लेखक परिचय

वीरेंदर परिहार

वीरेंदर परिहार

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वीरेन्द्र सिंह परिहार

तीन तलाक और समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर इन दिनों आल इण्डिया मुस्लिम लाॅ पर्सनल बोर्ड और दूसरे मुस्लिम संगठन इन दिनों देश में कोहराम मचा रखे हैं। ताजा विवाद कुछ मुस्लिम महिलाओं द्वारा तीन तलाक के विरोध में रिट याचिकाओं के चलते सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सरकार से जब उसका रवैया जानना चाहा। तो मोदी सरकार ने शपथ पत्र के जरिए यह स्पष्ट कर दिया कि सरकार तीन तलाक, बहु विवाह और निकाह जैसे विभेदकारी प्रथाओं और कानूनों के विरोध में है। विवाद का एक बड़ा कारण यह भी है ला कमीशन ने कामन सिविल कोड पर पूरे देश से राय माॅगी है पर यह रायशुमारी बोर्ड एवं दूसरे मुस्लिम संगठनों को इतनी नागवार गुजरी कि उसने कह दिया कि हम ला कमीशन के सवालनामें का बहिष्कार करेंगे, सिर्फ हम ही नहीं पूरे देश में मुसलमान इसका विरोध करेंगे। ये मुल्क गंगा-जमुनी तहजीब का है, देश में कई तरह की संस्कृतियाॅ हैं। इस लिए सबके लिए समान कानून भारत के लिए अच्छा नहीं है। कहा गया कि देश के आदिवासियों के लिए कई अलग कानून हैं, पूरे देश को एक लाठी से हाॅकने की जरूरत नहीं है। यह भी कहा गया हम इस देश में संविधान द्वारा तय एक एग्रीमेन्ट के तहत रहते हैं। संविधान ने हमें अपनी जिंदगी जीने और अपने धर्म का पालन करने का हक दिया है। संविधान की दुहाई देते हुए कहा गया हमें अपने तरीके से रहने का अधिकार है। चुनौती भरे स्वर में कहा गया सुप्रीम कोर्ट को न तो इसमें कोई दखल देने का अधिकार है और न संविधान में इन्हें लेकर कोई बदलाव हो सकता है। यह भी कहा गया है कि इस मामले में सभी मुसलमानों की राय एक है। प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए कहा गया मोदी देश में अंदरूनी जंग की हालात पैदा किए जा रहे है। उपरोक्त बातों के परिपेक्ष्य में यह देखा जा सकता है कि तीन तलाक और कामन सिविल कोड के प्रश्न पर मुस्लिम समुदाय के धार्मिक और यहाॅ तक कि राजनीतिक नेतृत्व द्वारा बदलाव को स्वीकार करना तो दूर इन विषयों पर वह किसी चर्चा, विमर्श एवं संवाद तक के लिए तैयार नहीं हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि ’’वादे-वादे जायते तत्वबोधे’’ यानी कि वाद-विवाद से ही तत्व का बोध हो सकता है, सच्चाई सामने आ सकती है। पर एक बड़ा सच यह भी है, कि जिसके पास उचित तर्क नहीं होते या समुचित आधार नहीं होते। वह या तो कुतर्क करता है या बातचीत या चर्चा से दूर भागता है। यहाॅ पर बोर्ड और सभी मुस्लिम संगठनों का रवैया पूरी तरह कुतर्क पूर्ण एवं चर्चा से भागने का है। इसी में यह समझ में आ जाता है कि उनका पक्ष पूरी तरह निराधार एवं कमजोर है। तभी तो लाॅ कमीशन के सवालों को बायकाट करने की बात की जा रही है। कहा जा रहा है कि कई जगह देश के आदिवासियों के लिए अलग कानून है, वहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि ऐसे अलग कानूनों का मतलब समाज के कमजोर वर्गो के संरक्षण और उत्थान के लिए है उन्हें प्रगति की मुख्य धारा पर लाने के लिए है। लेकिन यहाँ तो मामला एकदम उल्टा है, मुस्लिमों में ये अलग किस्म के कानून उनकी अमूमन आधी आबादी महिलाओं के लिए सिर्फ भेदभाव से परिपूर्ण ही नहीं, बल्कि शोषण के पर्याय और अन्याय तथा अत्याचार के प्रतिरूप भी हैं। प्रसिद्ध समाजवादी विचारक डा0 राममनोहर लोहिया के अनुसार सभी भारतीय नारियाॅ शोषण और दमन का शिकार हैं। इसीलिए वह सम्पूर्ण नारी वर्ग को पिछड़े समुदाय में गणना कर उनके लिए विशेष अवसर दिए जाने के पक्षधर थे। जहाॅ तक मुस्लिम महिलाओं का प्रश्न है, वह तो इन विभेदकारी कानूनों और प्रथाओं के चलते और भी ज्यादा शोषण और पिछड़ेपन के दायरे में जीने को बाध्य हैं।
