लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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-लिमटी खरे

मध्य प्रदेश के हृदय प्रदेश की राजधानी भोपाल और उसी सूबे में भगवान शिव की नगरी सिवनी में क्या समानता है, इस प्रश्न का उत्तर दोनों ही शहरों में रहने वाला हर एक नागरिक दे सकता है। दोनों ही शहरों में पेयजल के पर्याप्त स्त्रोत होने के बावजूद भी दोनों ही शहरों के नागरिकों के कंठ सूखे और मटके रीते रहते हैं। भोपाल में विशाल जलसंग्रह क्षमता वाले बडे तालाब और सिवनी शहर में पानी से लवरेज छ: तालाब होने का कोई ओचित्य नहीं है। सिवनी में एशिया के सबसे बडे मिट्टी के बांध संजय सरोवर परियाजना के होते हुए भी शहरवासियों के कंठ सूखे ही रह जाते हैं। भोपाल के नागरिकों की प्यास बुझाने के लिए करोडों रूपए व्यय कर होशंगाबाद से नर्मदा जल भोपाल लाने की योजना पर काम चल रहा है।

कमोबेश यही आलम सिवनी शहर का है। सिवनी शहर में सौ साल पहले जब शहर की आबादी लगभग बीस हजार हुआ करती थी तब शहरवासियों को पानी की आपूर्ति के लिए 1904 में बबरिया जलाशय का निर्माण कराया गया था। इस तालाब से शहर में नहरों के माध्यम से पानी की आपूर्ति की जाती थी। बताते हैं कि बबरिया जलाशय के में जब पानी ओवर फ्लो होता था तब एक नहर के माध्यम से इसका पानी शहर के बीच स्थित दलसागर तालाब में छोडा जाता था। दलसागर में पानी ज्यादा होने पर अंदर ही अंदर एक नहर के माध्यम से पानी बुधवारी तालाब पहुंचता था। बुधवारी तालाब के भर जाने पर यह पानी उसके पश्चिमी हिस्से से बाहर निकलकर बहते हुए बैनगंगा नदी में मिल जाया करता था। आज भी वे भूमिगत नहरें मौजूद हैं।

इसके उपरांत कालांतर में डॉ.विजय कुमार सरीन के दादा लाल हर गोविंद राय सरीन द्वारा भूमिगत पाईप लाईनों के माध्यम से पानी का प्रदाय आरंभ किया गया था। यही कारण है कि डॉ.वी.के.सरीन के दादा और अवतार सिंह के पिता को आज भी लोग ”नल बाबू” के नाम से याद किया करते हैं। जब व्यवस्था में परिवर्तन हुआ तो पानी प्रदाय के लिए प्रयुक्त होने वाली नहरों ने गंदे पानी की निकासी के नालों का रूप ले लिया। शहर के बडे नाले पुरानी नहरें ही हैं, जिनसे पहले नागरिक प्यास बुझाते थे। इसी बीच सिवनी से लगभग 12 किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में अवस्थित मुंडारा से निकलने वाली पुण्य सलिला बैनगंगा के लखनवाडा तट पर से पानी निकालकर छिंदवाडा रोड स्थित फिल्टर प्लांट लाया जाता था, और इसके बाद इस पानी को टंकियों के माध्यम से शहर में प्रदाया किया जाता था।

नब्बे के दशक में जब शहर की आबादी बढी तब कांग्रेस के शासनकाल में शहरवासियों को पानी पिलाने के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री विमला वर्मा के प्रयासों से बने भीमगढ बांध के जल भराव वाले क्षेत्र सुआखेडा से एक नल जल योजना बनाई गई। इससे पानी को पहले श्रीवनी लाया गया जहां इसे साफ कर फिर शहर की टंकियों को भरने का काम किया गया। इस कार्य योजना को 2025 में सिवनी की आबादी का अनुमान लगाकर दोनों समय पानी प्रदाय हो बनाया गया था। विडम्बना है कि दो समय तो छोड लोगों को महीने में बीस दिन भी एक समय पूरा पानी नहीं मिल पा रहा है। याद पडता है कि जब दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्रित्वकाल में सिवनी के प्रभारी मंत्री गणपत सिंह उईके ने श्रीवनी फिल्टर प्लांट का अवलोकन किया तो उन्होंने इसे देख बडा आश्चर्य व्यक्त किया था कि शहर से इतनी दूर पानी साफ कर फिर ले जाने पर क्या पानी साफ रह पाता होगा। उनके इस आश्चर्य को तत्कालीन लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के अधिकारियों ने हवा में उडा दिया।

आज आलम यह है कि जनवरी माह आते आते ही शहर की पेयजल व्यवस्था चरमराने लगती है। मजे की बात तो यह है कि इस योजना में दो जगहों पर मशीन के माध्यम से पानी निकाला जाता है पहले तो सूआखेडा में मशीन पानी खीचकर श्रीवनी भेजती है, फिर श्रीवनी से दूसरी मशीन साफ पानी को टंकियों तक पहुंचाती है। पालिका की जर्जर हालत किसी से छिपी नहीं है। इस साल तक सुआखेडा का बिजली का बिल पांच करोड 81 लाख 52 हजार रूपए बाकी है, तो श्रीवनी फिल्टर प्लांट का बिल 7 करोड 18 लाख 99 हजार। इस तरह कुल मिलाकर विद्युत मण्डल को पालिका की बिजली के बिल की देनदारी 13 करोड 51 हजार रूपए है। अपने देयकों की वसूली के लिए विद्युत मण्डल द्वारा जब तब पालिका की कालर पकडकर उसे लाईन काटने की धमकी दे दी जाती है।

