लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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air asia

इंडोनेशिया के सुरबाया शहर से उड़ान भरकर सिंगापुर की ओर जा रहे विमान का गुम हो जाना स्तब्ध करने वाली घटना थी, लेकिन अब विमान का मलवा एवं शव उसी स्थल पर मिल गये हैं, जहां से राडार पर विमान के संकेत टूट गये थे। हालांकि मलेशिया के इस विमान कंपनी एयर एशिया के हवाई जहाज क्यूजेड 8501 में सबार यात्रियों के बचने की उम्मीद पहले ही कम थी, अब मलवे की बरामदगी के साथ तय हो गया है कि विमान सुरक्षा संबंधी कारणों में लापरवाही बरते जाने के कारण दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। इस विमान का लापता होना समूची दुनिया के लिए इसलिए आश्चर्यजनक था,क्योंकि इसके पहले इसी साल 8 मार्च को एनएच-370 रहस्यमयी ढंग से गायब हो चुका है। इस विमान की गुत्थी अभी सुलझी भी नहीं थी कि इसी तर्ज पर यह दूसरा विमान गायब हो गया था। इन दोनों घटनाओं के बीच 17 जुलाई 2014 को मलेशिया एयरलाइंस का ही विमान बोइंग-77 आतंकियों ने युक्रेन के ऊपर से उड़ान भरते वक्त मार गिराया था। इन दोनों दुर्घटनाओं में एक भी यात्री के बचने की खबर नहीं मिली थी।

एयर एशिया – इंडोनेशिया के इस विमान के उड़ान भरने के दो से ढाई घंटे के बीव हवाई यातायात नियंत्रण प्रणाली से संपर्क टूट गया था। राडार की स्क्रीन से विमान के उड़ान भरते रहने के संकेत एकाएक मिलना बंद हो गए। विमान में महज 4-5 घंटे की उड़ान भरने लायक ईंधन था,ऐसे में उसके लंबे समय तक हवा में भटकने की उम्मीद कम ही थी। जिस जावा द्वीप समूह के ऊपर यह यान उड़ान भर रहा था,वहां बादलों का मिजाज इतना बिगड़ा हुआ था कि यहां किसी भी वायुयान के सामान्य रूप से उड़ने की संभावनाएं कम ही थीं। बावजूद कुछ अन्य विमान भी उड़ान भर रहे थे। जबकि कंपनियों को बिगड़ते मौसम में यात्री विमानों की उड़ानों से बचना चाहिए। इंडोनेशिया परिवहन मंत्रालय ने कहा भी था कि पायलट ने खराब मौसम के कारण विमान का मार्ग बदलने और 38 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ान भरने की अनुमति मांगी थी,लेकिन इनकार कर दिया गया था। ऊंची उड़ान की मांग करते वक्त विमान 32 हजार फीट की ऊंचाई पर था। इस वार्तालाप से यह संकेत तो मिलता है कि चालक दल सर्तक था और सावधानीपूर्वक उड़ान भरने के लिए वह विपरीत परिस्थिति में उड़ान भरने की इजाजत मांग रहा था, जो मिली नहीं। दरअसल मेघगर्जना और बिजली तूफानों से बचने के लिए पायलट विमान को ऊंचाई पर उडान भरने की मांग करते हैं किंतु इससे भी खतरा रहता है। अधिक ऊंचाई पर जाने के बाद ठंड के चलते राडार फ्रीज होने का खतरा बढ जाता है। लिहाजा ऐसे में विमान के भटकने की उम्मीद बढ जाती है।

लेकिन ये हालात कुछ वैसे ही थे,जिन परिस्थितियों में 8 मार्च 2014 को एनएच-370 शिकार हुआ था। इसके दुर्घटनाग्रस्त होने में आत्मघाती आतंकियों के शामिल होने की आशंका जताई गई थी। इसलिए इस दुर्घटना के साथ भी ऐसी ही आशंका उभर रही थी। एनएच-370 में चालक दल समेत 239 यात्री मारे गए थे। इस ताजा हादसे में 162 यात्रियों के हताहत होने की आशंका है। आत्मघाती दस्ते ने ही अमेरिका में यात्री विमान से 9/11 की घटना को अंजाम दिया था। यात्री विमानों को विस्फोटक सामग्री में बदलने की आतंकियों की यह क्रूरतम मानसिकता का प्रतीक है। जाहिर है, हवाई यात्राओं में सुरक्षा की दरकार बढ़ती जा रही है।

8 मार्च 2014 को जो विमान गायब हुआ था,उसका नौ माह बीत जाने के बाद भी पता नहीं चला है। जबकि इस परिप्रेक्ष्य में विमानन इतिहास की सबसे बड़ी और मंहगी खोज को अमल में लाया गया था। तलाश के इस अभियान में 34 विमान,40 पोत और दस देशों के दल लगे हुए थे। भारत भी इस खोजी मुहिम में शामिल था। भारत की दिलचस्पी इसलिए भी थी, क्योंकि यह विमान हिंद महासागर के ऊपर उड़ान भरने के दौरान रहस्मय तरीके से लापता हुआ था। दुनिया के नामी खोजी दस्तों ने थल,जल और नभ सबकी दूरी आधुनिकतम तकनीकी यंत्रों व उपकरणों से नाप डाली, लेकिन विमान का कोई सुराग आज तक हाथ नहीं लगा। जाहिर है, ब्रह्माण्ड के विस्तार में रहस्य आज भी कायम है।

