लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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कुतुबुद्दीन ऐबक और बाबर की समानता
जिस प्रकार पृथ्वीराज चौहान की पराजय के 13 वर्ष पश्चात भारत में ‘गुलाम-वंश’ की स्थापना करने वाला कुतुबुद्दीन ऐबक केवल 1206 से 1210 ई. के अल्पकाल तक ही शासन कर सका, उसी प्रकार मुगलवंश का संस्थापक बाबर भी अल्पकाल (1526 से 1530 ई.) तक ही शासन कर पाया था। इन दोनों के शासन काल लगभग समान अवधि के हैं। कुतुबुद्दीन और बाबर की इस समानता के अतिरिक्त दोनों में एक समानता ये भी है कि कुतुबुद्दीन के नाम पर कुतुबमीनार का निर्माण अपने आप में एक झूठ है, और वैसे ही बाबर के नाम पर  ‘रामजन्म भूमि’ पर ‘बाबरी मस्जिद’ के नाम से किया गया बाबर का निर्माण कार्य भी इतिहास का एक पीड़ादायक झूठ है। कुतुबुद्दीन ऐबक ने कुतुबमीनार पर अपना अधिकार जताकर भारतवर्ष के इतिहास को जिस प्रकार मिटाने का प्रयास किया, उसी प्रकार  कहीं उससे भी अधिक पीड़ादायक ढंग से बाबर ने भी रामजन्मभूमि पर ‘बाबरी मस्जिद’ का निर्माण कर भारतवर्ष के इतिहास को मिटाने का प्रयास किया।

खौल रहा था भारतीय हिंदू का खून
अयोध्या स्थित इस पवित्र रामजन्मभूमि पर अधिकार करने वाले बाबर को अपने मर्यादा पुरूषोत्तम की जन्म स्थली पर अवैध अतिक्रमण या अधिकार करते देखकर 1528 ई. से ही हर भारतीय हिंदू का खून खौल रहा था। इसलिए अगले दो वर्ष में हिंदू वीरों ने बाबर के आक्रमण के पश्चात उसकी ओर से चल रहे अवैध निर्माण को रूकवाने के लिए चार पांच बार बाबरी सेना से जमकर संघर्ष किया।

हिंदू वीर देवीदीन पाण्डे
भीटी के राजा महताब की सेना में उस समय एक हिंदू वीर देवीदीन पाण्डे था। उसने बचपन से ही हिंदू संस्कार ग्रहण किये और किसी प्रकार से भी वह यवन परंपरा की पराधीनता स्वीकार करने को उद्यत नही था। वह एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में जन्मा था, इसलिए किसी भी प्रकार से किसी विदेशी शासक द्वारा भारत के सम्मान को चोट पहुंचाने की स्थिति उसके लिए असहनीय बन चुकी थी।   देवीदीन पाण्डेय के माता-पिता भी एक अच्छे परिवार से थे और सुसंस्कारित दैवीय गुण और देशभक्ति की भावना अपने शुद्घ हृदय में सदैव डाले रखते थे। स्वतंत्रता और स्वधर्म के उस परमोपासक युवा देवीदीन पाण्डेय की पहले दिन से ही शब्दों के भ्रमजाल में न रहकर हिंदू जागरण करने की प्रवृत्ति थी।

राष्ट्रीय भावना अपना काम  कर रही थी
उस समय देशभर में राम मंदिर की रक्षार्थ एक ऐसी राष्ट्रीय भावना काम कर रही थी जिसके कारण लोगों में अपने देश के प्रति सर्वस्व न्यौछावर करने के उत्तम विचारों का बड़ी तेजी से जन्म हो रहा था। इस प्रकार के विचारों को हवा दे रहे थे हमारे साधु-संत और देश में उनके द्वारा चलाया जा रहा ‘धर्म जागरण अभियान।’ इस महान देशभक्त और महावीर हिंदू देवीदीन पाण्डेय के विषय में भी कुछ जानकारी हमें ‘तुजुके बाबरी’ से ही मिलती है।