जिले में राजनैतिक बिसात पर अपने मुहरे बिछाने वाले नेता यह बात भली भांति जानते हुए कि नगर पालिका को हर साल विकास की मद में मिलने वाली रकम का एक बहुत बडा भाग बिजली का बिल भरने में ही चला जाता है, फिर भी उनकी चुप्पी संदेहास्पद ही है। परिस्थितियों को देखकर लगता है कि कहीं एसा तो नहीं कि इस भीमगढ जलावर्धन योजना में बंदरबांट करने वाले जनसेवकों और ठेकेदारों के पेरोल पर ये नेता काम कर रहे हों। नल पानी उगलें अथवा नहीं इन नेताओं की सेहत पर असर इसलिए नही पडता है कि नगर पालिका में चाहे जिसकी सरकार हो, इन नेताओं के दरवाजों पर पानी के टेंकर इनकी एक आवाज पर हाजिर हो जाते हैं। मरण तो बेचारी निरीह जनता की ही है।

आश्चर्य की बात तो यह है कि भारी विरोध ढेर सारी शिकायतों और मुख्यमंत्री द्वारा भीमगढ जलावर्धन योजना की स्तरहीनता के लिए जांच के आदेश किए जाने के बाद भी इसकी जांच अब तक नहीं हो सकी है। जाहिर है कि घटिया निर्माण करने वाली लाबी के हाथ बहुत ही उपर तक हैं, जो इस जांच को रोकने में कामयाब रह रहे हैं। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि सत्ता में चाहे भाजपा रही हो या कांग्रेस, किसी ने भी जनता के दुखदर्द को समझना ही नहीं चाहा। निहित स्वार्थों में डूबे जनसेवकों को इस बात की कोई परवाह नहीं है कि उन्हें विधायक या सांसद इसी जनता ने अपने मत को देकर बनाया है। जनता ने अगर आपको नेता समझकर आपके उपर विश्वास किया है तो आपका कर्तव्य बनता है कि निहित स्वार्थों को तिलांजली देकर आवाम के दुखदर्द को समझें।

कुछ सालों पहले तत्कालीन विधायक नरेश दिवाकर से चर्चा के दौरान उन्होंने बबरिया जलावर्धन योजना के बारे में बताया था। यह उनके लिए महात्वाकांक्षी योजना हुआ करती थी, और होना भी चाहिए था। उस दौरान हमने उन्हें कहा था कि भीमगढ जलावर्धन योजना की पाईप लाईन जब तब फूट जाया करती है, जिससे शहर वासी हलाकान हो जाते हैं। हमने सुझाव दिया था कि बेहतर होगा कि बबरिया जलावर्धन योजना में काम इस तरह करवाया जाए कि भीमगढ से आने वाली पाईप लाईन को सीधे बबरिया में छोडा जाए, और श्रीवनी के जलशोधन संयंत्र की मशीनों को बबरिया में लाकर स्थापित कर दिया जाए। इससे दो लाभ होंगे, अव्वल तो यह कि जब तब पाईप लाईन फूटने का असर शहरवासियों पर नहीं पडेगा क्योंकि बबरिया में इतना पानी रहता ही है कि यह एकाध माह तो शहर की पेयजल व्यवस्था को गडबडाने से बचा सकता है, दूसरे यह कि बबरिया से फिल्टर किया पानी काफी हद तक साफ ही रहकर लोगों के घरों तक पहुंच सकेगा। पता नहीं क्यों इस सुझाव पर अमल नहीं किया गया।

आज हालात यह है कि भीमगढ से सिवनी तक पानी लाने में लगभग एक लाख रूपए रोज की बिजली जलाई जा रही है, फिर भी रियाया के कंठ सूखे ही हैं। उद्धाटन के बाद से ही भीमगढ जलावर्धन योजना की सांसें उखडने लगीं थीं। शहर के हेण्डपंप, कुंए, बावली, तालाब आदि जलस्त्रोत रखरखाव के अभाव में किसी काम के नहीं बचे हैं। जनता पानी के लिए इंतजार कर रही है किसी भागीरथी की क्योंकि जिन जनसेवकों पर भरोसा कर उसने उन्हें भागीरथी माना था, वे तो चुनाव में जीत दर्ज कराने के तत्काल बाद ही अपने भागीरथी के मौखटे को उतारकर असली चेहरे जनता को दिखा चुके हैं, जनता का दिल टूट चुका है, पर दुख तो इस बात का है कि जनता इनकी शिकायत करे तो किससे। सत्ता या विपक्ष में चाहे जो भी बैठा हो, उनकी नूरा कुश्ती देखकर जनता थक चुकी है, जनता अपने करम पर हाथ रखकर आसमान को ताक रही है, शायद वहीं से कोई फरिश्ता आए और उसकी पुकार सुन उसके प्यासे कंठ और रीते घडों में दो बूंद पानी की डाले।

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1 Comment on "एक लाख रूपए रोजाना खर्च के बावजूद प्यासे हैं कंठ"

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sunil patel
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वाकई चिंता का विषय है. सरकारी अदूरदर्शिता का नुक्सान जनता उठाती है.

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