लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

व्यापारिक घराने राजनीतिक दलों को वैधानिक तरीके से चंदा देने का रवैया तेजी से अपना रहे हैं। यह सच्चार्इ एक स्वयं सेवी संगठन ‘सिविल सोसायटी ग्रुप एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफाम्र्स (एडीआर) के मार्फत सामने आर्इ है। ये घराने अपने जन कल्याणकारी न्यासों के खातों से चैक द्वारा चंदा दे रहे हैं। इस प्रक्रिया के जरिए इन घरानों ने एक सुरक्षित और भरोसे का खेल, खेलना शुरू कर दिया है। रिपोर्ट के जरिए जिन 36 उद्योग घरानों के चंदे का ब्यौरा सामने आया है, उसके मुताबिक प्रमुख राजनीतिक दलों को करीब एक करोड़ रूपए चंदे में दिए गए हें। औद्योगिक घराने चंदा देने में चतुरार्इ भी दिखा रहे हैं। उनका दलीय विचाराधारा में विश्वास होने की बजाय, दल की ताकत, केंद्र में है। लिहाजा कांग्रेस और भाजपा को समान रूप से चंदा मिल रहा है। जिस राज्य में जिस क्षेत्रीय दल का वर्चस्व है, वे कांग्रेस और भाजपा के अनुपात में ज्यादा चंदा बटोर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा को चंदा देने की होड़ में देश के दिग्गज अरब-खरबपति लगे हैं। लेकिन चुनाव विश्लेषकों का मानना है कि बही-खातों में दर्ज यह लेने-देन तो हाथी के दांतों की तरह है। हकीकत में तो यह सफेद-चंदा वास्तविक खर्च का महज दो फीसदी है। अब यहां सवाल खड़ा होता है कि बाकी धन के काले स्रोत कहां हैं ?

हमारे राजनीतिक दल और औद्योगिक घराने चंदे को अपारदर्शी बनाए रखने के लिए कितने हठधर्मी है, इसका खुलासा भी इस रिपोर्ट में है। पापड़ बेलने की लंबी प्रक्रिया जारी रखते हुए बमुशिकल 36 घरानों और प्रमुख राजनीतिक दलों ने चंदे की घोषित जानकारी दी। जाहिर है दल स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के कतर्इ फेबर में नहीं हैं। दलों की यह मानसिकता दल-बदलुओं, धनबलियों, बाहुबलियों और माफिया-सरगनाओं को बड़ी संख्या में टिकट देने से भी जाहिर हो गर्इ है। यही कारण है कि चुनाव आयोग की सख्ती और एक लाख से ऊपर के लेन-देन की गाइड लाइन चुनावी राज्यों में जारी करने के साथ ही अघोषित और बेनामी नकदी की बरामदगी का बेहिसाब सिलसिला शुरू हो गया। अब तक एक अरब से भी ज्यादा की नगद धन राशि बरामद हो चुकी है। कालेधन का चुनाव में इस्तेमाल तो ठीक है, दल और प्रत्याशी जाली मुद्रा के उपयोग से भी बाज नहीं आ रहे ? पुलिस ने दक्षिण-पशिचम दिल्ली से हाल ही में छह करोड़ के जाली नोटों के साथ दो लोगों को हिरासत में लिया है। हजार और पांच सौ के ये नोट एक टैम्पो में रखे, बोरों से बरामद किए गए। अच्छी गुणवत्ता के ये नोट पाकिस्तान से लाए गए बताए जा रहे हैं। भावी विधायकों व दलों को चुनाव सुधार की चिंता तो है ही नहीं, जाली मुद्रा के जरिए वे देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करने की भी शर्मनाक राष्ट्रद्रोही गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं। संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार किसी भी लोकतांत्रिक देश में चुनाव जन-आकांक्षा प्रगट करने का एकमात्र माध्यम है। इसलिए सभी दलों और उम्मीदवारों का समान अवसर मिलने की दरकरार रहती है। किंतु जायज-नाजायज धन यदि मतदाता को प्रभावित करने के लिए उपयोग में लाया जाए तो इससे संविधान की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने की मूल भावना प्रभावित हुए बिना नहीं रहती ? इस लिहाज से धन की वैधानिकता और चंदे में पारदर्शिता के सवाल जोर पकड़ रहे हैं।

