लेखक परिचय

एम. अफसर खां सागर

एम. अफसर खां सागर

एम. अफसर खां सागर धानापुर-चन्दौली (उत्तर प्रदेश) के निवासी हैं। इन्होने समाजशास्त्र में परास्नातक के साथ पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है। स्वतंत्र पत्रकार , स्तम्भकार व युवा साहित्यकार के रूप में जाने जाते हैं। पिछले पन्द्रह सालों से पत्रकारिता एवं रचना धर्मीता से जुड़े हैं। राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न अखबारों , पत्रिकाओं और वेब पोर्टल के लिए नियमित रूप से लिखते रहते हैं। Mobile- 8081110808 email- mafsarpathan@gmail.com

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एम. अफसर खां सागर

भारत को आजाद हुए 68 साल बीत चुके हैं। बदलते वक्त के साथ विकास के पैमाने बदले

हैं। बैलगाड़ी से मोटर गाड़ी तक का सफर तय हुआ और पाती से मोबाइल की थाती तक।

विकास की दौड़ में भारत हांफता हुआ चल रहा है। विकास की राह हमवार किये

हिन्दुस्तान में जहां अनेकों कल कारखानों का विकास हुआ वहीं कदीमी दस्तगीरी दम

तोड़ती नजर आयी। तकरीबन 20 करोड़ आबादी वाले उत्तर प्रदेश का पूर्वी इलाका प्रति

व्यक्ति आय में पिछड़ता चला गया। लड़खड़ाती कास्तकारी, दम तोड़ती दस्तगीरी,

विकराल रूप धारण करती बेरोजगारी, हर रोज इलाका छोड़ते मजदूर और एक के बाद

एक बन्द होते उद्योग धन्धे अलग पूर्वांचल राज्य के मांग की खास वजहें हैं। आजादी के

बाद दर्जन भर राज्य बने होंगे। सभी नये राज्यों में पूर्वांचल की आबादी ज्यादा होने के

बावजूद केन्द्र व राज्य सरकार की उपेक्षा का दंश झेलता यह इलाका आज भी गरीबी और

बेरोजगारी की चपेट में सिसक रहा है। इस इलाके में बेरोजगारों और मजदूरों की फौज

खड़ी है जो जीवन की तलाश में मुम्बई, दिल्ली, राजस्थान व गुजरात आदि जगहों पर

जाते हैं जहां इनके पेट की आग को पूरबिया कह के लात-जूतों और लाठी-डंडों से शान्त

किया जा रहा है!

शुरूवाती दौर में ही आंदोलनों के लड़खड़ा जाने की वजह से अलग पूर्वांचल राज्य की मांग

परवान नहीं चढ़ सका है। पूर्वांचल राज्य की मांग करने वालों का हमशा दावा रहा है

आजादी के बाद पूर्वांचल के विकास पर सरकारों ने तवज्जो नही दिया है। भेदभाव पूर्ण

नीतियों के चलते ही यह इलाका बेहद पिछड़ा है। तकरीबन 7.52 करोड़ आबादी वाले इस

क्षेत्र में लगभग में चार करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे हैं तथा डेढ़

करोड़ से ज्यादा नौजवान बेरोजगारी का दंश झेलने पर मजबूर हैं।

सत्ता के विकेन्द्रीकरण और पिछड़ेपन को दूर करने के लिए छोटी-छोटी राजनीतिक

इकाईयों का होना जरूरी मानकर कभी उठाया गया पूर्वांचल राज्य की अवधारण 60 साल

से ज्यादा पुराना माना जाता है। मगर दमदार व कद्दावर नेतृत्व के बगैर न तो यह

राजनीतिक दलों का मुद्दा बन पाया और न ही जन आन्दोलन का रूप ले सका। गाहे-

बेगाहे अलग पूर्वांचल राज्य की मांग को लेकर सियासी न सही मगर समाजी संगठन के

लोग आवाज बुलन्द करते रहे हैं। फिल्वक्त पूर्वांचल राज्य जनान्दोलन (पीआरजे) के

बैनर तले अलग पूर्वांचल राज्य की मांग जोर पकड़ रही है। अंजाम की परवाह किये बगैर

ये लोग प्रस्तावित पृथक पूर्वांचल राज्य की मांग के लिए बाकायदा खाका तैयार किया है

जिसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश के आठ मण्डल और 26 जिले शामिल हैं। पीआरजे द्वारा

परिकल्पित पूर्वांचल को अलग राज्य बना दिया जाए तो इसका क्षेत्रफल 79807 वर्ग किमी

जोकि देश का 16वां विशालतम राज्य होगा। इसकी जनसंख्या घनत्व 943 व्यक्ति प्रति

वर्ग किमी तथा लिंगानुपात 956 होगा। इस तरह पीआरजे द्वारा प्रस्तावित पूर्वांचल

राज्य में आठ मण्डल- वाराणसी, इलाहाबाद, मिर्जापुर, गोरखपुर, आजमगढ़, बस्ती,

फैजाबाद व देवीपाटन के 26 जिले वाराणसी, चन्दौली, गाजीपुर, जौपनुर, आजमगढ़,

मऊ, बलिया, इलाहाबाद, कौशाम्बी, प्रतापगढ़, गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर,

महराजगंज, बस्ती, संतकबीरनगर, सिद्धार्थनगर, बलरामपुर, गोंडा, फैजाबाद,

अकबरपुर, सुल्तानपुर, अमेठी, मिर्जापुर, भदोही, व सोनभद्र शामिल होंगे। प्रस्तावित

पूर्वांचल राज्य अगर बनता है तो इसमें 32 लोकसभा क्षेत्र व 155 विधानसभा क्षेत्र शामिल

