लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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-डॉ. मधुसूदन-
hindi

-भाग दो-

(आठ) हिंदी की अक्षरांकित देवनागरी ध्वनिलिपि

ध्वनि की लघुतम इकाई के चिह्न, अक्षर ही हैं। इन अक्षरों के समूह को जब अर्थ भी होता है, तो शब्द माने जाते हैं। यह हिन्दी की परम्परागत लिपि होने के कारण, आप इससे परिचित ही है। पर इस लिपिका गुणगान एक संस्कृतज्ञ के अनुवादित शब्दों में देखिए। आपका गौरव जगे बिना नहीं रहेगा।
रोमन लिपि की वकालत करनेवाले विद्वानों के लिए यह उद्धरण प्रस्तुत करता हूं।
एए मॅकडॉनेल क्या कहते हैं?
(पहले मूल अंग्रेज़ी देकर-नीचे हिंदी अनुवाद दिया है)
“It not only represents all the sounds of the Sanskrit language. but is arranged on a thoroughly scientific method…..We Europeans, on the other hand, 2500 years later. and in scientific age, still employ an alphabet which is not only inadeequate to represent all the sounds of our languages, but even preserves the random order in which vovels and consonents are jumbled up as they were in the Greek adaotion of the primitive Semitic arrangement of 3000 years ago.”
A History of Sanskrit Literature, A. A. Macdonell, p. 17.

देवनागरी लिपि,
मॅकडॉनेल कहते हैं।
देव नागरी लिपि, मात्र संस्कृत के सभी उच्चारों को ही नहीं दर्शाती, पर लिपि को विशुद्ध वैज्ञानिक आधार देकर उच्चारों का वर्गीकरण भी करती है।… और दूसरी ओर, हम युरप वासी आज, २५०० वर्षों के बाद भी, (तथाकथित) वैज्ञानिक युग में उन्हीं A B C D खिचडी वर्णाक्षरों का प्रयोग करते हैं, जो हमारी भाषाओं के सारे उच्चारणों को दर्शाने में असमर्थ और अपर्याप्त है, स्वर और व्यंजनो की ऐसी खिचड़ी को, उसी भोंडी अवस्था में बचाके रखा है, जिस जंगली अवस्था में, ३००० वर्षों पहले अरब-यहूदियों से प्राप्त किया था। -संस्कृत साहित्य का इतिहास -एए. मॅकडॉनेल पृष्ठ (१७)

अच्छा हुआ, “मॅकडॉनेल साहेब” आपने सुधार नहीं किया, तनिक हमारी तो सोचते, आप यदि सुधार करते तो फिर हम कुली झमुरे, किस की नकल करते? अंग्रेज़ी के मानसिक गुलाम हम कहां जाते? किसकी ओर ताकते ?

(नौ) “संस्कृत साहित्य का इतिहास” पुस्तक के लेखक, मॅकडॉनेल (१८५४-१९३०)
यह मॅकडॉनेल (१८५४-१९३०) बिहार में जन्मे, जर्मनी और इंग्लैण्ड में संस्कृत पढ़े थे।
१८८४ में, ऑक्सफर्ड युनिवर्सिटी में संस्कृत के प्रोफ़ेसर नियुक्त हुए थे। ७००० संस्कृत की हस्तलिखित पाण्डुलिपियां काशी से खरिद कर ऑक्सफ़र्ड ले गए थे। इस काम में उन्हें भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड कर्ज़न(१८५९-१९२५) नें सहायता की थी। कुल १०.००० संस्कृत की पाण्डु लिपियां मॅकडोनेल ने ऑक्सफ़र्ड को दान दी थी। उनकी मृत्यु पहले वे ऋग्वेद का अनुवाद कर रहे थे।

(दस) (छः) १०.००० संस्कृत पाण्डु-लिपियां ऑक्सफ़र्ड को दान।
ये हमारे हितैषी थे या नहीं; मुझे संदेह है। क्यों कि इन्होंने हमारी पाण्डुलिपियां चुराने का भी काम किया था। वे संस्कृत से प्रभावित थे, पर अपने निजी उद्देश्य से। सारी रॉयल एशियाटिक सोसायटी पाण्डुलिपियों को संग्रह करने का नाटक कर, चुनी हुयी लिपियां युरप भेजा करती थीं।

जी हां, कुल १०.००० संस्कृत की पाण्डु लिपियां मॅकडोनेल ने ऑक्सफ़र्ड को दान दी थी। और इन की ओर आदर से देखनेवालों को यह भी सोचना होगा कि क्या यह सरासर चोरी नहीं है। मूर्ख हैं भारतवासी हम, हमें कौन हितकारी और कौन अहितकारी है, इसका भी ज्ञान नहीं है। जो भी हमें लूट लेता है, उसी को हम परम आदर से देखते हैं। उसीकी भाषा पर गर्व करते हैं।
पाण्डुलिपियां किसकी ? तो, हमारी।
दान कौन दे रहा है? तो मॅकडॉनेल।
और किसको? तो बोले ऑक्सफ़र्ड को।

