लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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detection of gravitational radiation
अमरीकी वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने गुरुत्वाकर्षण तरंगों का पता लगा लिया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक़ गुरुत्वाकर्षण तरंगों के पता लगने से ब्रह्मांड के बारे में समझ का नया युग शुरू होगा। प्रख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन के ‘जनरल रिलेटिविटी’ के सिद्धांत के मुताबिक़ गुरुत्वाकर्षण तरंगें रोशनी की रफ़्तार से यात्रा करती हैं। वैज्ञानिकों ने इस सफलता को उस क्षण से जोड़ा जब गैलीलियो ने ग्रहों को देखने के लिए दूरबीन का सहारा लिया था। इन तरंगों की खोज ने खगोलविदों को उत्साह से भर दिया है क्योंकि इससे ब्रह्मांड को समझने के नए रास्ते खुल गए हैं। ये तरंगें ब्रह्मांड में भीषण टक्करों से उत्पन्न हुई थीं। अमेरिकी नेशनल साइंस फाउंडेशन के निदेशक फ्रांस कोर्डोवा के अनुसार जिस तरह गैलीलियो ने पहली बार टेलीस्कोप से अन्तरिक्ष को देखा था, उसी तरह नई खोज से ब्रह्माण्ड के बारे में हमें गहरी जानकारी मिलेगी I वैज्ञानिकों ने गुरुत्वाकर्षण तरंगों की पहले गणना तो की थी लेकिन इन्हें सीधे कभी देखा नहीं था I अमेरिकी वैज्ञानिकों ने गुरुत्वाकर्षण तरंगों के गुजरने से होने वाले कम्पन का पता लगाने के लिए दो भूमिगत डिटेक्टर बनाए हैं। लीगो ऑब्ज़र्वेटरी के शोधकर्ताओं ने कहा है कि उन्होंने दो ब्लैकहोलों की टक्कर से निकलने वाली तरंगों का पता लगाया। लीगो प्रॉजेक्ट के कार्यकारी निदेशक डेविड रेइट्ज़ ने वॉशिंगटन में कहा, “हमने गुरुत्वाकर्षण तरंगों का पता लगा लिया है।” मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फ़ॉर ग्रेविटेशनल फ़िज़िक्स और लेबनीज़ यूनिवर्सिटी के प्रॉफ़ेसर कार्स्टन डान्ज़मैन ने इस शोध को डीएनए के ढांचे की समझ विकसित करने और हिग्स पार्टिकल की खोज जितना अहम बताया। उनके मुताबिक़ पहली बार गुरुत्वाकर्षण तरंगों और ब्लैकहोल का प्रत्यक्ष तौर पर पता लगा। इससे आइंस्टाइन की सौ साल पुरानी भविष्यवाणी सिद्ध होती है। वैज्ञानिकों का दावा है कि पृथ्वी से अरबों प्रकाश वर्ष दूर दो ब्लैकहोलों के टकराने पर स्पेस और समय के संबंध का पता लगा है। अपेक्षित सिग्नल बहुत सूक्ष्म हैं और ‘इंटरफ़ेरोमीटर्स’ नाम की मशीनों में एक अणु की चौड़ाई के एक हिस्से के बराबर हरकत दर्ज कराते हैं।
इससे सालों से चल रही गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज का अंत होने की उम्मीद है और ब्रह्मांड के जन्म से जुड़े ‘बिग बैंग’ के सिद्धांत को समझने के लिए नई खिड़की खुल सकेगी।
आइंस्टाइन के साधारण सापेक्षतावाद सिद्धांत के अनुसार अंतरिक्ष और समय दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, दोनो एक दूसरे से गुंथे हुये हैं, जिन्हें हम एक साथ ’काल-अंतराल’ (टाइम-स्पेस) कहते हैं। इसे समझने के लिये कई उदाहरण है लेकिन सबसे सरल एक चादर है जिसके चार आयाम (डायमेंशन) हैं जो कि अंतरिक्ष के तीन आयाम (लंबाई, चौड़ाई और गहराई) तथा चौथा आयाम के रूप मे समय है। ध्यान दें कि यह केवल समझने के लिये है, वास्तविकता इससे थोड़ी भिन्न होती है। हम सामान्यत: गुरुत्वाकर्षण बल को एक आकर्षित करनेवाला या खिंचने वाला बल मानते हैं। लेकिन आइंस्टाइन के अनुसार गुरुत्वाकर्षण काल-अंतराल (टाइम-स्पेस) को मोड़ देता है, उसे विकृत कर देता है, और इस प्रभाव को हम एक आकर्षण बल के रूप में देखते हैं। एक अत्यधिक द्रव्यमान वाला पिंड काल-अंतराल को इस तरह से मोड़ देता है कि इस मुड़े हुये काल-अंतराल से गुजरते हुये अन्य पिंड की गति, त्वरित (एसिलरेट) हो जाती है। जैसे किसी तनी हुयी चादर के मध्य एक भारी गेंद रख देने पर वह चादर में झोल उत्पन्न कर देती है, उसके पश्चात उसी चादर पर कुछ कंचे (मार्बल्स) डालने पर वे इस उत्पन्न झोल की वजह से गति प्राप्त कर लेते हैं। सरल शब्दों में, पदार्थ अंतरिक्ष को, मोड़ उत्पन्न करने के लिये निर्देश देता है और अंतरिक्ष पदार्थ को गति करने निर्देश देता है। साधारण सापेक्षतावाद के सिद्धांत के गणित के अनुसार यदि किसी भारी पिंड की गति में त्वरण (एसिलरेसन) आता है, तो वह अंतरिक्ष मे हिचकोले, लहरें उत्पन्न करेगा, जो उस पिंड से दूर गतिमान होंगीं । ये लहरें काल-अंतराल (स्पेस-टाइम ) में उत्पन्न तरंगें होती हैं, इन तरंगों की गति के साथ काल-अंतराल मे संकुचन और विस्तार उत्पन्न होता है। इस घटना को समझने के लिये आप किसी शांत जल में पत्थर डालने से जल की शांत सतह को मोड़ रही लहरों के जैसे मान सकते हैं। गुरुत्वाकर्षण तरंगों को उत्पन्न करने के कई तरीके हैं। जितना अधिक भारी और घना पिंड होगा वह उतनी अधिक ऊर्जावान तरंग उत्पन्न करेगा। पृथ्वी सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से त्वरित होकर एक वर्ष में सूर्य की परिक्रमा करती है। लेकिन यह गति बहुत धीमी है तथा पृथ्वी का द्रव्यमान इतना कम है कि इससे उत्पन्न गुरुत्वाकर्षण तरंग को पकड़ पाना लगभग असंभव ही है। लेकिन यदि आपके पास दो अत्याधिक द्रव्यमान वाले पिंड हैं, उदाहरण के लिये न्युट्रान तारे जोकि महाकाय तारों के अत्यधिक घनत्व वाले अवशेष केंद्रक होते हैं, अपनी गति से ऐसी गुरुत्वाकर्षण तरंग उत्पन्न कर सकते हैं जिन्हे हम पकड़ सकें। 1974 मे खगोल वैज्ञानिक जोसेफ टेलर तथा रसेल ह्ल्स ने एक ’युग्म न्यूट्रान तारों’ (बाइनरी न्यूट्रॉन स्टार्स) को खोजा था। ये दोनों अत्यधिक द्रव्यमान वाले घने तारे एक दूसरे की परिक्रमा अत्यधिक तीव्र गति से लगभग 8 घंटो में करते थे। इस तीव्र गति से परिक्रमा करने पर वे थोड़ी मात्रा में गुरुत्वाकर्षण तरंग के रूप में ऊर्जा उत्पन्न करते थे। यह ऊर्जा उन तारों की परिक्रमा गति से ही उत्पन्न हो रही थी, जिससे गुरुत्वाकर्षण की ऊर्जा के ह्रास से उन तारों की परिक्रमा की गति भी कम हो रही थी। इससे उन तारों की कक्षा की दूरी भी कम हो रही थी और उनकी परिक्रमा का समय भी कम हो रहा था। समय के साथ उनकी कक्षा की दूरी में आने वाली कमी की गणना की गयी और यह कमी, साधारण सापेक्षतावाद के सिद्धांत से गणना की गयी कमी से सटीक रूप से मेल खाती थी। टेलर और हल्स को इस खोज के लिये नोबेल पुरस्कार दिया गया था और उन्होंने परोक्ष रूप में गुरुत्वाकर्षण तरंग खोज निकाली थी। उन्होंने गुरुत्वाकर्षण तरंगों के निर्माण से, ऊर्जा के ह्रास को, तारों की कक्षा में आने वाले परिवर्तन को देखा था, लेकिन उन्होंने गुरुत्वाकर्षण तरंगो को प्रत्यक्ष नहीं देखा था।
यह एक महत्वपूर्ण घटना है कि भारतीय वैज्ञानिकों ने गुरुत्वाकर्षी तरंगों की खोज के लिए महत्वपूर्ण परियोजना में डाटा विश्लेषण सहित अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इंस्टिट्यूट ऑफ प्लाजमा रिसर्च गांधीनगर, इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनामी एंड एस्ट्रोफिजिक्स (आईयूसीएए) पुणे और राजारमन सेंटर फॉर एडवांस्ड टेक्नोलाजी इंदौर सहित कई संस्थान इस परियोजना से जुडे थे। गुरुत्वाकर्षी तरंगों की खोज की घोषणा आईयूसीएए पुणे और वाशिंगटन डीसी, अमेरिका में वैज्ञानिकों ने समानांतर रूप से की। भारत उन देशों में से भी एक है जहां गुरुत्वाकर्षण प्रयोगशाला स्थापित की जा रही है। उधर, परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोदकर ने गुरुत्वाकर्षी तरंगों की खोज में महत्वपूर्ण योगदान के लिए भारतीय वैज्ञानिकों की टीम को बधाई दी।

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1 Comment on "गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज"

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Himwant
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कई बार किसी शूक्ष्म सत्य को मन पहले महसूस कर लेता है लेकिन भौतिक स्तर पर वह बाद में प्रमाणित होता है। आइंस्टाइन ने गुरतवाकर्षण तरंगो के अस्तित्व का सिद्धांत पहले ही दे दिया था।

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