होंगे। पूर्वांचल राज्य जनान्दोलन के मुख्य राष्ट्रीय महासचिव पूर्व आईपीएस अजय

सिंह का मानना है कि ‘‘पूर्वांचल का समग्र विकास अभी तक इसलिए नहीं हो सका कि

केन्द्र व प्रदेश की सरकारों ने हमेशा ही इस इलाके की उपेक्षा की है। योजनायें बनती है

मगर धरातल पर नहीं पहुंच पाती हैं क्योंकि दिल्ली व लखनउ इसके विकास के लिए

कभी संजीदा ही नहीं हुआ। तेज विकास के लिए छोटी इकाईयों का होना जरूरी है। ’’ बात

चाहे कुछ हो मगर आज भी पूर्वी उत्तर प्रदेश का यह इलाका मूलभूत जरूरतों से महरूम है।

अतीत के आइने में अगर देखें तो पं0 जवाहर लाल नेहरू के समय में तत्कालीन सांसद

गाजीपुर विश्वनाथ प्रसाद गहमरी ने संसद में पूर्वांचल के पिछड़ेपन की चर्चा करते हुए रो

पड़े थे जिससे आहत होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री पं0 नेहरू ने पूर्वांचल के आर्थिक व

सामाजिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए पटेल आयोग का गठन किया था। पुर्वी उत्तर

प्रदेश के जिलों में इस आयोग ने दौरा कर अपनी विस्तृत रिपोर्ट सरकार को सौंपी मगर

दूसरे आयोगों की तरह इसका भी नतीजा सिफर साबित हुआ। पूर्वांचल पर पटेल आयोग

की रिपोर्ट योजना आयोग की फाइलों में दब कर दफन हो गयी। गहमरी जी नहीं रहे मगर

पूर्वी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने की मांग गाहे-बेगाहे उठती रहती है। आजादी के 68

साल का तवील अरसा बीत जाने के बाद भी पृथक पूर्वांचल राज्य के गठन का सपना

साकार नहीं हो पाया है।

मौजूदा हालात इस कदर बदतर हो गये है कि पूर्वांचल के गरीब किसान के घर अगर बेटा

पैदा होता है तो उसे मुम्बई, दिल्ली, असम, गुजरात में पिटते मजदूरों का डर सताने

लगता है और कहीं लड़की पैदा हो जाती है तो वह लड़की के हाथ पीला करने की सोच से

खुद पीला पड़ के मुरझाने लगता है। बहन का हाथ पीला करने के लिए भाई मुम्बई,

दिल्ली, असम, गुजरात, गुडगांव जाकर हाड़तोड़ मेहनत करके खुद काला पड़ जाता है

मगर बहन के हाथ पीला करने की चक्कर में वहां से लौटता है तो टी. बी. कैंसर दमा व

एड्स जैसी खतरनाक बीमारीयों के साथ।

पूर्वांचल के बुनकरों का हाल बदहाल है। 90 के दशक में बुनकारी ने दम तोड़ना शुरू किया

तो बनारस के करघा मालिक नाजिम जमील जुनैद जैसे तमाम करघा बेचकर रिक्शा

चलाना शुरू किया। जैसे-जैसे हालात खराब होते गयें ये लोग दूसरे प्रदेशों के साथ खाड़ी

मुल्कों का रूख अख्तियार करना शुरू किया। नजीर व कबीर के विरासत का कभी ऐसा

हश्र होगा शायद किसी ने यह सोचा नहीं था। बात पूर्वांचल राज्य की चल रही है तो अगर

बनारस के आस-पास का सांस्कृतिक कारोबार व धार्मिक स्ट्रक्चर देखा जाए तो इससे

बुनकरों को खास फायदा होगा। बनारस ही नहीं बल्कि आजमगढ़, मुबारकपुर, मऊ,

गोरखपुर व मिर्जापुर भदोही के कदीमी दस्तगीरों को उनके जीने की आस जग जाएगी।

पूर्वांचल के बन्द पड़े चीनी मिलों के चालू हो जाने से किसानों को जहां रवानी मिलेगी वहीं

फर्टिलाइजर कम्पनी के चालू हो जाने से किसानी को जिन्दगानी हासिल हो सकती है।

मउ का हथकरघा, बनारस की साड़ी, भदोही का कालीन, मिर्जापुर के पीतल का कारोबार

और चुनार के चीनी मिट्टी के कुटीर उद्योग जो दम तोड़ रहे हैं इनके शुरू हो जाने से

पूर्वांचल के किसानों और बेरोजगार नौजवानों को जरिया-ए-मास का इंतजाम हो सकता

है जिससे उनमें जीने की उम्मीद पैदा हो सकती है और दिल्ली-मुम्बई जा कर रोजगार की

तलाश में लाठी-डंडा ता नहीं खना होगा। अलग पूर्वांचल राज्य की मांग करने वालों की

हमेशा दलील रही है कि त्वरित व समग्र विकास के लिए छोटी राजनीतिक इकाईयों का

होना जरूरी है ताकि विकास में सबकी हिस्सेदारी हो सके। विधानसभा चुनाव के दौरान

उत्तर प्रदेश के बंटवारे की मांग तो अक्सर उठती रही है मगर सिर्फ सियासी लफ्फाजी के

सिवा बात आगे नहीं बढ़ सकी। अब देखाना है कि अलग पूर्वांचल की मांग को सरकारें

कब तक अनसुना करती हैं या कि पूर्वांचल राज्य का सपना साकार होता है?

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