की स्वतंत्र पत्रकारिता में सक्रिय एवं विभिन्न विषयों पर नया मीडिया पर नियमित लेखन। इनसे saharkavi111@gmail.com एवं 09716248802 पर संपर्क किया जा सकता है।

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शिवानन्द द्विवेदी “सहर”

अन्ना के लोकपाल आन्दोलन ने जैसे-जैसे अपना प्रसार कीया राजनीति उसे मुद्दागत रूप से हथियाने के लिए बढ़ चढ़ कर आगे आई ! सभी दल अपने सिद्धांतो एवं राजनीतिक समीकरणों के आधार पर लोकपाल के प्रति अपना रुख तय करने में लगे हुए है ! आज अगर बी.जे.पी लोकपाल के नाम पर सत्ता को घेरने में लगी है तो वहीँ जातिगत राजनीति के आधार पर संसद में पैठ रखने वाले नेता लोकपाल में आरक्षण की भूमिका एवं उसका महत्त्व समझाने में लगे हुए हैं ! आज हर नेता जो दलित उद्धारक की स्वघोषित छवि अथवा मान्यता प्राप्त छवि रखता है वो लोकपाल में आरक्षण को लेकर सियासी पैतरें बिछाने में लगा है और दलितों के सामने खुद को उनका सबसे बड़ा मसीहा साबित करने में पीछे खडा होने को तैयार नही है ! दलितों एवं पिछड़ों के प्रतिनिधित्व के नाम पर लोकपाल में जिस नयी चर्चा ने जन्म लिया है उसका भ्रष्टाचार और इसके विरोध से कोई सरोकार नही है ,वरन यह तो पूर्ण रूप से राजनीतिक तवे के रूप में प्रस्तुत कीया जा रहा है जिस पर एक बार दलित समाज को हाशिये पर लाया जा सके और हमेशा की तरह जातिगत वोट की राजनीति की जा सके !लोकपाल पर चर्चा से बाहर आते ही लो.ज.पा अध्यक्ष राम बिलास पासवान का जो बयान आया उसमे ना तो भ्रष्टाचार के विरुद्ध कोई शब्द था ,नही कोई भाव, अगर कुछ शारांश में कुछ दिखा तो वह इन सबसे जुदा कहीं “लोकपाल में आरक्षण” !अब अगर इस मुद्दे ने राजनीतिक जामा पहन ही लिया है तो बहस की गुंजाइशों को नकारा नही जा सकता क्योंकि प्रत्येक दल जातिगत आधार पर अपना एक रुख जरुर रखते हैं और उसे दलित्र हित में परिभाषित भी करते हैं ! बावजूद इन सबके सबसे बड़े सवाल ये है कि राजनीति से हटकर भ्रष्टाचार के सन्दर्भ में इस लोकपाल विधेयक में आरक्षण की प्रासंगिकता क्या है और कीतनी है ? क्या यह सही होगा की सभी राजनीतिक,आर्थिक एवं सामाजिक नीतियों की बुनियाद जातिगत आरक्षण निहित ही हो ? क्या बिना लोकपाल में आरक्षण दिए भ्रष्टाचार दूर नही हो सकता या दलितों का सार्वभौमिक विकास नही हो सकता है ?इस सन्दर्भ में लोकपाल में आरक्षण की वकालत करने वालों का यह तर्क बिलकुल बे बुनियाद प्रतीत होता है की लोकपाल विधेयक में सबको प्रतिनिधित्व का अवसर मिले इसके लिए इसमे आरक्षण का प्रावधान होना चाहिए ! आखिर कीस आधार पर हम किसी संस्था या समाज में प्रतिनिधित्व तय करने की कोशिश कर रहे हैं ? विदित है की सामाजिक न्याय एवं अवसर में समानता के नाम पर सर्व समाज के हित में पहले से विभिन्न परीक्षाओं,नामांकनों,नौकरियों,प्रोन्नतियों में एस.से/एस.टी को २२% एवं ओ.बी.