लेखक परिचय

अरविंद जयतिलक

अरविंद जयतिलक

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं।

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आरोपों के चक्रव्यूह से निकलने की कशमकश के बीच दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित कांग्रेस की महारैली उसकी भविश्य की चिंताओं और चुनौतियों का समाधान करने में कितना सफल रहेगी यह कहना अभी कठिन है। किंतु जिस तेवर में प्रधानमंत्री समेत सोनिया और राहुल ने विपक्ष को निशाने पर लेते हुए उस पर आर्थिक सुधार की राह में रोड़े अटकाने, भ्रष्टाचार करने और देश को गुमराह करने का आरोप मढ़ा है उससे स्पष्ट है कि कांग्रेस के पास अपनी साख बचाने के लिए विपक्ष पर हमला बोलने के अलावा दूसरा उपाय नहीं बचा है। शायद कांग्रेस मान ली है कि भ्रष्टाचार के आरोपों से उसे मुकित मिलने से तो रही बेहतर यही होगा कि विपक्षी दलों को अपने जैसा बता बदनाम किया जाए। यही वजह है कि वह अपनी छवि दुरुस्त करने के बजाए विपक्ष के दामन को दागदार बताने पर ज्यादा जोर दे रही है। दो राय नहीं कि भ्रष्टाचार के मसले पर सत्तापक्ष और विपक्ष सबका रवैया एक जैसा है। भ्रष्टाचार को लेकर कोर्इ संजीदा नहीं है। भ्रष्टाचर के प्रति सचमुच संवेदना होती तो लोकपाल बर्फखाने में नहीं जाता। लेकिन इसका तात्पर्य यह भी नहीं कि सरकार के भ्रष्टाचार पर विपक्ष को ऊंगली उठाने का अधिकार नहीं रह गया है। संसदीय लोकतंत्र में सत्तापक्ष के अहंकार और जनविरोधी कृत्यों की आलोचना विपक्ष का नैसर्गिक अधिकार है। उससे उसको वंचित नहीं किया जा सकता। लेकिन दुर्भाग्य से यूपीए सरकार इसे स्वीकारने को तैयार नहीं है। उसकी बानगी रामलीला मैदान के रैली में भी देखने को मिली। देखा जाए तो यह रैली कर्इ संदेशो और उद्देश्यों को समेटे हुए है। किंतु कांग्रेस अपने उद्देश्यों में कितनी सफल हुर्इ यह तो वही जाने। लेकिन प्रधानमंत्री समेत कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया व राहुल विपक्ष को इतना भान कराने में जरुर सफल रहे कि कांग्रेस कमजोर नहीं है और वह हर चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है। कांग्रेस को आभास हो चला है कि आमचुनाव किसी भी समय पर हो सकता है। न केवल विपक्ष बलिक सहयोगी दल भी उसका संकेत देना शुरु कर दिए हैं। बाहर से समर्थन दे रहे मुलायम सिंह यादव और मायावती ने तो दो कदम आगे बढ़ अपने प्रत्याषी तक घोषित करना शुरु कर दिए हैं। ऐसे में कांग्रेस का यह अंदेशा कि अगर वह बचाव की मुद्रा में बनी रही तो आने वाले दिन उसके लिए और चुनौतीपूर्ण होंगे गलत नहीं है। ऐसे में उसके पास अपनी सियासी जमीन को बचाने के लिए केवल दो विकल्प बच जाते हैं। एक सरकार की उपलब्धियों को आमजन तक पहुंचाना और दूसरा विपक्ष पर आक्रामक तरीके से हमला बोलना। दिल्ली की रैली में कांग्रेस इसी दांव को आजमाती देखी भी गयी। सोनिया और राहुल दोनों ने अपनी सरकार की उपलब्धियों का जमकर बखान किया और भविश्य की योजनाओं का खाका खीचा। गौरतलब है कि विपक्ष और टीम केजरीवाल जिन मुददों को हथियार बना सरकार की चूलें हिला रहे हैं राहुल और सोनिया उन्हीं मुददों पर जनता से भावुक अपील कर अपनी बात सफार्इ से रखते देखे गए। इससे स्पष्ट है कि जिन मुददों से कांग्रेस अभी तक बचती रही है अब उसका दृढ़ता से मुकाबला करने का मन बना ली है। फिलहाल सरकार तीन मुददों पर सर्वाधिक आलोचना झेल रही है। वे हैं महंगार्इ, भ्रष्टाचार और एफडीआइ। विपक्ष से लेकर टीम केजरीवाल सभी इन्हीं मुददों पर केन्द्रित हो सरकार के खिलाफ आग उगल रहे हैं। फिलहाल सरकार के पास महंगार्इ कम करने का कोर्इ ठोस उपाय नहीं है। रिजर्व बैंक भी अपना हाथ खड़ा कर दिया है। लिहाजा सरकार वैश्विक मंदी का राग अलाप अपना बचाव कर रही है। लेकिन एफडीआइ के सवाल पर अब वह बचाव की मुद्रा में नहीं रहेगी उसका संकेत दे दिया है। वह भी यह जानते हुए कि सरकार को समर्थन दे रहे सहयोगी दल भी इस मसले पर उसके साथ नहीं