पूर्व चुनाव आयुक्त टीएन शेषन की सख्ती पेश आने की मंशा के चलते आज एक हद तक मतदान केंद्रों को कब्जाने व लूटने का सिलसिला तो कमोबेश थम गया है, लेकिन इसकी जगह मतदाता को ललचाने की मंशा के चलते धन से वोट खरीदने और शराब व कंबल बांटकर रिझाने के नाजायज कारनामों ने ले लिया है। इसीलिए बड़ी मात्रा में काले और जाली धन की जरूरत प्रत्याशियों को और उनके रहनुमा दलों को पड़ती है। इससे निजात के लिए चुनाव सुधारों के पैरोकार चुनाव का पूरा खर्च सरकार पर डालने की वकालात कर रहे हैं। कर्इ अन्य लोकतांत्रिक देशों में ऐसे प्रावधान लागू भी हैं। सुधार की इन पैरवियों में यह भी कहा जा रहा कि राजनीतिक दलों द्वारा किया जाने वाला चुनाव खर्च भी उम्मीदवार के खर्च में जोड़ा जाए। यह प्रक्रिया अपनार्इ जाती है तो संभव है, अकूत खर्च पर अंकुश लगे ?

चुनाव में कालेधन के बेहिसाब इस्तेमाल ने तो ‘चौथा स्तंभ का संवैधानिक दर्जा प्राप्त मुद्रित और दृश्य समाचार माध्यमों को भी’ पेड-न्यूज की चटनी चटा दी है। छपने से पहले और प्रत्याशी व दल के हित साधने वाले इस पूरे दर्शन का क्रियाकलाप नाजायज तौर से ही डंके की चोट पर चलता है। देश के प्रमुख मुगल मीडिया इसमें बढ़-चढ़कर भागीदारी करते हैं। इसके संचालन के सूत्र सीधे अखबार व चैनलों के मालिकों के हाथ होते हैं और वे स्थानीय संपादाकों व प्रबंधकों को एक निश्चित धन राशि हथियाने का लक्ष्य देते हैं। ऐसा नहीं है कि इस गोरखधंधे से चुनाव आयोग अनजान है। अलबत्ता आयोग ने पेड-न्यूज से जुड़े एक मामले को अंजाम तक भी पहुंचाया है। उत्तर प्रदेश की बिसौली विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहीं श्रीमती उर्मिलेश यादव अगले तीन साल के लिए चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध भी लगाया हुआ है। लेकिन धन लेकर जिन अखबारों ने पेड-न्यूज का काला-कारोबार किया, उनके खिलाफ कार्रवाही करने में आयोग के हाथ बंधे हैं। दरअसल पेड-न्यूज के मेकेनिज्म को रोकने के कोर्इ कानूनी औजार आयोग के पास है ही नहीं। इसी लिहाज से भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू परिषद को दांडिक अधिकारों की मांग कर रहे हैं।

यहां सवाल यह भी खड़ा होता है कि लोकतंत्र में संसद और विधानसभाओं को गतिशील व लोककल्याणकारी बनाए रखने की जो जवाबदेही सांसद और विधायकों पर होती हैं, वे ही यदि औद्योगिक घरानों, माफिया सरगनाओं और काले व जाली धन के जरिए विजयश्री हासिल करके आएंगे तो जाहिर है उनकी प्राथमिकता जन-आकांक्षाओं की पूर्ति की बजाय, इन्हीं के हित-संरक्षण में होगी। इसीलिए अन्ना हजारे अपने आंदोलन के दौरान यह कह रहे थे कि राजनीति धन और शराब का घिनौना खेल बनकर रह गर्इ है। आखिर इसमें गलत क्या है ? इन सवालों को हाशिए पर डाल देने के नतीजतन ही राजनीति खाने और खिलाने का मजबूत आधार बनती चली जा रही है। इसीलिए देश में सफेद के समानांतर चल रहे काले धन के वजूद पर शिकंजा नहीं कसा जा रहा है ?

सब कुल मिलाकर सभी दल एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं और समान रूप से भ्रष्टाचार की चुनावी गंगा में डुबकी लगाकर वैतरणी पार करना चाहते हैं। ऐसे में लाचार चुनाव आयोग महज सुझाव ही दे सकता है। उसके नए सुझावों में चैक से चंदा लेने का प्रावधान और राजनीतिक दलों के भी हिसाब-किताब की जांच करना शामिल हैं। लेकिन इन चुनाव सुधारों की सुनवार्इ पर सभी दलों ने कानों में अंगुली ठूंस ली है। लिहाजा आयोग की दलील नक्कारखाने की तूती बनकर रह गर्इ है।

 

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