1528 ई. में जब भीटी नरेश महताबसिंह के द्वारा राम जन्मभूमि की रक्षार्थ युद्घ किया जा रहा था तो कहा जाता है कि युद्घ के सात-आठ दिन व्यतीत हो जाने के पश्चात यह हिंदू वीर देवीदीन पाण्डे युद्घ में अचानक प्रकट हो गया। वह अपने देश और धर्म के लिए मर मिटने के लिए नही, अपितु शत्रु को ‘मार मेटकर’ अमर होने के भाव के साथ युद्घ में कूद पड़ा।

बनाई 70,000 युवाओं की सेना
इतिहासकार लिखता है कि देवीदीन पाण्डेय के देशभक्ति के भावों का अनुसरण करते हुए लगभग 70,000 युवा और देशभक्त हिंदू रामजन्म भूमि की रक्षार्थ युद्घ में कूद पड़े।

इतिहास का यह कितना गौरवपूर्ण तथ्य है कि जिस देश के लिए यह कह दिया जाता है कि इसके सैनिक बिना नेता के युद्घ नही कर सकते, उसी देश के लोग बिना नायक के युद्घ की तैयारी करते हैं और अपना नायक एक ‘अभिमन्यु’ को बना लेते हैं। उन्हें किसी राजा या सम्राट की प्रतीक्षा नही थी कि वह कहेगा तो युद्घ करेंगे, या वह नेतृत्व देगा तो पीछे से चलेंगे। ना ही उन्हें किसी प्रकार के वेतन या पारितोषिक या ‘लूट के माल’ की अवश्यकता या प्रलोभन था कि वह मिलेगा तो ही युद्घ करेंगे।

उन वीरों की वीरता नमनीय और वंदनीय थी, क्योंकि वह संकट ग्रस्त भारतीय संस्कृति को अपनी निष्काम और निस्वार्थ सेवाएं देना चाहते थे। उनके लिए मातृभूमि ही सबकुछ थी, और वह उसी के लिए अपना सर्वस्व होम करना देना चाहते थे। ये देशभक्त सत्तर हजार युवा कृष्ण की गीता को हृदयंगम कर चुके थे और उसी के ‘निष्काम भाव दर्शन’ को अपना आदर्श बनाकर युद्घ के लिए सन्नद्घ हो गये।

सारे योद्घा बन गये राष्ट्र यज्ञ की समिधा
युद्घ की विभीषिकाएं इन हिंदू वीरों के आ जाने से और भी प्रचण्ड हो गयीं। मानो जलती आग में घी पड़ गया हो। सारे योद्घाओं ने स्वयं को राष्ट्र यज्ञ की समिधा बनाकर होम कर दिया, उनके हृदय में केवल एक भाव था, एक चाव था, और उनका एक ही दाव था कि जैसे भी हो हमारी रामजन्म भूमि पर पुन: ‘केसरिया’ लहराए, और हमारा सनातन वैदिक हिंदू राष्ट्र अपने सम्मान और संस्कृति की रक्षा कर सके।

देवीदीन पाण्डे की प्रशंसा स्वयं बाबर ने भी की
मां भारती के सत्तर हजार योद्घाओं ने जब मुगल सेना को काटना आरंभ किया तो मुगल सेना को अपार क्षति होने लगी। बड़ी संख्या में मुगल सेना का अंत किया जाने लगा। देवीदीन पाण्डे ने मातृभूमि के ऋण से उऋण होने के लिए अपने अदभुत शौर्य और साहस का परिचय दिया। उसके वीरतापूर्ण कृत्यों को देखकर स्वयं बाबर को भी आश्चर्य हुआ था। बाबर ने उसके विषय में लिखा है-‘‘जन्मभूमि को शाही अख्तियारात से बाहर करने के लिए दो चार हमले हुए, उनमें से सबसे बड़ा हमलावर देवीदीन पाण्डे था। इस व्यक्ति ने एक दिन में केवल तीन घंटे में ही गोलियों की बौछार के रहते हुए भी शाही फौज के सात सौ व्यक्तियों का वध किया। एक सिपाही की ईंट से उसकी खोपड़ी घायल हो जाने के उपरांत भी वह अपनी पगड़ी के कपड़े से सिर बांधकर इस कदर लड़ा कि किसी बारूद की थैली को जैसे पलीता लगा दिया गया हो।’’

देवीदीन पाण्डे की वीरता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसका परम शत्रु बाबर भी उसकी प्रशंसा में ऐसे शब्द लिखने के लिए विवश हो गया।

