लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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शादाब जफर”शादाब

लगता है देश में रोज रोज बढती हुर्इ महंगार्इ से जल्द ही गरीब आदमी का पीछा छूटने वाला नही। खाध पदार्थ, पेट्रोल, डीज़ल, एलपीजी, दूध, बस के बढे हुए किराये से आज जहा आम आदमी की कमर टूटी हुर्इ है वही एक बार फिर यूपीए सरकार आम आदमी पर महंगार्इ का एक और वार करने की योजना बना रही है। आम आदमी की सवारी गाड़ी यानी रेल के सफर को दस प्रतिशत महंगा करने पर सरकार विचार कर रही है। प्रस्तावित वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने पर रेल यात्रा को सेवा कर के दायरे में शीघ्र ही लाया जा सकता है। यदि ऐसा हुआ तो प्रति रेल यात्री को हर टिकट पर 10 प्रतिशत सर्विस टैक्स के रूप में मौजूदा रेल किराये से ज्यादा रेलवे को जल्द ही अदा करना पड़ेगा। सर्विस टैक्स वसूल करने की जुगत में लगी यदि भारतीय रेल की सर्विस और उस के स्टेशनो पर आज यदि नजर डाली जाये तो रेल और स्टेशनो की हालत बद से बदत्तर बनी हुर्इ है देश की राजधानी दिल्ली सहित देश में अधिकतर स्टेशनो पर यात्रियो को पीने का पानी तक मय्यसर नही होता। लेड़ीज और जैन्टस मूत्रालय की हालत ऐसी रहती है कि आदमी दूर से देखकर ही उल्टी कर दे। खाना पीने का सामान उस उस में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की आये दिन अखवारो की सुर्खिया बनना आम बात सी हो गर्इ है। रेल और यात्रियो की सुरक्षा करने वाले सुरक्षाकर्मी, सुरक्षा कम आम आदमी को परेशान करते और पैसा कमाते ज्यादा नजर आते है।

वित्त मंत्रालय ने पिछले दिनो 29 अगस्त 2011 को बहुप्रतीक्षित जीएसटी के तहत निगेटिव लिस्ट के रूप में रखी जाने वाली सेवाओ की सूची जारी की थी। जिस में इस बात का साफ साफ जिक्र किया गया है कि सरकार जिन सेवाओ के लिये फीस लेती है उन्हे सेवाकर के दायरे में लाया जायेगा। जिन में भारतीय रेल, कैपिटेशन फीस, शैक्षिक संस्थाओ को दी जाने वाली डोनेशन, खेती के अलावा व्यावसायिक उपयोग के लिये दी जाने वाली खाली ज़मीन, विनिर्माण तथा रीएल एस्टेट के क्षेत्र से जुडी हुर्इ कुछ अतिरिक्त सेवाए जल्द ही सेवा कर के उायरे में आ सकती है। रेलवे द्वारा 10 प्रतिक्षत सेवाकर लगाने के बाद क्या यात्रियो को उन की जरूरतो के हिसाब से सेवाए प्रदान कर पायेगा आज ये सब से बडा सवाल है। यदि रेलवे के वित्त संबंधी आंकड़ो पर नजर डाली जाये तो आज रेलवे के पास आज भरपूर फंड मौजूद है इस के बावजूद रेलवे देश के अधिकतर रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों को सुविधा के नाम पर पीने का साफ और ठंडा पानी, गर्मी बरसात में स्टेशनों पर टीन शैड तक मुहय्या तक नही करा पाया। यात्री सुरक्षा के नाम पर सिर्फ खाना पूरी कि जा रही है से हम सब लोग भली भाती परिचित है। जब कि रेलवे ने यात्री और रेल सुरक्षा संबंधी जरूरतो को पूरा करने के लिये कर्इ प्रकार के विशेष फंड बना रखे है जिन में आज करोड़ो रूपया जमा है। मगर इस सब के बावजूद यह विभाग हमेशा पैसे का रोना ही रोता नजर आता है। वर्ष 2003-2009 के लिये रेलवे का सुरक्षा बजट 4,607.33 करोड़ रूपये का था, लेकिन सिर्फ 2090.04 करोड़ रूपये ही खर्च हुए। रेल वजट में हर साल रेल मंत्री अपने अपने क्षेत्रो को नर्इ गाडि़यो का तोहफा देता है। देश के बाकी हिस्सो में नर्इ गाडि़यो की भी जरूरत है यात्री सुरक्षा व स्टेशनों पर यात्री शैड होना चाहिये इस बात से रेल मंत्री को मतलब नही रहता। हाँ मतलब रहता है तो इस बात से कि उस के क्षेत्र के मतदाता उस से नाराज न हो जाये।