हैं। सरकार इस बात को ले कर आशंकित भी है कि शीत सत्र के दौरान एफडीआइ के मसले पर उसे भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। बावजूद इसके वह पीछे हटने को तैयार नहीं है। रैली में राहुल गांधी का एफडीआइ के सवाल पर आगे बढ़कर मोर्चा लेना और विपक्ष पर वार करना इस बात का संकेत है कि सरकार इस मसले पर घुटने टेकने के बजाए अब टकराने का फैसला कर ली है। रैली में एफडीआइ पर राहुल गांधी ने स्पष्ट रुप से कहा है कि इससे किसानों को फायदा होगा और अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। यही नहीं उन्होंने इस मसले पर मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी को घेरते हुए यह भी कहा कि ऐसे समय में जब देश के लिए सकारात्मक माहौल है और दुनिया भारत की ओर देख रही है वैसी घड़ी में विपक्ष बिना सोचे-समझे सरकार की नीतियों की आलोचना कर देश का अहित कर रहा है। वे भाजपा पर यह भी आरोप लगाते सुने गए कि पहले वह एफडीआइ के पक्ष में थी और जब सत्ता के बाहर है तो उसका विरोध कर रही है। मजे की बात यह कि रैली में राहुल गांधी दोहरी भूमिका निभाते हुए सरकार की उपलब्धियों को सराहा भी और केजरीवाल की तरह आम आदमी बन आम आदमी की वकालत भी की। आमतौर पर सरकार पर आरोप लगता है कि वह आम आदमी के हितों और अधिकारों को लेकर संवेदनषील नहीं है। टीम केजरीवाल बार-बार सत्ता में आम आदमी का दखल बढ़ाने पर जोर दे रही है। रैली में राहुल गांधी भी आम आदमी के अधिकारों को लेकर चिंता व्यक्त करते सुने गए। उन्होंने युवाओं से राजनीति में शामिल होने का आह्वान करते हुए वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था को आम आदमी के खिलाफ बताया। उन्होंने इस व्यवस्था में समाज के कमजोर और गरीब तबके को और सक्रिय भूमिका प्रदान करने की जरुरत पर बल दिया। राजनीतिक दलों को ताकीद किया कि जब तक हम आम आदमी के लिए द्वार नहीं खोलेंगे तब तक हम विकास नहीं कर सकते हैं। मतलब साफ है राहुल गांधी विपक्ष और टीम केजरीवाल के उन सवालों को पहले ही उठाकर उसकी धार को भोथरा कर देना चाहते हैं जिससे कांग्रेस को लहूलुहान होने की आषंका है। रैली में सोनिया गांधी मनरेगा और सूचना अधिकार कानून को अपनी सरकार की उपलबिध गिनाते हुए अन्य जनकल्याणकारी योजनाएं लागू करने का भी संकेत दिया। भ्रष्टाचार के मसले पर भाजपा को आर्इना दिखाते हुए कहा कि जो दूसरों के लिए गडढा खोदते हैं उनके लिए कुंआ तैयार रहता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि कांग्रेस और सरकार की अंतरात्मा साफ है और इरादें नेक हैं और कांग्रेस को रक्षात्मक होने की जरुरत नहीं है। उन्होंने आरटीआर्इ कानून का श्रेय लेते हुए यहां तक कहा कि इस तरह का कानून सिर्फ वही लोग ला सकते हैं जो भ्रश्टचार का उन्मूलन चाहते हैं। लेकिन मौंजू सवाल यह है कि क्या इस तरह के परोपदेश और सफार्इ से आमजन के मन में सरकार के प्रति जन्मा नकारात्मक भाव में बदलाव आएगा। आमजन के मन में सवाल अभी भी कौंध रहा है कि जब सरकार भ्रष्टाचार को लेकर इतना ही संजीदा है तो फिर वह भ्रष्टाचारियों को संरक्षण क्यों दे रही है? क्या वजह है कि वह भ्रष्टाचार के सवाल पर पारदर्षिता के बजाय दोहरा मापदंड अपना रही है? आमजन इस बात को लेकर हैरान है कि जिन मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप हैं उन्हें मंत्रिपद से हटाने के बजाए सरकार उनका ओहदा बढ़ाने में दिलचस्पी क्यों ले रही है? सरकार के पास इन सवालों का सटीक जवाब नहीं है। ऐसे में इस निष्कर्ष पर पहुंचना कि दिल्ली की रैली से कांग्रेस और सरकार को अपनी छवि सुधारने में मदद मिलेगी इसकी संभावना कम है। सरकार को छवि सुधारने के लिए अपने सिद्धांत और व्यवहार के बीच का अंतर कम करना होगा। उसे चिंतन करना होगा कि यूपीए टू शासन के साढ़े तीन साल के शासन में भ्रष्टाचार, महंगार्इ और घोटाले के अलावा आम जन को उसने दिया ही क्या है?

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