मातृभूमि और आर्यपुत्रों का वात्र्तालाप
देवीदीन पाण्डे जैसे लोगों से यदि मातृभूमि ने भी यह कहा कि-‘‘हे आर्यपुत्र! तुम युद्घ के लिए मत जाओ, क्योंकि शत्रु का उचित प्रतिकार करने के लिए तुम्हारे पास उचित हथियार नही हैं। तुम उसकी तोपों का सामना अपने तीरों से नही कर सकते हो, उसके पास वेतनभोगी और ‘लूट का माल’ पाकर मौज उड़ाने के लिए आतुर लोगों की एक विशाल सेना है, जिसे तुम परास्त नही कर सकोगे, और यदि तुमने उसे परास्त कर भी दिया तो तुम्हें मिलेगा क्या?’’ तब तो हर देवीदीन पाण्डे ने बड़ी विनम्रता से मां को उत्तर दे दिया-‘‘हे वीर प्रस्विनी, भारत माते! तेरे मुंह से ऐसे वचन सुनकर हमें अपने आप पर ही लज्जा आ रही है कि जो मां अपनी वायु की झनझनाहट तक से अपने दुधमुंहे बच्चों तक में वीरता का संचार करने के लिए प्रसिद्घ रही है, वह आज ऐसी बातें क्यों करने लगी है? क्या माते, तुम्हें अपने ‘यौवन’ पर विश्वास नही रहा?

हे वीर प्रस्विनी माता! शांत रहो। हमें मौन रहने का आवाह्न मत करो। हम बलिदानी हैं, और दुष्टों के संहार में हमें आनंद आता है। इसलिए दुष्टों के संहार में विजयी होकर लौटने का आशीर्वाद दो।

हममें और ‘लूट का माल’ खाने वालों में हे माते! आकाश पाताल का अंतर है। हम ‘खाने वाले’ नही हैं, हम ‘ऋण चुकाने वाले’ हैं, और हम पर सबसे बड़ा ऋण तो तेरा ये ही है कि हमें तेरी कोख से जन्म लेकर तेरी गोद में खेलने का सौभाग्य मिला है। हम इस कोख और गोद के ऋण को भली प्रकार  समझते हैं और अब जबकि इस ऋण से उऋण होने का अवसर आया है तो हे, वीर जननी भारत माता! युद्घ में विजयी होकर लौटने का आशीर्वाद दो। हमें वीरों के अपने परंपरागत मार्ग पर बढऩे दो माता। मार्ग मत रोको। समय वात्र्तालाप या विलाप का नही है, समय  किसी प्रकार के मिलाप या संताप का भी नही है। समय प्रस्थान का है, प्रयाण का है, प्रमाण का है, और अब हमें  वही करने दो।’’

तब अपने आर्य पुत्रों की इस तेजस्विनी वाणी को सुनकर माता का सीना गर्व से फूल गया और वह अपने पुत्रों का तिलक लगाकर माथा चूमकर उन्हें रणांगण के लिए भेज देती है।

मीरबकी खां हो गया था प्राण बचाने के लिए व्याकुल
अब चलेंगे रणांगन की ओर। देवीदीन पाण्डे के सिर पर पगड़ी बंधी थी, सिर तो फूटा था, पर वीर का साहस नही टूटा था। मीर बकी खां इस हिंदूवीर की अदभुत वीरता और अनूठे शौर्य को देखकर उसे अपने लिए मृत्यु का साक्षात रूप मान रहा था। वह उस साक्षात मृत्यु देव से अपने प्राण बचाने के लिए बहुत ही व्याकुल हो उठा था। मैदान से भाग भी नही सकता था और देवीदीन पाण्डेय के प्रहारों से बचना भी उसके लिए अब कठिन होता जा रहा था।

