लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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-विजय कुमार-    Indian-People
पिछले दिनों हिन्दुओं की सशक्त आर्थिक भुजा (जैन समाज) को केन्द्र सरकार ने ‘अल्पसंख्यक’ घोषित किया है। इससे पूर्व भारत की ‘खड्ग भुजा’ के प्रतीक सिख और अध्यात्म व समरसता के संदेशवाहक बौद्ध भी अल्पसंख्यक घोषित हो चुके हैं। इसके लाभ-हानि को विचारे बिना एक भेड़चाल के रूप में अब जैन समाज भी इस अंधेरे मार्ग पर बढ़ गया है। वस्तुत: अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की धारणा का संबंध धर्म से नहीं मजहब से है। जब इस्लाम और ईसाई मत के अनुयायी दुनिया भर में गये, तो उन्होंने बंदूक और तलवार के बल पर वहां के स्थानीय लोगों का व्यापक नरसंहार किया। प्राणभय से अधिकांश लोगों ने उनका मजहब स्वीकार कर लिया; पर कुछ लोगों ने भयानक अत्याचार सहे। वे वन और पर्वतों में छिप गये या फिर कई तरह के घृणित कर्म स्वीकार किये; पर अपना धर्म नहीं छोड़ा।
जिन देशों में इस्लाम प्रभावी है, वहां ऐसे अत्याचार आज भी जारी हैं; पर ईसाई देशों में जब शिक्षा का विस्तार और लोकतंत्र का विकास हुआ, तो कुछ समझदार लोगों के आग्रह पर वहां के अल्पसंख्यक हो चुके मूल निवासियों की भाषा, बोली, संगति और रीति-रिवाजों की सुरक्षा की जाने लगी; पर भारत के संदर्भ में यह बात गलत है।
जब इस्लाम यहां आया, तो उसने अपनी क्रूर परम्परा के अनुसार नरसंहार करते हुए हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया। यद्यपि भारतीय व्यवस्था राजा केन्द्रित न होने के कारण सैकड़ों वर्ष में भी पूरा देश मुसलमान नहीं बना। इसके बाद दो चरणों में ईसाई आये। पहले तो वे धर्म प्रचार के लिए दक्षिण तथा पूर्वोत्तर भारत में आये। यहां उन्होंने भी छल और बल से धर्मान्तरण किया। दूसरी बार वे व्यापार के लिए आये और फिर भारत पर कब्जा कर लिया। इस बार उन्होंने भारतीय व्यवस्थाओं को तोड़कर शिक्षा और शासन सम्बन्धी अपनी व्यवस्थाएं थोपीं। इससे शिक्षित और सम्पन्न लोगों के मन में भारतीय व्यवस्था के प्रति घृणा उत्पन्न हो गयी और वे विदेशी ईसाइयों की बातों को ही प्रमाण मानने लगे।
इन अंग्रेजों का मूल उद्देश्य तो भारत को ईसाई बनाना ही था। अत: उन्होंने हिन्दू समाज को टुकड़ों में बांटने का षड्यंत्र रचा। सबसे पहले उन्होंने वन और पर्वतों में रहने वालों को ‘आदिवासी’ कहकर हिन्दुओं से काट दिया। इसके बाद उन वीर हिन्दुओं को पिछड़ा, अति पिछड़ा और दलित जैसी संज्ञाएं दीं, जिन्होंने विदेशी और विधर्मियों से टक्कर ली थी। भारत में सदा से ‘एकम् सत्, विप्रा: बहुधा वदन्ति’ (सत्य एक है; पर विद्वान उसे अलग-अलग तरह से कहते हैं) की मान्यता है। अत: हिन्दू धर्म के अन्तर्गत जैन, बौद्ध, सिख, शैव, वैष्णव, कबीरपंथी, आर्य समाज, ब्रã समाज आदि अनेक पंथ, मत और सम्प्रदाय बने। क्रमश: इन पंथों में भी अनेक उपपंथ बने। यह प्रक्रिया आज भी जारी है। नये पत्तों का आना और पुरानों का जाना पेड़ के जीवन का सूचक है, मृत्यु का नहीं। जैसे दस-बीस लोटे पानी डालने या निकालने से समुद्र को कुछ नहीं होता, ऐसे ही हजारों मत-पंथों के उदय और अस्त होने से हिन्दू धर्म के प्रवाह में कोई अंतर नहीं आया।
