लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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विजय कुमार

कुछ लोग कहते हैं कि नाम में क्या रखा है; पर सच यह है कि नाम में बहुत कुछ रखा है। विश्वास न हो तो शर्मा जी से पूछ कर देखें। उनका पूरा नाम मक्खन लाल शर्मा है; पर वे यह बताना पंसद नहीं करते। इसकी भी एक कहानी है।

बात उस समय की है जब शर्मा जी के मित्र वर्मा जी एक सुकन्या के हाथों नये-नये शहीद हुए थे! उस सुकन्या यानि श्रीमती वर्मा ने पहले करवा चौथ पर यह जिद ठान ली कि इस बार का व्रत दोनों साथ-साथ ही रखेंगे।

वर्मा जी बड़े धर्मसंकट में फंस गये। वे ठहरे एक घंटे में दो कप चाय पीने वाले; पर नयी-नवेली पत्नी को नाराज कर भावी जीवन में कांटे बोना ठीक नहीं था। इसलिए हां कर दी।

वर्मा जी सोचते थे कि नहाने के बाद व्रत चालू होगा; पर जब पत्नी ने उन्हें सुबह की चाय भी नहीं दी, तो वे समझ गये कि उन्होंने पैर पर कुल्हाड़ी नहीं, कुल्हाड़ी पर ही पैर दे मारा है।

इसके बाद का हाल तो और बुरा रहा। वर्मा जी के कुल्ला-मंजन और स्नान करते समय भी वर्मानी मैडम यह देखती रहीं कि कहीं वे चुपचाप दो-चार घूंट पानी न पी लें। स्नान के बाद वर्मा जी आदत के अनुसार नाश्ते की मेज की ओर बढ़े; पर वहां पूर्ण हड़ताल देख उल्टे पांव लौट आये। लंच वाला डिब्बा भी आज बहुत उदास था। उसकी ओर बड़ी हसरत से देखते हुए वे दफ्तर चल दिये।

पर दफ्तर में भी मुसीबतों का अंत नहीं हुआ। वर्मा मैडम ने शर्मा जी को, और शर्मा जी ने पूरे स्टाफ को व्रत की बात कहकर सावधान कर दिया कि आज कोई वर्मा जी को चाय-पानी के लिए परेशान न करे। बेचारे वर्मा जी दिन भर सिर पर हाथ रखे उस घड़ी को कोसते रहे, जब उन्होंने मैडम का मन रखने के लिए व्रत करने को हां कही थी।

यों तो दफ्तर में लोग आपस में शर्मा, वर्मा, गुप्ता जी आदि कहकर ही बुलाते हैं; पर उस दिन वर्मा जी को बार-बार मक्खन जी, भाई मक्खन लाल जी, मक्खन लाल जी सुनिये…आदि बोलते देख शर्मा जी झुंझला गये। उन्होंने जब टोका, तो वर्मा जी रो पड़े – आपको पता है कि आज मेरा निर्जल व्रत है। सुबह से एक घूंट पानी तक नसीब नहीं हुआ। यदि आपका पूरा नाम लेने से मेरे गले और दिमाग को कुछ ठंडक मिलती है, तो आपको क्या आपत्ति है ? मैं आपका नाम ही तो ले रहा हूं, कुछ और तो नहीं।

पूरे स्टाफ की सहानुभूति वर्मा जी के साथ देखकर शर्मा जी चुप रह गये; पर तब से वे अपना नाम मक्खन लाल की बजाय एम.एल.शर्मा ही बताते हैं।

कुछ-कुछ ऐसी ही कहानी दीपावली से दो दिन पूर्व मनाये जाने वाले धनतेरस पर्व की भी है। वैसे तो यह आयुर्वेदिक ओषधियों के निर्माता धन्वंतरि देवता का जन्मदिवस है; पर न जाने कब और कैसे यह धन्वंतरि त्रयोदशी धनतेरस हो गयी और लोग इस दिन दवाओं की बजाय बरतन और सोना चांदी खरीदने लगे।

शर्मा जी को यह पर्व और इसका नाम बहुत अच्छा लगता है। सरकारी नौकरी, और वह भी ऐसे विभाग में, जहां हर दिन सैकड़ों लोग अपने काम के लिए आते ही हों, वहां भला धन की चर्चा क्यों नहीं होगी ? इसलिए शर्मा जी हों या वर्मा जी, सब दिन भर धनवर्षा की प्रतीक्षा में छाता खोल कर बैठे रहते हैं। शाम तक किसी की जेब भर जाती है, तो किसी का थैला; पर छाता तो पूरी तरह धनतेरस पर ही गीला होता है।

जिन लोगों को सरकारी दफ्तर में प्रायः काम पड़ता रहता है, वे भी इस दिन की प्रतीक्षा करते रहते हैं। ‘जैसा माथा, वैसा तिलक’ के सिद्धांत के अनुसार जैसा कर्मचारी, उसके लिए वैसा ही डिब्बा।

कुछ लोग मिठाई के डिब्बे से ही संतुष्ट हो जाते हैं, तो कुछ को मेवे वाला डिब्बा भेंट करना पड़ता है। पहले तो लोग डिब्बे के ऊपर ही गांधी मार्का हरे कागज रख देते थे; पर अब माहौल बदल गया है। अतः उन कागजों को डिब्बे के अंदर ही रखना पड़ता है।

शर्मा जी की कुर्सी काफी ऊंची है। ऐसी कुर्सी पर बैठने वाले प्रायः मधुमेह से ग्रस्त होते हैं। उनके सब जजमानों को भी यह मालूम है। इसलिए उनके डिब्बे में न मिठाई होती है और न सूखे मेवे। बस वहां धन ही धन होता है। इसलिए तो धनतेरस का पर्व शर्मा जी को साल भर में सबसे सुहाना और पवित्र लगता है।

शर्मा जी की इस बार की धनतेरस भी बहुत अच्छी बीती। गांव के मकान की मरम्मत से लेकर शहर में कोठी, कुत्ता और कार जैसी कई समस्याएं हल हो गयीं। बेटी की अच्छे घर में शादी और बेटे को विदेश में पढ़ाने का सपना भी पूरा होने की संभावनाएं बढ़ गयी हैं। इस बार की धनवर्षा को उनका पुराना छाता संभाल नहीं सका और टूट गया।

पर इससे शर्मा जी को कोई दुख नहीं है। वे प्रतीक्षा में है कि कब धनतेरस आये और वे नया छाता खरीदें। जैसे बच्चे सोचते हैं कि हर महीने उनका जन्मदिवस हो और उन्हें नये कपड़े तथा उपहार मिलें, ऐसे ही शर्मा जी सोचते हैं कि काश हर त्रयोदशी धनतेरस हो और वे धनवर्षा को संभालने के लिए नया छाता खरीदें।

इस बार की धनतेरस तो बीत गयी है; पर उसकी खुमारी शर्मा जी पर अभी तक सवार है। छाते वाले की दुकान के सामने से निकलते हुए, दफ्तर में झपकी लेते हुए और रात को नींद की खुमारी में वे प्रायः पूछ बैठते हैं – क्यों, अगले महीने धनतेरस कब है ?

यदि किसी के पास अगले साल की डायरी या कैलेंडर हो, तो उन्हें धनतेरस की सही तारीख बता दे, जिससे उनकी बेचैन आत्मा को कुछ शांति मिले।

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