मीरबकी खां भयभीत होकर छुप गया हाथी के हौदे में
देवीदीन पाण्डे के लिए भी मीर बकी खां ही अपना प्रमुख शत्रु था, क्योंकि उसके दुराग्रह के कारण ही बाबर ने युग-युगों से भारत के पौरूष और मर्यादा के प्रतीक रहे मर्यादा पुरूषोत्तम राम के मंदिर को तोडऩे का निर्णय लिया था। अब बकी खां को अपने किये पर पश्चात्ताप होने लगा था। उसे देवीदीन पाण्डे के शौर्य ने अपने ‘पापबोध’ से इतना लज्जित किया कि वह भयभीत होकर अपने हाथी के हौदे में जा छिपा। उसको उस समय अपने प्राणों का भय सताने लगा। उसने आज देवीदीन पाण्डेय के रूप में आर्यों का पुरातन और परंपरागत पौरूष जो देख लिया था।

अमर हुतात्मा देवीदीन पाण्डे
रणक्षेत्र में मां भारती का परमोपासक और हिंदू वीर देवीदीन पाण्डे शत्रुपक्ष के लिए जिस समय साक्षात मृत्युदेव बना हुआ था, उसी समय मां भारती के उस आर्यपुत्र देवीदीन पाण्डे को शत्रु की तीन गोलियों ने अमर कर दिया। वह देशभक्त अपनी तेजस्विता के साथ जीवित रहा, तेजस्विता के साथ लड़ा और  तेजस्विता के लिए ही अमर हो गगया। चारों ओर शोक की लहर व्याप्त हो गयी। यह घटना 9 जून 1528 ई. की है।

मरने से पूर्व कर गया था मीरबकी खां को धराशायी
मां भारती का यह अमर पुजारी अपनी परमगति से पूर्व मीर बकी खां को इतना गंभीर रूप से घायल कर गया था कि वह पृथ्वी पर जा गिरा था और अचेतावस्था में पड़े मीरबकी खां को उसके सैनिक किसी प्रकार उठाकर अपने शिविर में  ले जाने में सफल हो गये। कहने का अभिप्राय है कि देवीदीन पाण्डे अपने मरने से पूर्व अपने शत्रु को मार चुका था, यह अलग बात है कि मीरबकी खां मरा नही था।

देवीदीन पाण्डे को श्रद्घांजलि
प्रताप नारायण मिश्र ने लिखा है-‘‘पर वाह रे मेरे शेर (देवीदीन पाण्डे) फूटे हुए सिर को पगड़ी से बांध बाघ के समान सामने खड़े मीर बकी खां पर झपट पड़ा। आक्रमणकारी अंगरक्षक का तो उन्होंने पहले ही सिर धड़ से अलग कर दिया था। मीर बकी खां हक्का-बक्का सा आंखें फाड़े इस अद्वितीय महामानव के पैंतरे को देखता रह गया। उसकी जान को लाले पड़ गये। जान बचाना दूभर हो गया, तो यह आभास होते ही वह घबराकर हाथी के हौदे में जा छिपा। उसकी घिग्गी बंध गयी। बुझते हुए दीप की यह अंतिम लौ थी, यह पाण्डे समझ गया था। मीर बांकी खान का अंत होना सन्निकट था, पर उसका भाग्य प्रबल था। उसके हाथ में भरी हुई बंदूक थी तीन बार की ‘धांय-धांय-धांय’ की आवाज हुई। गोली पाण्डे के वक्षस्थल को चीर गयी। पाण्डे की तलवार का प्रहार चूक चुका था। प्रहार चूककर महावत और हाथी पर जा पड़ा। दोनों ढेर हो गये। पलक झपकते ही यह क्रिया पूर्ण हो गयी। मीर बकी खान गंभीर रूप से घायल पड़ा था। किसी प्रकार कुछ बचे-खुचे सिपाही उसे वापस जीवित ले जा सके। एक और ‘अभिमन्यु’ कत्र्तव्य की वेदी पर बलि हो गया। मुस्लिम सेना की अपार क्षति हुई थी। जिसे 4-5 माह तक जन्मभूमि की ओर आने का वे साहस नही कर पाये थे।’’

है बलिदानी इतिहास हमारा
यह है-बलिदानी और गौरवपूर्ण हमारा इतिहास। भारत की ऐसी बलिदानी परंपरा को देखकर ही अभिभूत हुए कर्नल टॉड ने आगे चलकर एक ऐसे ही प्रसंग में  कहा है-‘‘पश्चिम के इतिहास में दतिया के राजा की शूरता के कारनामों से श्रेष्ठ कोई दूसरा उदाहरण नही मिलता, जिन्होंने शरणस्थली के नियमों एवं सम्मान की रक्षा में अपने प्राण दे दिये, जब महादजी सिंधिया की मृत्यु के पश्चात उनके उत्तराधिकारी दौलतराव सिंधिया द्वारा अत्याचार किये जाने की आशंका से उनकी स्त्रियों ने राजा से सुरक्षा एवं शरण मांगी।’’