हालांकि विमानों के दुर्घटनाग्रस्त होने की खबरें आती रहती हैं। सामान्य खबरें तकनीकि खराबी,मौसम की प्रतिकूलता अथवा पक्षियों के टकराने से जुड़ी होती हैं। लेकिन अमेरिका में घटी 9/11 की दुर्घटना के बाद आतंकी भी हवाई दुर्घटनाओं में हाथ आजमा कर खौफ के हालात बनाने का काम करने लग गए हैं। 17 जुलाई 2014 को नीदरलैंड की राजधानी ऐम्सटरडम से क्वालालंपुर जा रहा मलेशियाई एयरलाइंस का विमान एनएच-17 जब यूक्रेन के ऊपर से उड़ रहा था, तभी इसे विद्रोहियों ने मिसाइल दाग कर मार गिराया था। नतीजतन विमान में सवार सभी 298 यात्री और चालक दल के सदस्य काल के गाल में समा गए थे। यह घटना रूस से लगी सीमा के निकट घटी थी। इस दुर्घटना से आवरण इसलिए हट गया,क्योंकि यह मिसाइल हमले का शिकार हुआ था। साथ ही यूक्रेन के राष्ट्रपति पेट्रो पेरोशैन्को ने इस हादसे के पीछे वहां के अलगाववादियों का हाथ बताया था। जबकि इसके विपरीत इस घटना का दोष अलगाववादियों के नेता आद्रंई पुरगिन ने यूक्रेन की सेना पर मढ़ा था। इन अलगाववादियों को रूस समार्थित माना जाता है। लेकिन रूस इस तथ्य को नकारता रहा है। इस तथ्य को मुगालता बनाए रखने के पीछे कारण यह भी रहा है कि इस विमान में अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के नागारिक ज्यादा संख्या में सवार थे। लिहाजा यदि यह साबित हो जाता कि रूस समर्थित आतंकियों ने हमला बोला है तो प्रभावित देश रूस के खिलाफ मोर्चा खोल देगें ? गोया अलगाववादियों की दलील इसलिए तार्किक नहीं थी, क्योंकि 32 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ रहे विमान को मार गिराने की मिसाइल उनके हाथ कैसे लगी ? यहां सवाल यह भी उठता है कि आखिर दुनिया में हल्ला बोल रहे आतंकियों या यूक्रेन के विद्रोहियों के पास हथियार आ कहां से रहे हैं ? इस लिहाज से देखे तो चीन और साऊदी अरब से लेकर रूस और अमेरिका तक अनेक विकसित व शाक्तिशाली देश शंकाओं से घिरे नजर आते हैं। जबकि यही देश अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद की घोर निंदा करते दिखाई देते हैं। लेकिन सिलसिलेवार घट रही हवाई दुर्घटनाओं से इन देशों को अपनी गिरेबान में झांककर आत्ममंथन करने की जरुरत है, क्योंकि इन हादसों के बहाने आतंकी इन्हीं देशों के नागरिकों को मौत के घाट उतारने लग गए हैं। जाहिर है, दुनिया के तमाम अशांत क्षेत्रों के ऊपर से गुजरने वाली हवाई उड़ानें, जोखिम की मजबूरी से गुजर रही हैं।

एयर एशिया, मलेशिया की एक कंपनी है, जो किफायती विमान सेवा के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती है। लेकिन किफायत के फेर में सुरक्षा से खिलवाड़ बर्दाश्त से बाहर की बात है। वैसे इस कंपनी की सेंवाएं इतनी व्यापक हैं कि यह 22 देशों के करीब 100 नगरों में अपनी सेवाएं उपलब्ध कराती है। ऐशियाई देशों में तो इसकी सहायक कंपनियां भी हैं। सुरक्षा संबंधी लापरवाहियों के चलते 2007 में यूरोपीय संघ ने अपने यहां इसकी उड़ानों पर रोक लगा दी थी। लिहाजा यह सवाल मौजूं था कि ताजा सुरक्षा संबंधी बद्इंतजामी के कारण तो यह घटना नहीं घटी ? विकासशील देशों की विमानन कंपनियां ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की होड़ में भी लापरवाही बरतती पाई गईं हैं। मलेशियाई विमान से जुड़ी यह तीसरी बड़ी घटना मुनाफे की इस होड़ से भी जोड़ कर देखी जा रही है। बहरहाल हवाई परिवहन व्यवस्था को संकटमुक्त बनाए रखने की दृष्टि से जरुरी हो गया है कि इन सिलसिलेबार हादसों की कोई अंतरराष्ट्रिय समिति जांच करे और दुर्घटना के रहस्यों से पर्दा उठाए ? अन्यथा यात्री आशंका और अभिशाप से जुड़ी यात्राओं के लिए कब तक मजबूर होते रहेंगे ?

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