लेखक परिचय

अब्दुल रशीद

अब्दुल रशीद

सिंगरौली मध्य प्रदेश। सच को कलमबंद कर पेश करना ही मेरे पत्रकारिता का मकसद है। मुझे भारतीय होने का गुमान है और यही मेरी पहचान है।

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अब्दुल रशीद

सपने देखना अच्छी बात है लेकिन सपनों के लिए गहरी नींद चाहिये। नींद तब आती है जब पेट भरा हो खाली पेट किसी को नींद नहीं आती। गरीबी से बड़ी न तो कोई गाली है,भूख से बड़ी न तो कोई लाचारी है और भ्रष्टाचार से बड़ी न तो कोई बेमारी है। दुर्भाग्यवश यह सब हमारे देश में विकराल रुप लेती जा रही है और इलाज के नाम पर महज टोटका हो रहा है। बेशर्मी का यह आलम है की चुनावी वादा करते समय हमारे राजनैतिक दल इ न सबको भूल जाते हैं की इस देश में गरीबी, भुखमरी और भ्रष्टाचार से जनता त्रस्त है। जिसके पास न तो भर पेट खाने को है और न ही चैन की नींद सोने कि वजह क्योंकि गरीब जनता की संतान भी भर पेट भोजन न मिलने के अभाव में कुपोषण का शिकार होती जा रही है और जन्मदाता होने के नाते सिवाय अफसोस के कुछ भी नहीं है उसके हाथ में। उनको भला लैपटॉप का क्या काम। गरीबों के इलाज का पैसा नेता डकार जाते हैं और जांच चल रही है, कुपोषण राष्ट्रीय शर्म है। क्या इन सबसे समस्या खत्म हो जाएगी। दरअसल कुपोषण की शिकार हमारे देश की राजनीति हो गई है, तभी तो अधमरे लोगों को जाति, धर्म के नाम पर बांटकर सत्ता पाना चाहती है। इनसानियत की चिता जलाकर आग ताप रहे राजनेता कैसे सत्ता के नाम पर पैसे लुटा रहे हैं यह शायद किसी से छुपा नहीं लेकिन गरीब को दो वक्त़ कि रोटी के लिए उनके पास फण्ड नहीं। यह महज इत्तेफ़ाक़ नहीं बल् कि सोंची समझी राजनीति का हिस्सा है कि अधमरे आदमी को रोटी का लालच दे कर बहकाया तो जा सकता है लेकिन स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मानसिकता को नहीं।

देश का कोई ऐसा कानून नहीं और न ही देश में कोई ऐसी व्यवस्था है जिसके तहत झूठे घोषणापत्र जारी करने वाले राजनैतिक दल कि मान्यता रद्द कर दी जाए और झूठ बोलने वाले नेता की उम्मीदवारी रद्द कर दी जाए। बेहतर होता राजनैतिक दल भी इस तरह के गम्भीर समस्या पर विचार करते और इस समस्या का समाधान ढूढ़ने का ईमानदार प्रयास करती क्योंकि किसी भी व्यवस्था में यदि समय रहते सुधार नहीं किया जाता है तो विकरित दुर्व्यव्यवस्था के विरोध में आम जनता का गुस्सा अचानक प्रकट हो सकता है जिससे सुधार तो नहीं होता लेकिन स्थापित व्यवस्था को नुक़सान अवश्य पहुँचा देता है। उदाहरण जूते फेकना ,थप्पड़ मारना, क्या समस्या का समाधान है, नहीं। लेकिन सब्र का बांध टुटता जा रहा है। यह तरीका बिलकुल गलत है लेकिन हम समस्या को इस हद तक बढने से पहले ही क्यों ना हल करने का कोशिश करें। क्यों ना राजनैतिक दल अपने  कार्यकर्ताओं को अनुशासन और अपने राजनैतिक विचार धारा के अनुरुप ढालने का कोशिश करती है, क्योंकि किसी भी दल के विचारधारा में न तो भ्रष्टाचार को जायज बताया जाता है और कार्यकरता के आचरण को भ्रष्टाचारी।

जरा सोच-विचार करें चुनाव के नाम पर दारू की नदियॉ और पेट्रोल का धुंआ उड़ाने के बजाए ईमानदार हो कर गरीब के झोपड़ी को रौशन किया जाता तो शायद देश का गरीब कम से कम चुनाव के नाम पर ही सही एक दिन गहरी नींद सोता और सपने देख लेता।

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1 Comment on "गरीब को सपना भी नसीब नहीं"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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रशीद भी कमल कर दिया अपने बेहद शानदार लिखा आपकी कलम को सलाम आपको दिली मुबारकबाद.

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