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-डॉ. अतुल कुमार

भारत की मूल सभ्यता आर्य-द्रविड़ या सिन्धु घाटी की है जो आधुनिक काल में हिन्दु कहलायी। जाति प्रथा इसी हजारों सालों पुरानी सभ्यता सनातन धर्म की पहचान है, जिसका मूल आधार वर्ण व्यवस्था है। मनुवादी वर्ण-व्यवस्था ने समय के काल में वशंवादी स्वरूप ले लिया। यद्यपि जन्मगत स्वरूप में सभी शूद्र हैं यह कई स्थानों में उल्लेखित है। बाद में ही वो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य होता था। वंशगत पहचान जन्मगत थी जबकि वर्ण जाति-व्यवस्था का आलम्ब कर्म आधारित था पर शनैः शनैः यह भी जन्मगत हो गया। उचित तो यही था, जाति का अर्थ कर्म से ही रहना चाहिए था पर कटु सत्य है ऐसा नहीं बना रहा। फिर जातियों में ऊँच-नीच आ गई। जन्म से ऊँच नीच को माना जाना गलत ही है। बनते बदलते समाज की पहचान में जातिगत खामियों के कारण हल्कापन आया।

हर दौर में समाज कमियों के साथ जीता है और सुधार पर ही स्थायित्व संभव है। हिन्दु-सभ्यता के लिए विकास की पौड़ी पर अनवरत चलते रहना कैसे संभव हुआ? इसे समझे जाने बगैर गीदड़ों की हुआऽ हुआऽ की भातिं जाति छोड़ो का नारा जोर से लगाया जा रहा है। बदलाव के साथ बढ़ता है। कोई इसका अपवाद नहीं। जातिगत तौर के समाजिक ढ़ांचें में भी कमियां निश्चित ही है। दुःर्भाग्य से हिन्दु समाज में जातिगत् दुर्भावना के बीज कदाचित चंद स्वार्थी तत्वों द्वारा करा दिये गये। आज के दौर में तो छोटी बड़ी जाति की बात निरर्थक हो गयी है। पर क्या जाति बंधन के दूसरे मायने भी?? यह बारीकी से और गहराई से सोचने का विषय है। इसी तरह गोत्र में समाज के वर्गीकरण का कारण भी खोज का विषय है। कितने राजनेता, सामाजिक कार्यकर्त्ता, प्रशासक या पत्रकार जीव वैज्ञानिकों की इस जानकारी से संज्ञान रखते है कि निकट संबधों में वैवाहीक संबध रूग्ण और विकृत संतति को जन्म देने की बलवती संभावना रखती है। वर्तमान में भी निकटतम रक्त संबधों के विवाह रूग्ण-मंद बुद्धि की संतान को अधिक जन्म दे रहे हैं, जाँचे! यह सच है। रक्त-संघ व जीन की खोज को तो पचास साल भी नहीं हुए मगर ऋषि मनीषियों ने किसी आधार पर ही स्वस्थ्य वैवाहिक संबधों के संभावना के आकलन को कर पाना संभव कर लिया। सगोत्र व प्रतिलोम विवाह क्यों वर्जित किया? विस्मृत हुए पूर्वजों के अनूठे ज्ञान को स्वीकार्य तर्क और उचित साक्ष्य के साथ आज की हिन्दु पीढ़ी के लिए संभव नहीं हुआ पर क्या वास्तिविकता बदल जाएगी। दोपायों के साथ त्रासदी है कि अन्य जीवों की भांति अर्जित ज्ञान को गर्भ में ही वंशजों में निरूपित कर सकें। मगर सत्य यह भी तो हो कि विरोधी वर्ग ने भी बिना उचित तर्क के और असल में जाति मिटाने के बहाने सभ्यता-संस्कृति मिटाने का चतुर षड्यंत्र रचा हो। नेता व मंत्री की उपस्थिति में सरस्वती-वदंना का विरोध तो कहीं गृहमत्रीं के समक्ष वन्देमातरम् पर फतवा, यह अंतर को तार तार करता है। और इससे भी आगे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते है आधे भाग रह कर भारतवर्ष का जो भाग हिन्दुस्तान के नाम हिन्दुओं को मिला उसके भी संसाधनों पर मुसलमानों का हक पहले है। अब वह दिन दूर नहीं कि जनगणमन का विरोध भी किसी कार्यक्रम में होगा। किस लाभ के लिए देश और संस्कृति मिटाने का काम सरकार कर रही हैं? रंगे सियार जैसे ये सुधार के पैरोकार कैसे कैसे विनाशकारी विचार फैलाते हैं। दुःख की बात हैं, सरकार की प्राचीन परंम्पराओं के संरक्षण में कोई कारगर कदम नहीं। बिना विवेचना के नवीनता के नाम पर बदलाव के बहाने, बर्बादी के तमाम रास्ते पढ़ाये जा रहे है। क्या परिर्वतन ला देगें? आज प्रेमविवाह कल तलाक! बिन ब्याही माँ व बिन ब्याहे संबध-कौन सा समाज बनेगा?