पिछले कुछ सालो में रेल दुर्घनाओ की लम्बी लिस्ट बनती जा रही है। और इन दुघर्टनाओ में मरने वाले लोगो की संख्या हर बार सैकड़े के आंकड़े को छू रही है। 2008-09 में रेल दुर्घटनाओ में मरने वाले लोगो की संख्या 209 थी, जबकि 2009-10 में यह संख्या 225 और अप्रैल 2010 से जनवरी 2011 तक 336 लोग देश में हुए विभिन्न स्थानो पर रेल दुर्घटनाओ में मारे गये। शायद ये बात देश के अधिकतर लोग नही जानते हो कि हमारे देश में रेल दुर्घटनाओ में जितने लोग मारे मारे जाते है उतने दुनिया के किसी देश में नही मारे जाते। सरकार रेल यात्रा को सेवा कर के दायरे में लाने की बात तो सोच रही है पर यात्री सुरक्षा, यात्रियों की मूल भूत जरूरतो, रेलवे के आधुनिकीकरण, के बारे में आखिर कब सोचेगी। देश में गिनी चुनी आतंकी रेल दुर्घटनाओ की बात छोड दे तो अधिकतर रेल दुर्घटनाओ के पीछे माननीव भूल और भारतीय रेलवे का आघुनिकीकरण में पिछड़ना ही जिम्मेदार रहा है। आये दिन रेलवे द्वारा हार्इ स्पीड़ की नर्इ रेल गाडि़या तो चलार्इ जाती है लेकिन उनके हिसाब से रेलवे टै्रक को उन्नत नही किया जाता सिंगनल प्रणाली को आघुनिक नही किया जाता। जिस की कीमत बडी बडी दुर्घटनाओ के रूप में देश वासियो को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है। रेलवे के पास आज कर्इ ऐसे फंड है जिन में करोड़ो रूपया जमा होने के बावजूद रेलवे इन फंडो का इस्तेमाल नही कर पा रहा है जिन में डिप्रिसिएशन रिर्जव फंड-हर साल जरूरत के मुताबिक रेलवे इस फंड में पैसा डालता है इस फंड का इस्तेमाल पुरानी सामग्री को बदलने और उस की मरम्मत करने में किया जाता है। डेवलेपमेंट फंड-सुरक्षा संबंधी प्रोजेक्टस और विकास कार्य के लिये जैसे टै्रक सर्किटिक, इंटरलाकिग, फुटओवर ब्रिज का निर्माण शामिल होता है। रेलवे सेफ्टी फंड-सभी क्रासिंगो पर कर्मचारी तैनात करने और रेल ओवर तथा अंडर ब्रिज निर्माण के उद्देश्यों के लिये इस फंड का इस्तेमाल किया जाता है। स्पेशल रेलवे सेफ्टी फंड-रेलवे सुरक्षा संसाधनो को बदलने व सुधारने के लिये 17,000 रूपये हमेशा इस में जमा रहते है जो कि रेल मंत्रालय के सरकारी आंकड़े बताते है कि जनवरी 2010 तक इस फंड से केवल 550 करोड़ रूपये ही खर्च हो पाये है।

पिछले कर्इ सालो से ये देखने में आ रहा है कि सिर्फ राजनीतिक वाही वाही लूटने के लिये रेल मंत्री बिना गुणा भाग किये ट्रेनों की संख्या तो बढा देते है पर उसके अंजाम और गहरार्इ तक ये नही पहुच पाते। इसे देश की विडंबना ही कहा जायेगा कि आज भारत जैसे विकासशील देश में 15,993 मानव रहित रेलवे क्रासिंग है। चौकादार रहित इन रेलवे फाटको पर पिछले वर्ष 53 रेल दुर्घटनाए हुर्इ। हर साल देश की आबादी और रेल यात्रियो की संख्या बढ रही पर आज देश में रेलवे कर्मचारियो की संख्या 16 लाख से घटकर 14 लाख के आसपास रह गर्इ है। ऐसे में 10 प्रतिशत सेवाकर वसूलकर क्या भारतीय रेल मंत्रालय रेल यात्रियो को बेहतर सेवाए प्रदान का पायेगा या यू ही रेल मंत्रालय की गाडी राम भरोसे चलती रहेगी।

 

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