मुस्लिम शासक तो हिन्दुओं से या फिर आपस में ही लड़ने में व्यस्त रहे। इसलिए धर्मान्तरण के बावजूद वे हिन्दुओं को विभाजित नहीं कर सके; पर अंग्रेजों ने षड्यन्त्रपूर्वक लोगों को भाषा, भूषा, बोली, जाति, उपजाति, क्षेत्र आदि के आधार पर बांट दिया। हिन्दू और मुसलमानों के बीच विभाजन और भयानक मजहबी दंगों के कारण उन्हें फिर देश को ही बांटने में सफलता मिल गयी।
1947 में स्वाधीन होने पर भी ये षड्यंत्र चालू रहे, चूंकि सत्ताधीश लोग अंग्रेजों के ही मानसपुत्र थे। उन्होंने थोक मुस्लिम वोटों के लिए अल्पसंख्यकवाद को पुनर्जीवित कर दिया। इससे चुनाव में सफलता मिलने पर बाकी दलों के भी कान खड़े हो गये। इस प्रकार ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ की एक अंधी दौड़ प्रारम्भ हो गयी। नौकरी में आरक्षण से लेकर मदरसों को सहायता, इमामों को वेतन और आतंकियों के प्रति हमदर्दी जैसी छूट दी जाने लगीं। यद्यपि इसकी मलाई मजहबी नेता और उच्च जाति के मुसलमान ही खा रहे हैं। इसलिए अब निर्धन और पसमांदा (पिछड़े) मुसलमान इसके विरुद्ध लामबंद हो रहे हैं।
भारत में पारसी और यहूदियों के पूर्वज बाहर से आये थे। इस नाते वे यहां अल्पसंख्यक हैं, जबकि 99 प्रतिशत मुसलमान और ईसाई रक्त और वंश से यहीं के हैं। उनके पूर्वजों ने किसी डर, लालच या अज्ञानवश धर्म बदल लिया था। कई जगह उनके गोत्र और परम्पराएं हिन्दुओं जैसी ही हैं; फिर भी वे स्वयं को अल्पसंख्यक कहते हैं। दूसरी ओर पारसी और यहूदी भारतीय दूध में चीनी की तरह घुल गये हैं। देश की उन्नति में उनका भरपूर योगदान है। अनेक बड़े उद्योगपति, प्रशासक, वकील, शिक्षाविद आदि इन वर्गों से हुए हैं, जिन पर देश को गर्व है।
जहां तक जैन समाज की बात है, शेष हिन्दुओं से उनके रोटी-बेटी के संबंध हैं। उत्तर भारत के जैन मुख्यत: वैश्य हैं, जबकि राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात तथा दक्षिण में ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा अनेक वनवासी वर्ग के लोग भी जैन मतावलम्बी हैं। अहिंसक होने के कारण इन्होंने सेना की बजाय खेती और व्यापार को अपनाया। इसीलिए ये सम्पन्न भी हैं। अलग वंश या रक्त समूह न होने के कारण अधिकांश जैनियों के गोत्र व उपनाम आदि पूर्ववत ही हैं। वे होली, दीवाली जैसे हिन्दू पर्व भी मनाते हैं। आगे चलकर पूजा पद्धति में कुछ अंतर के चलते यहां भी श्वेताम्बर, दिगम्बर, स्थानकवासी, मूर्तिपूजक, तेरापंथी आदि कई उपशाखाएं बनीं। फिर भी ये सब जैन और हिन्दू ही हैं।
पिछले कुछ समय से अल्पसंख्यक के नाम पर मुस्लिम तुष्टीकरण होता देख इनके मुंह में भी पानी आ गया है। अल्पसंख्यक संस्थाओं को सरकार पैसा तो देती है; पर उनके संचालन में हस्तक्षेप नहीं करती। यद्यपि इस कारण प्रबन्धकों द्वारा कर्मचारियों का खूब शोषण भी होता है। एक समय आर्य समाज और रामकृष्ण ने भी स्वयं को अल्पसंख्यक घोषित करने की मांग की थी। अल्पसंख्यक के नाम पर नौकरी में कुछ आरक्षण भी मिलता है। सिख और बौद्ध यह लाभ ले रहे हैं। प्राय: व्यापारी होने से जैनियों को नौकरी की चाह तो नहीं है; पर वे अपनी संस्थाओं में सरकारी हस्तक्षेप नहीं चाहते। इसीलिए कुछ लोगों ने यह मुहिम चलायी है।
