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beggingअवनीश सिंह भदौरिया
जी हां हमारे देश में भिखारियों की तादाद दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही है और यह एक बड़ा चिंता का विषय है। वहीं, अगर हम देश में भिखारियों की बढ़ती संख्या की बात करें तो इसका सबसे बड़ा मूल-भूत कारण बेरोजगारी है। बढ़ती बेरोजगारी के चलते लोग भिखारी जैसे दलदल में धसने को मजबूर हैं। आज देश में कहीं भी चले जाओ आपको हर कौने में भिखारियों बड़ी तादाद मिलेगी। वहीं, आजाद भारत में भीख मांगते भिखारियों की तस्वीर देश की सबसे भयावह स्थिति बयान करती है। देश में 3 लाख 72,000 से भी ज्यादा भिखारी हैं लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इसमें से 78,000 शिक्षित भिखारी हैं। इन्होंने उच्च माध्यमिक या उससे ज्यादा तक की पढ़ाई की है। जबकि 3 हजार से ज्यादा के पास पेशेवर डिप्लोमा या ग्रेजुएशन की डिग्री है और पोस्ट-ग्रेजुएशन तक कर चुके हैं। ये आंकड़े 2011 की जनगणना के अनुसार, ‘पेशागत रूप से कोई काम नहीं करने वाले और उनका शैक्षिक स्तरÓ रिपोर्ट से हैं। आंकड़े बताते है कि भिखारी बनना उनकी पसंद नहीं बल्कि मजबूरी है। पढऩे-लिखने और डिग्री हासिल करने के बाद संतोषजनक नौकरी नहीं मिलने पर वे भिखारी बने हैं। वहीं, हमने जब कुछ भिखारियों से बात की तो उन्होंने बातया कि हम12 वीं पास है लेकिन नैकरी न मिलने से आज हम इस दलदल में हैं। वहीं, 12वीं पास 45 साल के भिखरी दिनेश खोधाभाई फर्राटेदार ने बाताया कि मैं गरीब हो सकता हूं लेकिन मैं ईमानदार हूं। मैं दिन के 200 रुपये से ज्यादा कमाता हूं जो कि मेरी आखिरी नौकरी से ज्यादा है। मेरी आखिरी नौकरी एक अस्पताल में वॉर्ड ब्वॉय की थी जिसे दिन के 100 रुपये मिलते थे। दिनेश अहमदाबाद के भद्रकाली मंदिर में 30 लोगों के समूह के साथ भीख मांगते हैं। 52 साल के बी.कॉम तीसरे साल में फेल सुधीर बाबूलाल दिन के 150 रुपये कमाते हैं। अहमदाबाद के वीजापुर गांव से सुधीर अच्छी नौकरी के सपने लेकर आए थे। नौकरी मिल भी गई। 10 घंटे काम कर महीने में 3 हजार मिलते थे। सुधीर बताते हैं कि पत्नी के छोडऩे के बाद वे नदी के किनारे सोते हैं और भीख मांगते हैं। अच्छी नौकरी के सपनो पर फिर गया पानी। वहीं, भिखारियों के लिए काम करने वाले एक गैर सरकारी संगठन मानव साधना के बीरेन जोशी बताया कि, भिखारियों को भीख में आसानी से पैसा मिल जाता है। इसी लालच की वजह से वो भीख मांगने का काम छोडऩा नहीं चाहते। समाजशास्त्री गौरांग जानी कहते हैं, जब गेजुएशन के बाद भी लोग भीख मांग रहे हैं इसका मतलब है कि देश में बेरोजगारी की समस्या बहुत गंभीर रूप ले चुकी है। संतोषजनक नौकरी नहीं मिलने के बाद वे भीख मांगने लगते हैं। अगर हम देश में भिखारियों का एक शहर बासा दें तो आराम से बस सकता है और यह कहना गलता भी नहीं होगा क्योंकि देश में अभी जो तेजी से भिखारियों की संख्या बढ़ रही है। उससे तो यही प्रतीत होता है कि कुछ वर्षों में शहर बसाने ही पड़ेंगे। इस स्थिति के मूल-भूत कारण की बात करें तो हमारे देश में बेरोजगारी की रफ्तार तेजी से आगे बढ़ रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी लोकसभा चुनाव में अपने सघन चुनाव प्रचार के दौरान देश में बढ़ती बेरोजगारी पर बोलना नहीं भूलते थे। अगर पीएम जी को पता नहीं है तो उन्हें हम जरूर बातें दें कि देश में बेरोजगारी के कारण भिखारियों की तादात दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है और यह भी बता दें कि देश में बेरोजगारी की संख्या सातवें आसमान पर पहुंच रही है।