सी २७% आरक्षण प्राप्त है ! अब सवाल है की क्या लोकपाल अंतर्गत आने वाले कर्मचारी ,अधिकारी इसी भारतीय क़ानून व्यवस्था के मुताबिक़ चयनित एवं कार्यरत होंगे और वो सभी लोग आरक्षण के हर पडाव से होकर ही आयेंगे, फिर क्या अतिरिक्त रूप से कीसी संस्था विशेष के लिए अलग आरक्षण की मांग करना संवैधानिक होगा ? अगर लोकपाल में आरक्षण की मांग लोकपाल में प्रतिनिधित्व के लिए है तो क्या आरक्षण के मानक अब संस्थागत रूप से काम करेंगे ? जब सार्वभौमिक रूप से भारतीय व्यवस्था में आरक्षण को महत्त्व दिया गया है तो फिर इसको संस्थागत रूप से लाने का क्या प्रावधान होगा ?इतिहास गवाह है की आरक्षण के नाम पर दलितों को एकजुट तो विभिन्न दलों द्वारा कीया गया मगर उन्हें विकास एवं जागरूकता की तरफ ले जाने के लिए कोई प्रयास नही हुआ वरन एक वोट आधारित झुण्ड के रूप में राजनीतिक बलि का बकरा बनाया जाता रहा है ! आखिर हमें यह सोचने की आवश्यकता क्यों नही पड़ती की लगभग सात दशकों के इस आरक्षणवादी दौर ने दलितों क्या मुकाम दिया है ? जिन मनसूबे के साथ इस आरक्षण को लाया गया उसमे एस.सी/एस.टी को पिछड़ा मानकर उन्हें आरक्षण देने की व्यस्था संवैधानिक रूप से की गयी मगर शायद हमारे संविधान निर्माताओं ने यह अनुमान भी नही कीया की जिस सामाजिक संरचना में सुधार के लिए यह आरक्षण की पद्धति उनके द्वारा प्रस्तुत की जा रही है भविष्य में उसके राजनीतिक स्वरुप भी होंगे और यह सामाजिक पद्धति राजनीतिक यंत्र के रूप में काम करने लगेगी ! आजका दलित प्राचीन काल से दलित था और आज भी है आरक्षण की यह सामजिक पद्धति इस दलित को अब तक नही उठा पायी है और इसका एक मात्र कारण है की आरक्षण का राजनीतिकरण होना ! आज जब लोकपाल में आरक्षण की मांग हो रही तो यह मांग भी इसी राजनीतिक यंत्र की एक चाल है जिसका कोई सामाजिक वजूद नज़र नही आता सामाजिक परिवर्तन नज़र नही आता सिवाय राजनीति के ! लोकपाल एक भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून है जिसमे बहस का विषय और पक्ष सिर्फ भ्रष्टाचार निहित होने चाहिए इसमे कीसी भी अन्य तरह के प्रावधानों पर विचार नही होना चाहिए ! आरक्षण को ढाल बनाकर प्रतिनिधित्व की वकालत करने वाले राजनीतिक दल अपने खुद की पार्टी में जातिगत प्रतिनिधित्व को आरक्षण के आधार पर क्यों नही लागू करते ? उनके पार्टी में सर्व समाज के प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण की व्यवस्था क्यों नही होती है ? क्या पुरे बी.एस.पी में मायावती हे सबसे योग्य हैं या लो.ज.पा में रामबिलास का कोई दलित या पिछड़ा विकल्प नही है ?आरक्षण के उद्देश्यों को अगर ध्यान में रखा जाय तो इसका अत्यंत सपष्ट उद्दश्य है की जातिगत आधार पर सामाजिक विषमता को ख़तम कीया जाय मगर संस्थागत तौर पर सामाजिक विषमता को भला कैसे कैसे ख़तम कीया जा सकता है ! कीसी सामाजिक पद्धति को राजनीतिक यंत्र बनाकर भला हम सामाजिक समानता की बात कैसे कर सकते हैं ? अत: एक तथ्य स्पस्ट है की लोकपाल में आरक्षण के राजनीतिक मायने और परिणाम तो बहुत है लेकीन सामाजिक रूप से इसका कोई महत्व नही है और यह हमें आरक्षण के वास्तविक उद्देश्यों से दूर कहीं राजनीतिक दल-दल में ले जाता है !

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