जनगणना के समय ऐसे लोग जैन मंदिर और मोहल्लों में जाकर कहते हैं कि वे अपना धर्म जैन लिखाएं, हिन्दू नहीं। लोकसभा चुनाव निकट देख कुछ लोगों ने राहुल बाबा को समझा दिया कि यह मांग मानने से उन्हें कुछ लाख वोट और कई करोड़ नोट मिल जाएंगे। बस, उन्होंने प्रधानमंत्री से कहकर इसकी घोषणा करा दी। अब जैन समाज के ही प्रबुद्ध लोग यह पूछ रहे हैं कि जो दस-बीस राजनेता, उद्योगपति या संत वहां गये थे, उन्हें जैनियों का प्रतिनिधि किसने और कब बनाया, यह भी पता लगना चाहिए। कुछ को यह शिकायत रही है कि जैनियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में संसद या विधानसभाओं में स्थान नहीं मिलते; पर वे भूलते हैं कि पहले इन सदनों में उनकी संख्या खूब रहती थी। समाजसेवी होने से सभी दल उन्हें टिकट देते थे। हां, उनके गोत्र हिन्दुओं जैसे होने के कारण पता नहीं लगता था कि वे जैन हैं; पर ‘हम हिन्दू नहीं, जैन हैं’ के नारे से हिन्दुओं के मन में भी कटुता बढ़ी है और उनकी संख्या लगातार घट रही है। नि:संदेह अब यह और घटेगी।
कुछ लोग कहते हैं कि अल्पसंख्यक होने से जैन मंदिरों की सुरक्षा होगी तथा जैन युवाओं को आगे बढ़ने के अवसर मिलेंगे। वस्तुत: उन पर हमले हर जगह मुसलमान और उनकी रक्षा हिन्दू ही करते हैं। नौकरी या शिक्षा में किसी जैन बच्चे का हक कभी नहीं मारा गया। हां, प्रतियोगी परीक्षाओं में असफल होने पर भी अपने पैसे के बल पर निजी संस्थानों में ऐसे मूर्ख छात्र खूब पाये जाते हैं।
एक प्रसिद्ध बंगला कवि मधुसूदन दत्त अंग्रेजी शिक्षा, रहन-सहन तथा एक लड़की के चक्कर में फंसकर ईसाई हो गये और अपने नाम से पहले माइकेल लगा लिया। जब श्री रामकृष्ण परमहंस ने पूछा, तो उसने कहा कि इसमें मेरा कुछ स्वार्थ था। इस पर परमहंस जी ने मुंह फेर लिया और कहा अपने स्वार्थ के लिए धर्म छोड़ने वाले का मुंह देखना भी पाप है। ऐसे ही कुछ जैनियों का स्वार्थ पूरे समाज को शेष हिन्दुओं की आंखों में नीचे गिराने पर तुला है।
जैसे वटवृक्ष की डालियों से फूटी जड़ें धरती में जम कर वृक्ष का पोषण करती हैं, ऐसे ही हिन्दू धर्म के सैकड़ों मत, पंथ, सम्प्रदाय आदि भी एक-दूसरे को पोषित करते हुए परस्पर सहारे का काम करते हैं; पर कुछ मूढ़ यह व्यवस्था बिगाड़ने पर तुले हैं। हिमालय से हजारों नदी, नाले और झरने निकलते हैं। अपना अस्तित्व अलग रखने पर उन्हें कोई नहीं पूछता; पर गंगा में मिलते ही वे स्वयं भी गंगा हो जाते हैं। हर नदी गंगा से मिलकर गंगासागर पहुंचती है; पर कुछ लोग गंगा में से अपनी धारा को वापस लेना चाहते हैं।
भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत के कारण हमारे देश का नाम भारत पड़ा है। यह कैसी उलटबासी है कि उनके वंशज खुद को अल्पसंख्यक कह रहे हैं। इस निर्णय से अधिकांश जैन लोग दुखी हैं। उन्हें एकजुट होकर ऐसे नेताओं का विरोध और बहिष्कार करना होगा, जिन्होंने उन्हें लाखों वर्ष की परम्परा से काटकर कुछ सौ वर्ष पुराने मुसलमान और ईसाई मजहब के साथ ला खड़ा किया है। जैसे थोड़े से आरक्षण और सरकारी सुविधा के लिए मुसलमानों में जाति, भाषा और फिरकों के नाम पर विवाद बढ़ रहे हैं, ऐसा ही अब यहां भी होगा।
इसलिए बीमारी जहां से पैदा हुई है, वहीं उसे नष्ट करना होगा। किसी भी समाज का भला उसकी आंतरिक इच्छाशक्ति से ही होता है। मुसलमानों की अशिक्षा और गरीबी का कारण यही है कि वे स्वयं आगे बढ़ना नहीं चाहते। इस कारण उन्हें नेता भी ऐसे ही मिलते हैं। क्या जैन समाज भी अब इसी मार्ग पर बढ़ेगा, यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।

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