वाह! महाराज मान गए। पाण्डुलिपियां हमारी, किस अधिकार से मॅकडॉनेल उसे किसी तीसरी ईकाई ऑक्सफर्ड को दान देते हैं? और मेरा भोलानाथ भारत उस पर हर्षित और गर्वित है।

(ग्यारह) रोमन लिपि में गीता।
कुछ रोमन में संस्कृत प्रयोग के इच्छुक पाठकों का ध्यान चाहता हूं। यदि गीता का पहला श्लोक आप रोमन में लिखकर देखें, तो, कैसा दिखेगा?
मूल श्लोक:
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥

अब रोमन में लिखिए।
Dharmakshetre Kurukshetre samavetaa yuyutsavah.
Mamakah Paandavaashchaiv kimakurvat sanjay.
रोमन लिपि ही सीखा हुआ, बालक उसे कठिनाई से पढ़ेगा; तो उच्चारण कैसा होगा?
ढर्मक्षेट्रे कुरुक्षेट्रे समवेटा युयटस्वः
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वट संजय॥
और ऐसा पढ़ने में जो कठिनाई होगी, हमें उसका सही अनुमान नहीं हो सकता।
——————————————————–
दूसरा उदाहरण लें।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

इसे रोमन में परिवर्तित करनेपर ये निम्न प्रकार पढ़ा जाएगा।

यडा यडा हि ढर्मस्य ग्लानिर्बहवटी बहारट।
अबह्युस्ठानमढर्मस्य टडाट्मानं स्रिजाम्यहम्‌
———————————————————————–
क्या यही चाहते हैं आप सारे भारत के लिए?
(बारह)
दूसरों की सुविधा के लिए हम क्या क्या त्याग करने को तैयार है?
सारे संसार के परदेशी लोगों की कठिनाई दूर करने वाले, धौतबुद्धि विद्वान भारत की पहचान भी बदल देंगे। दुःख होता है, मुझे ऐसे लोगों के भारतीय होने पर। इनके दिखाए मार्ग पर चले, तो, दो-चार दशकों में देवनागरी लिखित हिन्दी धीरे धीरे रोमन लिपि में लिखी जाएगी। यदि ऐसे रोमन लिपि में ही हिंदी पढ़नेवाले बढ़ते गए, तो कुछ दशकों में देवनागरी में पढ़नेवाले घटते ही चले जाएंगे। आगे क्या होगा, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। भाग्य है, ऐसा सोचनेवाले विशेष नहीं है।

(तेरह)
देवनागरी में विश्व की प्रायः सारी भाषाएं (कुछ सुधार से) लिखी जा सकती है। अंग्रेज़ी के शुद्ध उच्चारण देवनागरी में ही डिक्शनरियों में, कोष्ठक में लिखे जाते हैं। इसी कारण भारत के सारे प्रादेशिक भाषी अंग्रेज़ी का लगभग सही उच्चारण जान जाते हैं। देवनागरी के या देवनागरी जैसी ही अन्य नियमबद्ध भारतीय लिपियों के कारण ही यह संभव है। यही कारण भी है कि हम भारतीयों के अंग्रेज़ी उच्चारण चीनियों की अपेक्षा अधिक शुद्ध पाए जाते हैं।

चीनी भाषा चित्रमय है, वह शब्द के उच्चारण से नहीं पर चित्र से संप्रेषित होती है। अन्य भाषा के उच्चारण को चिह्नित नहीं कर सकती। चीनी भाषी, अपने शिक्षक के प्रत्यक्ष उच्चारण को, सुनकर ही सीख पाते हैं; ऐसा सुना है। पर देवनागरी तो सर्वथा उच्चारण को ही शब्दांकित कर सकती है। यह गुण जितना बड़ा है, उतना ही हमारी जानकारी से परे हैं। हम पानी की उन मछलियों की भांति अज्ञान है, जो पानी से बाहर निकले बिना, पानी का महत्व नहीं जान पाती।

“देवनागरी की रोमन लिपि को चुनौती” नाम से आलेख बना था। पर सुधारकर सौम्य कर दिया। पाठकों को मुक्तता से टिप्पणी करने के आग्रह के साथ समाप्त करता हूं।

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8 Comments on "देवनागरी और रोमन लिपि विवाद -2"

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डॉ. मधुसूदन
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डॉ. केन पटेल जी से अनुरोध। निम्न दो कडियाँ देख कर अपनी प्रतिक्रिया, उन्हीं लेखों पर दे।