प्रो. एच. एच. विल्सन का कहना है-‘‘हिंदुओं के युद्घ के नियम वीरता एवं मानवता से भरपूर है। वे शस्त्र हीनों स्त्रियों वृद्घों एवं विजितों की हत्या का निषेध करते हैं।’’

प्रो. एच. एच. विल्सन ने इस्लाम और ईसाइयत के इतिहास की समीक्षा की तो ज्ञात हुआ कि वहां युद्घ में सब कुछ उचित है। ‘जंग में सब कुछ जायज’ होने का मुहावरा वहीं से प्रचलित हुआ है। पर भारत के विषय में जब विल्सन ने देखा कि यहां तो स्थिति विपरीत है।

भारत की ऋषि जीवन शैली
यहां इस्लाम और ईसाइयत की भांति शस्त्रहीनों, स्त्रियों, विजितों आदि पर शस्त्र प्रहार नही किया जाता तो उसके हृदय से भारत की वीरता के लिए उपरोक्त शब्द प्रस्फुटित हुए। यहां युद्घ में भी मानवता है और वहां शांति में भी साम्प्रदायिक दानवता है। इतना भारी अंतर है इस्लाम व पश्चिमी जीवन शैली में और भारत की ऋषि जीवन शैली में। यहां की जीवन शैली सचमुच ऋषि शैली है, वही इसकी सभ्यता है, और वही इसकी संस्कृति है। यहां जीवन से कोई मोह नही है, पर जीवन के प्रति इतनी उदासीनता भी नही है कि उसे निर्मूल्य मानकर व्यर्थ ही जिया जाए। यहां जीवन के साथ ही जीवनोद्देश्य ‘मोक्ष’ जुड़ जाता है। इसलिए संसार में आकर ‘मुक्ति की खोज’ पहले दिन से ही प्रारंभ हो जाती है।

‘मुक्ति’ के अर्थ
भारत में इस ‘मुक्ति’ के व्यापक अर्थ हैं। राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक आदि सभी प्रकार की ‘मुक्ति’ हमें चाहिए। क्योंकि अंतिम ‘मुक्ति’ के लिए ये सारी मुक्तियां (स्वतंत्रताएं) सहायक सिद्घ होंगी। इसलिए ‘मुक्ति’ की अर्थात स्वतंत्रता की सार्वत्रिक साधना हमारा राष्ट्रीय पर्व है, राष्ट्रीय संकल्प है, राष्ट्रीय व्रत है, राष्ट्रीय चेतना है और राष्ट्रीय चरित्र है। यह कोई आश्चर्य नही है कि जब-जब इस मुक्ति की साधना के इस राष्ट्रीय पर्व, राष्ट्रीय संकल्प, राष्ट्रीय व्रत, राष्ट्रीय चेतना और राष्ट्रीय चरित्र को किसी भी प्रकार का संकट आ उपस्थित हुआ तो यहां ‘अभिमन्यु’ से लेकर ‘देवीदीन पाण्डे’ तक के अनेकों किशोरों ने और युवकों ने कितने ही ‘चक्रव्यूहों’ को तोड़ा और लोगों को बंधन मुक्त करने के लिए अपना प्राणोत्सर्ग किया। यह हमारी बलिदानी परंपरा है, जिसे इतिहास से मिटाकर हमारे साथ घोर अन्याय किया गया है।

हमारा राष्ट्रीय इतिहास तब तक अधूरा है जब तक कि उसके भीतर भारत की मुक्ति की साधना के इस राष्ट्रीय पर्व राष्ट्रीय संकल्प, राष्ट्रीय व्रत, राष्ट्रीय चेतना और राष्ट्रीय चरित्र को यथोचित सम्मानपूर्ण स्थान नही दिया जाता है। अभिमन्यु के लिए हमने आज तक ‘चक्रव्यूह’ रच रखे हैं। इतिहास का पुनर्लेखन कर इन कृत्रिम किंतु निर्मम और कठोर ‘चक्रव्यूहों’ को तोडऩा भी किसी स्वतंत्रता संग्राम से कम नही होगा।