सबसे अजब तो निर्णय सठियाए साल में कांग्रेस राज में मिला। घिन आती है जिक्री तक करने में। विवाह सामाजिक मान्यता प्राप्त स्त्री पुरुष के सह स्वीकार्यता का निजी संबध रहा है। विवाह का संतिति से वंश के विस्तार का संबध रहा है। प्रकृति ने सभी को कुछ विभिन्नता के साथ जना है। प्रकृति ने मानव को उभयलिगीं जीवस्वरुप दिया है। जीवता वास्ते संतति ही प्रकृति की स्वीकृति है। कामुकता की प्रवृति से अप्राकृतिक वर्ताव मानसिक विकृति मात्र है, विकास नहीं, स्वतंत्रता नहीं, अधिकार नहीं। हिन्दुस्तान- पाकिस्तान में विभाजन के बाद भी हिन्दुओं को मिटाये जाने के कई तरह के प्रपंचों से आये दिन आर्यसन्तानें दो चार हो रही है। हिन्दी भुलाकर एवं हिन्दु धर्मावलंबियों को रीतियों से दूर कर, भ्रमित छवि दे संस्कृति को मिटा सके ताकि हिन्दुस्तान मिट सके। यह तो दैवयोग ही है कि अभी तक हिन्दु बचा हुआ है। दसियों हजार सालों के इतिहास में ऐसा नहीं हुआ कि आर्यावत निवासियों ने किसी पर अधिकार वास्ते आक्रमण किया। जम्बूद्वीप से हिन्दुस्तान बनने तक की प्रक्रिया में भारतवर्ष के इतिहास में कई करवटें ली। सोने की चिड़िया ने आर्दश और अपने खुद के तय मानवतावादी मापदण्ड और नियमों के पालन करते हुए सामरिक शक्ति को अनदेखा कर दिया। असामाजिक तत्व, मक्कार मानसिकता ले समाज-सागर से किनारा कर दूर धूर्त बगुले की भांति बैठे हैं। सरल, सहज सोच के भले लोगों को इंसानी चेहरे का मुखैटा लिये शैतान के नुमांइदे मौका पाते ही तुरंत नोच खाते है। ऐसे दुष्टों ने इस सभ्यता पर अधिकार या मिटाने की चाहत से समय के काल में कई आक्रमण किये। दुनिया के लालची और कपटी खुराफातियों ने बदनीयत से हमले किये। हूण, शक, मुंड, किरात, यवन, मगोंल, मुगल, डच, पुर्तगीज, अग्रेंज, फ्रेंच और भी ना जाने कितने लुटेरों के अनगिनत वार सहकर भी अपनी पहचान बनाये रखी। अब भी मध्यदुनिया व पश्चिम, धरा में देवतुल्य मूलतः आर्य-द्रविड़ वंशज समाज को मिटाने की ख्वाहिश लिये है।

सच है! सौलहआने समानता तो कहीं नहीं है। विभिन्नता भारत की व्यापक पहचान है। भारत की एकल विशिष्टता विभिन्नता में एकता है। पूरा विश्व इस गुण से चकित है। अलग-अलग विचार, रूचि, पंरम्परा, आस्था, दृष्टिकोण के बावजूद भी सब एक परिवार की तरह रहते है। जलकुटे देश, उसके गिरे निवासी इसे जब्त नहीं कर पाते। हमारा कभी किसी से झगड़ा नहीं रहा, फिर भी घटिया लोग पीछे पड़े रहते हैं। रूक-रूक वो शड़यंत्र कर कुटिल चालें चल चोट पहुंचाते हैं। जो अक्सर विफल रहीं है। पर, आक्रांताओं के स्तर से भी ज्यादा समाज को चोट वर्णव्यवस्था में उपजी बडे छोटे की भावना ने किया। हां! यह हुआ है कि इन आक्रांताओं के बनस्पत बदलाव आये तथापि मूलस्वरूप बना रहा। मिटा ना सके। समाज और देश का दुश्मन सामरिक हो या वैचारिक दोनों ही भयानक खतरनाक है। भारत का अर्थ है आभा से आलोकित करने वाला। ज्ञान से सर्वदा आलोकित राष्ट्र ने विश्वगुरू का पद पाया। राम, कृष्ण, बुद्ध, जैन, जनक, सूरदास, तुलसीदास, रैदास, कबीर, नानक, शंकराचार्य, गुरुगोविंद, स्वामी विवेकानंद और भी न जाने कितने लाखों करोड़ों सूफी-सतों-अवधूतों विभूतियों ने समय-समय पर अज्ञानता का अंधकार दूर कर जग को आलोकित किया। कुछ इसी तरह आज के सुधारवादी विचारकों को यह चाहिये कि जातिगत दुर्भावना को मिटाये जाने का प्रयास हो। अलग जातियों के लोगों में आपसी कलह मिटे। जाति आरक्षण करके आपसी घृणा बढ़ेगी। नौकरी हो या रोजगार सभी को मिले। कोई भी वंचित न रहे। सभी को योग्य बनाएं। इस लक्ष्य पर कार्य करने में क्या रूकावट है? कब हासिल होगा? जातिगणना कर के यह हासिल नहीं होगा। वोट बैंक के लालच लिए निर्णय न लिए जाऐं। उचित निर्णयों पर चलें। सभी अपनी जाति से गर्व और प्रेम करें व जितना वो अपनी जाति का मान और लगाव करते हैं उतना ही दूसरी जाति को भी सम्मान और प्यार दें ताकि जातिगत संतुलन भी बना रहे और आपसी घृणा खत्म हो। समाज सुधारकों का कर्तव्य समाज निर्माण और संरक्षण है। दोषमुक्त समाज बना प्रगति पथ पर बढे़।

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