(१) http://www.pravakta.com/mixed-laguage-english
(२) http://www.pravakta.com/dr-madhusudan-hindi-english-competition-part-a

डॉ. मधुसूदन
Guest
इ मैल से आया संदेश: एयर ह्वाईस मार्शल श्री विश्वमोहन तिवारी जी की सहमति के लिए, और विदुषी शकुन्तला जी की उदाहरणों सहित सघन पुष्टि के शब्दों के लिए मैं धन्यवाद करता हूँ। ================================= शकुन्तला जी के कथनों से पूर्ण सहमति। उन्हें धन्यवाद विश्वमोहन तिवारी 28 जुलाई 2014 को 12:51 pm को, Shakun Bahadur ने लिखा: आदरणीय मधुसूदन जी, आपके दोनों आलेखों से मेरी पूर्णरूपेण सहमति है । आपने अनेकों तथ्यपूर्ण तर्कों को सुप्रमाणित प्रस्तुत किया है , जिन्हें पढ़कर किसी भी विवेकी ही नहीं ,सामान्यरूप से शिक्षित व्यक्ति के लिये भी किसी आशंका की स्थिति नहीं हो सकती है… Read more »
ken
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Shakuntalaajii, Roman script is nothing but the extension of our old Brahmi and Gupta script. European may have modified these letters to their proper use by altering sounds/shapes. We need to do research in this area. Europeans write these words this way because our pundits taught them this way.Look at all city names and names the way we write.We need standard Roman alphabet to suite our Devanagari phonetic scheme. Since we apply vowels above/below/side to the letters by keeping words in a compact form we have been able to delete Schwa from the words. You may go through this link..… Read more »
ken
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First India needs simple Gujanagari script at national level in writing both Hindi and Urdu along with standard Roman keyboard. Most European languages written in Roman script have their own keyboards except India A standard script converter may work both way for this Shloka but most Indian techies have their own method of transliteration. Lately techies are busy with fonts. यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ યદા યદા હિ ધર્મસ્ય ગ્લાનિર્ભવતિ ભારત | અભ્યુત્થાનમધર્મસ્ય તદાત્માનં સૃજામ્યહમ્ || yadā yadā hi dharmasya glānirbhavati bhārata | abhyutthānamadharmasya tadātmānaṁ sṛjāmyaham || ….IAST yadā yadā hi dharmasya glānirbhavati bhārata… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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केन जी।
आप का स्रोत और उद्धरण का लेखक, और मात्र उद्धरण दीजिए। अधिकृत लेखक, या भाषावैज्ञानिक ने, उसे किस ग्रंथ में कहा है? जानना चाहता हूँ।
देवनागरी गुजराती भाषा के जन्म के भी पहले से प्रायोजित होती थी। ब्राह्मी का ही विकास देवनागरी है।
नागर का अर्थ होता है, नगरों में रहनेवाले-जैसे वानर का अर्थ भी वनों में रहनेवाले होता है।
आप के मत की पुष्टि मुझे कहीं मिली नहीं।
आप मात्र उद्धरण और उद्धरण का लेखक एवं उसका प्रमाण स्रोत देकर पुष्टि करें। यह अनुरोध।

डॉ. प्रतिभा सक्‍सेना
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देवनागरी और रोमन लिपि का विवाद वैसा ही परिदृष्य उपस्थित करता है जैसा कि किसी सुसंस्कृत, सुविचारित सुनियोजित, सतर्क और सुसंगतियों से पूर्ण महिला को बेतुके तर्कोंवीली, मनमानी,अपर्याप्त,अनियोजित ध्वनियों में बहकनेवाली ,असंगतियों से युक्त स्त्री के मुकाबले खड़ा कर दिया जाय !.

ken
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Here are some article related links.
http://macdonell.vedicsociety.org.in/contents
http://en.wikipedia.org/wiki/Arthur_Anthony_Macdonell

3. A form of Scientific Writing…
As per this paragraph,Naagari (later Devanagari) script was initiated by Naagar brahmins of Gujarat( which is modified to current Gujanagari form )

Here are my comment to uplift Hindi.
http://www.pravakta.com/detail-of-indian-language#comment-75300

વર્તમાન મેં જીના…….

http://youtu.be/d5gCPwhj-No

આઓ મિલકર સંકલ્પ કરે,
જન-જન તક ગુજનાગરી લિપિ પહુચાએંગે,
સીખ, બોલ, લિખ કર કે,
હિન્દી કા માન બઢાએંગે.
ઔર ભાષા કી સરલતા દિખાયેંગે .
બોલો હિન્દી લેકિન લિખો સર્વ શ્રેષ્ટ નુક્તા/શિરોરેખા મુક્ત ગુજનાગરી લિપિમેં !

ક્યા દેવનાગરી કા વર્તમાનરૂપ ગુજનાગરી નહીં હૈ ?

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