लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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पानी

पानी

शैलेन्द्र चौहान
हमारे देश को आजाद हुए 68 वर्ष हो चुके हैं और हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं। देश के अनेकों सर्वोच्च पदों को महिलाएं सुशोभित कर रही हैं किंतु महिलाओं पर अत्याचार वाली कुप्रथाएं बदस्तूर जारी हैं। देश चाहे कितनी भी तरक्की कर रहा हो लेकिन कुछ गलत हरकतें इसकी शान में बट्टा लगा देती हैं। उत्तर भारत के कई राज्यों में ‘डायन प्रथा’ के जरिए महिलाओं पर लोमहर्षक अत्याचार होते रहे हैं। औरतों की ज़मीन और संपत्ति हड़पने के मक़सद से, आपसी द्वेष और यौन संबंध स्थापित करने से मना करने के कारण पड़ोसी और रिश्तेदार उन्हें डायन घोषित करने का षड्यंत्र रचते हैं। आदिवासी गांवों में जहां अंधविश्वास बड़े पैमाने पर है और इलाज की सुविधाएं बुरी हालत में हैं, नीम हकीम के भरोसे हैं वहां ये लोग स्थानीय लोगों के साथ मिलकर फ़सल बर्बाद होने, बीमारी और प्राकृतिक आपदाओं के लिए औरतों को ज़िम्मेवार ठहराने का षड्यंत्र रचते हैं। कई पिछड़े इलाकों में चुड़ैल आदि के आरोप लगाकर महिलाओं को सार्वजनिक रूप से सजा देने की प्रथाएँ विद्यमान हैं। इसे भिन्न भिन्न स्थानों में भिन्न भिन्न नामों से जाना जाता है यथा चुड़ैल, डायन, डाकिनी, डाकण आदि। राजस्थान आदि में इसे डाकण प्रथा नाम से भी जाना जाता है। यह एक कुप्रथा है, जिसमें माना जाता है की जो महीला मन्त्र-विद्या जानती है जो छोटे बच्चों एवं नवविवाहित वधुओं को खा जाती है। विशेष रुप से यह प्रथा आदिवासियों में पाई जाती है, सबसे पहले इस प्रथा की जानकारी राजस्थान के उदयपुर जिले में खेरवाडा क्षेत्र से अग्रेंजों को मिली थी। डायन प्रथा बिहार के कई इलाकों मे आज भी सक्रिय है इसमे जादू के नाम पर औरतों की बलि दी जाती है। राष्ट्रीय महिला आयोग की हाल की रिपोर्ट के अनुसार झारखण्ड, असम, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र के 50 से अधिक जिलों में महिलाओं को डायन बता कर उन पर अत्याचार किए जाते हैं। मीडिया के कारण (भले ये उनके लिए महज टी. आर. पी. या सर्कुलेशन बढ़ने का तमाशा मात्र हो) कुछ घटनायें तो सामने आ जाती हैं पर कई ऐसी कहानियां दबकर रह जाती होंगी। बेशक ये बातें आपके-हमारे बिलकुल करीब की नहीं, गांव-कस्बों की हैं। किसी खास समुदाय या वर्ग की हैं, पर सिर्फ इससे, आपकी-हमारी जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती। लेकिन ये महज़ खबरें नहीं, जिन्हें एक नज़र देखकर आप निकल जाते हैं। इनमें एक स्त्री की ‘चीख’ है, उसका ‘रुदन’ है, उसकी ‘अस्मिता’ के तार-तार किये जाने की कहानी है, अन्धविश्वास का भंवर जिसका सब कुछ डुबो देता है और हमारा ‘सभ्य’ समाज इसे ‘डायन’ कहकर खुश हो लेता है। ‘डायन’, क्या इसे महज अन्धविश्वास, सामाजिक कुरीति मान लिया जाये या औरतों को प्रताड़ित किये जाने का एक और तरीका। आखिर डायन किसी स्त्री को ही क्यूँ कहा जाता है? क्यूँ कुएं के पानी के सूख जाने, तबीयत ख़राब होने या मृत्यु का सीधा आरोप उसपर ही मढ़ दिया जाता है? असल में औरतें अत्यंत सहज, सुलभ शिकार होती हैं क्यूंकि या तो वो विधवा, एकल, परित्यक्ता, गरीब,बीमार, उम्रदराज होती हैं या पिछड़े वर्ग, आदिवासी या दलित समुदाय से आती हैं, जिनकी जमीन, जायदाद आसानी से हडपी जा सकती है. ये औरतें मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से इतनी कमजोर होती हैं कि अपने ऊपर होने वाले अत्याचार की शिकायत भी नहीं कर पातीं. पुलिस भी अधिकतर मामलों में मामूली धारा लगाकर खानापूर्ति कर लेती है। काला जादू या टोना-टोटका के अंधविश्वास भरे आरोप लगा कर किसी महिला को डायन बताकर मार डाला जाता है। गौरतलब है कि यह कुप्रथा सिर्फ महिलाओं पर अत्याचार करने के लिए ही बनी है। आज तक किसी पुरूष की पिशाच, राक्षस, जिन्न या भूत कहकर हत्या नहीं की गई है बल्कि उनका महिमामंडन ही किया जाता रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत में 1987 से लेकर 2003 तक, 2 हजार 556 महिलाओं