एक दृष्टांत
एक मूत्र्तिकार ने अपने पुत्र को मूत्र्ति बनाने की कला सिखाने का उद्यम आरंभ किया। उसका पुत्र शीघ्र ही अपने व्यवसाय में पारंगत होने लगा। वास्तव में वह अच्छा मूत्र्तिकार बनता जा रहा था और जो भी उसे देखता वही प्रसन्नतावश उसकी प्रशंसा किये बिना नही रहता था। परंतु उसका पिता था कि मूत्र्तियों में कोई न कोई दोष निकालता ही रहता था। जिससे पुत्र को कष्ट होता था। वह सोचता था कि पिता संभवत: तेरे प्रति कठोर है, जो अन्य लोगों की भांति तेरी प्रशंसा नही करते हैं। पर वह कहता कुछ नही था, अपितु पिता के दिशा निर्देशानुसार मूत्र्ति बनाने में और भी अधिक उद्यम करता और अपनी कला को निखारने का प्रयास करता। परंतु पिता इसके उपरांत भी पुत्र की प्रशंसा नही करता था।

तब उस युवा कलाकार ने पिता को अपनी प्रशंसा करने के लिए बाध्य करने का एक उपाय खोजा। उसने एक अति सुंदर मूर्ति बनाई और अपने एक मित्र के द्वारा उसे अपने पिता के पास पहुंचवाया। मित्र ने कलाकार के पिता को जाकर वह मूर्ति सौंपी और उससे उस मूत्र्ति के कलाकार की प्रशंसा सुनने लगा। पुत्र कहीं ओट में होकर अपनी प्रशंसा सुन रहा था, उसे बहुत अच्छा लग रहा था कि पिता आज प्रशंसा कर तो रहे हैं? जब पिता ने मूत्र्तिकार की अति प्रशंसा कर ली, तब वह युवक अचानक सामने आ गया और हाथ जोडक़र बोला कि पिताजी यह मूत्र्ति मैंने ही बनायी है।

तब पिता ने पुत्र को बड़ी विनम्रता से समझाया कि पुत्र अभिमान व्यक्ति को गिराता है, इसलिए कभी भी अपनी कला का अभिमान मत करना। मैं यदि तुम्हें पहले दिन से ही प्रशंसित करने लगता तो तुम्हारे भीतर उद्यम और अध्यवसाय करने की प्रतिभा, मर जाती। तब तुम वह चमत्कार नही कर पाते, जो आज करके दिखाया है। झूठी प्रशंसा व्यक्ति को गिराती है। बच्चे को अपनी त्रुटि की अनुभूति हो गयी थी।

दें शहीदों को श्रद्घांजलि
हमने इतिहास के माध्यम से अपात्रों का मिथ्या कीर्तिगान पर्याप्त कर लिया है। जिसने हमें पतन के गर्त में गिराने का कार्य किया है। इस राष्ट्र की मूत्र्ति के मूत्र्तिकार और कुशल कलाकार विदेशी नही हैं, अपितु मां भारती के अपने आर्यपुत्र हैं। हमें उनका कीर्तिगान करने का राष्ट्रीय संकल्प धारण करना होगा। ‘देवीदीन पाण्डे’ ऐसे आर्यपुत्रों में अग्रगण्य होगा, जिसने अपने समय में अप्रत्याशित रूप से सत्तर हजार लोगों की एक विशाल सेना तैयार की और संस्कृति भक्षकों का भक्षण करने के लिए उनसे सीधे जा भिड़ा।

राम मंदिर निर्माण का हमारा राष्ट्रीय संकल्प जिस दिन पूर्ण हो जाएगा हम उसी दिन हम देवीदीन पाण्डे को वास्तविक और भावपूर्ण श्रद्घांजलि दे पाएंगे। यह राष्ट्र बाट जोह रहा है उसी दिन की जब यह अपने महान आर्यपुत्रों को श्रद्घांजलि देकर उनके ऋण से उऋण हो सकेगा। क्रमश:

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