मालूम नहीं कि उन्हें देश में बेरोजगारी से संबंधित ताजा आंकड़ों की जानकारी है या नहीं। पर आंकड़ें डरावने हैं। सबसे खराब स्थिति पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, केरल, ओडिशा, असम की है। वहीं सबसे अच्छे राज्यों में गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा तमिलनाडु हैं। बढ़ती तादाद बेरोजगारों की भारतीय संख्यिकी विभाग की तरफ से हाल ही में जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, देश में बेरोजगारों की तादाद लगातार बढ़ रही है। आंकड़ों के मुताबिक,देश में बेरोजगारों की संख्या 11.3 करोड़ से अधिक है। 15 से 60 वर्ष आयु के 74.8 करोड़ लोग बेरोजगार हैं, जो काम करने वाले लोगों की संख्या का करीब 15 फीसद है। जनगणना में बेरोजगारों को श्रेणीबद्ध करके गृहणियों, छात्रों और अन्य में शामिल किया गया है। यह अब तक बेरोजगारों की सबसे बड़ी संख्या है। वर्ष 2001 की जनगणना में जहां 23 फीसद लोग बेरोजगार थे। वहीं, 2011 की जनगणना में इनकी संख्या बढ़कर 28 फीसद हो गई। पिछले तीन वर्षों में रोजगार वृद्धि के लिए कोई प्रयास या नीति नहीं बनाई गई, जो रोजगार सृजन के लिए उत्प्रेरक का काम करती। इस बीच, अंतरराष्ट्रीय श्रम आयोग की ने भी अपनी एक रिपोर्ट में भारत में बेरोजगारी के मसले को उठाया था। उसके अनुसार, महिला रोजगार संकट में हैं। पूंजी आधारित अर्थव्यवस्था में महिला मजदूरों के लिए रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं। कृषि जैसे क्षेत्रों में अब उतनी मजदूरी नहीं बची। वहाँ से लोगों को निकाला जा रहा है। लेकिन ये महिलाएं अभी दूसरे क्षेत्रों जैसे सर्विसिस सेक्टर में काम नहीं कर सकतीं क्योंकि उनके पास उतनी योग्यता नहीं है। घटती संख्या महिला मजदूरों की आईएलओ के आँकड़ों को आधार माना जाए तो क्या वजह है कि बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था में महिला मजदूरों की संख्या घट रही है। सेंटर फॉर विमेन डिवेलेपमेंट स्टीडज़ में वरिष्ठ अध्येता नीता कहती हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार पूंजी आधारित अर्थव्यवस्था होती जा रही है जिसमें मजदूरों की जगह और जरूरत कम हो रही है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन में ये भी कहा गया है कि महिला मजदूरों की गिरती संख्या का एक ये भी है कि महिलाएँ स्कूल जा रही हैं, शिक्षित हो रही हैं। आईएलओ के मुताबिक रोजगार के कुछ नए अवसर भी होगें, लेकिन वे अंशकालिक और कम तनख्वाह वाले होंगे। कुल मिलाकर वह बेरोजगारी की तुलना में नाम मात्र का होगा। वहीं, माना जा रहा है कि बेरोजगारों की संख्या 2020 तक बढ़ कर 100 करोड़ तक पहुंच जाएगी। देश के कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसर लगातार कम होते जा रहे हैं और इस क्षेत्र में केवल 50 प्रतिशत ही रोजगार के अवसर बचे हैं जो पहले के मुकाबले बहुत कम हैं। इसलिए औद्योगिक उत्पादकता को बढ़ाने के लिए मुख्य तौर पर स्किल डिवैल्पमैंट की अत्यधिक आवश्यकता है। वर्तमान सरकार इस पर काफी जोर लगा रही है। देश में वर्ष 2022 तक 50 करोड़ लोगों को स्किल डिवैल्पमैंट के अन्तर्गत लाने का लक्ष्य रखा गया है। वहीं, पीएम नरेंद्र मोदी जी की बात करें जब से उन्होंने सत्ता की संभाली है तब से अब तक नौकरी तो नहीं लेकिन मंहगाई को जरूर तब्जो दी है और इसका नती आज हमारे सामने है। ऐसे हालातों में गरीब और गरीब होता जा रहा है। पीएम अमीरों को और अमीर बनाने में काई कसर नहीं छोड़ रहे हैं और यह हम सब भी बखूबी समझ सकते हैं।

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