के हत्या की गई थी। डायन प्रथा की आड़ में कई संगीन अपराधों को अंजाम देना हमारे समाज में आम बात है। भारत के गांवों में आज भी अंधविश्वास और रूढ़िवादिता का बोलबाला है। गांवों तथा छोटे कस्बों में अभी भी तांत्रिक, ओझा, भोपा, गुनिया तथा रसूखदार लोग अपने मतलब के लिए किसी महिला को कथित तौर पर डायन, डाकन, डकनी, टोनही आदि घोषित कर देते हैं। विडंबना यह है कि अगर किसी महिला को डायन बता दिया जाता है तो अक्सर उसके परिवार वाले, नाते-रिश्तेदार भी सामाजिक दबाव से उसका बहिष्कार कर देते हैं। वहीँ इलेकट्रॉनिक मीडिया का मनोरंजन पक्ष देखें जहाँ टी वी सीरियलों में भूत, प्रेत, डायन, शक्तिशाली बाबा, चमत्कारों, अंधविश्वास और पाखंड को चमक दमक के साथ निर्बाध प्रचारित किया जा रहा है। इसके लिए कोई कानून नहीं है।महिला आयोग का कहना है कि अक्सर महिलाओं को संपत्ति से बेदखल करने, उनकी संपत्ति पर कब्जा करने, यौन शोषण का विरोध करने या पत्नी को तलाक देने के लिए इस ‘प्रथा का इस्तेमाल’ किया जाता है। आयोग ने राजस्थान के टोंक जिले की कमला नामक एक महिला का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे कमला के पति ने उसे ‘डायन’ घोषित करवा दूसरी महिला से शादी कर ली तथा उसे बुरे हाल में घर तथा गांव से निकाल दिया। गुजरात के बडोदरा, पंचमहल और दाहोद जिले डायन बताकर हत्या करने के लिए कुख्यात रहे हैं। कई मामलों में पूरा गांव ही हत्या में शामिल पाया गया है। झारखंड के रांची जिले के मांडर इलाके के कनीजिया गांव में ग्रामीणों ने ‘डायन’ बताकर पांच महिलाओं की लाठी-डंडे से पीट कर हत्या कर दी। इस मामले में पुलिस ने 27 लोगों को गिरफ्तार किया। झारखंड के लोहरदगा स्थित हंटरगंज में 2012 में दो परिवारों के चार लोगो की हत्या डायन बताकर की गई। झारखंड में इस वर्ष डायन प्रताड़ना के 1200 तो डायन हत्या के लगभग 150 मामले दर्ज हुए हैं। कहने को तो बिहार विभाजन से पहले ही 1999 में डायन प्रथा कानून लागू हो गया था, परन्तु शिक्षा के निम्नस्तर तथा जनता के दयनीय स्वास्थ्य ढाँचे ने इसे अर्थहीन साबित कर दिया है। राँची की समाज सेविका दयामनी बालराका का कहना है कि दर्जनों ऐसे सुदूर व दुर्गम गांवों में गरीबी व अंधविश्वास की अति है क्योंकि यहाँ ग्रामीणों ने कभी कोई स्कूल या कोई डॉक्टर नहीं देखा। ये कानून का पेचीदा स्वरूप क्या समझेंगे? राजस्थान के सिरोही जिले में डायन होने के शक में भोपा ने गुजरी नामक एक महिला के हाथ पूरे गांव के सामने खौलते तेल में डलवाए। हाथ झुलसने पर सभी ने उसे डायन मान लिया और उस पर पत्थरों की बारिश शुरू कर दी। बाद में लोहे के गर्म सरिए से उसके सिर को दाग दिया गया। पुलिस ने जैसे-तैसे इस महिला को बचाया था। असम में दशकों से डायन के नाम पर ख़ौफ़नाक कहानियां सुनाई जाती रही हैं। पिछले साल गृह मंत्रालय ने संसद में बताया कि 2010 से ‘डायन होने के संदेह के मामले में’ कम से कम 77 लोग जिसमें ज़्यादातर औरतें थी, को मारा जा चुका है और इसमें 60 घायल हुईं। एक एथलीट को डायन घोषित करते हुए उन्हें बांधकर बुरी तरह से पीटा गया। लैंगिक विषमता और महिला उत्पीड़न जैसे दुर्दम्य अपराध भारतीय पुरुष वर्चस्ववादी समाज में अंदर तक घुसे हुए हैं। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि दूरदराज के पिछड़े एवं देहाती इलाकों में शिक्षा और चेतना का स्तर बेहद निम्नस्तरीय है। राजनीतिक कारणों से वहाँ अंधविश्वासों, कुरीतियों और कुप्रथाओं को बदस्तूर चलने दिया जाता है। कहीं कहीं तो उसे धार्मिक जामा पहन दिया जाता है और जनप्रतिनिधि तथा उच्च अधिकारी इन कुरीतियों को प्रश्रय देते हैं। कुरीतियों और अन्धविश्वास के खिलाफ काम करने वाले लोगों की हत्याएं होती हैं। महाराष्ट्र में नरेंद्र दाभोलकर जैसे जाने माने अंधविश्वास विरोधी कार्यकर्ता को मौत के घाट उतार दिया गया। आवश्यकता इस बात की है कि देश को विकास के रास्ते पर लाने का एक पैमाना अंधविश्वास और कुप्रथा निर्मूलन भी हो तभी हम विकसित होने की दौड़ में आगे आ सकते हैं।

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