जहाॅ तक गंगा-जमुनी तहजीब और कई संस्कृतियों की बात है, वहां यह बात अच्छी तरह समझ लेने की जरूरत है कि जमुना, गंगा में मिल जाने पर गंगा ही हो जाती है। किसी भी राष्ट्र में बहुत सारी अनेकताऐं और विविधताऐं तो हो सकती है, पर संस्कृति तो एक ही होगी। पंडित दीनदयाल उपाध्याय इसी को अनेकता में एकता कहते थे। कहने का तात्पर्य यह कि खान-पान, वेष-भूशा, रहन-सहन, बोली,भाषा को लेकर इस देश में चाहे जितनी विभिन्नताए हों, पर कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक यदि सम्पूर्ण राष्ट्र एक है तो इसकी वजह यही कि उसकी संस्कृति एक है। इसको यो भी कह सकते है कि हमारी जीवन को देखने की दृष्टि एक है, आदर्श एक है, महापुरूष एक हैं, हमारे सुख-दुख एक है। आखिर में जब भारतीय सेना 1998 में करगिल में अतिक्रमणकारियों को खदेड़ देती है या सीमा पर पी.ओ.के में 28-29 सितंबर की दरम्यानी रात सर्जिकल स्ट्राइक कर पचासों आतंकियों को मार देती है, तो पूरा देश गौरव से भर उठता है, जन-जन एक अपूर्व हर्ष एवं आनंद का अनुभव करता है। इसी तरह से जब 18 सितंबर का उरी में 19 भारतीय सैनिकों का आतंकवादियों द्वारा बलिदान हो जाता है तो कमोबेश पूरे देश के लोंगो को बिजली का झटका जैसा लगता है, और वह अवसाद से भर जाते हैं। निःसंदेह जो इसके उलट महसूस करते है वह राष्ट्र विरोधी तत्व है। इसी तरह से जो देश के अंदर अलग-अलग संस्कृतियों की बाते करते है वह एक तरह से अलगाववादी भावना का ही पोषण करते हैं। इसी आधार पर मुहम्मद अली जिन्ना ने कहा था कि मुस्लिम अलग संस्कृति यानी अलग राष्ट्र है। जहाॅ तक इस बात का सवाल है कि इस देश में मुसलमान संविधान द्वारा तय एक एग्रीमेन्ट के तहत रहते हैं, यह बात पूरी तरह बकवास है। मुसलमान इस देश में रहें-इसके लिए संविधान में कोई एग्रीमेन्ट नहीं हुआ था। अलबत्ता यह बात जरूर है कि इस देश में रहने वाले मुसलमानों ने पाकिस्तान के निर्माण के पक्ष में मत जरूर दिया था। पर उन्हें इसके लिए बाध्य करना तो दूर, यह तक नहीं कहा गया कि यदि वह पाकिस्तान के निमार्ण के पक्षधर थे तो उन्हें पाकिस्तान में ही जाकर रहना चाहिए। इतना ही नहीं बल्कि उन्हें इस देश में पूरी बराबरी और सम्मान के साथ रहने का अधिकार दिया गया। अलबत्ता उन्हें कोई विषेशाधिकार नहीं दिए गए थे। तब संविधान सभी की बहस में सरदार पटेल ने स्पष्ट रूप से कहा था कि यदि मुसलमानों को किसी किस्म के विषेशाधिकारों की अपेक्शा है तो उन्हें पाकिस्तान में जाकर रहना चाहिए। जहाॅ तक सवाल निजी कानून का है, तो इस संबंध में संविधान के अनुच्छेद 44 में यह स्पष्ट प्रावधान किया गया था कि इस दिशा में सतत् प्रयास होना चाहिए कि सभी नागरिकों पर कामन सिविल कोड लागू हो। जहाॅ तक धार्मिक अधिकारों का प्रष्न है तो कलमा, नमाज, जकात, रोजा और हज जो मुस्लिम धर्म के पाॅच मुख्य आधार है, उन पर कहीं भी रंचमात्र हस्तक्षेप नहीं किया गया है। सोचने की बात यह है कि यदि तीन तलाक और बहुविवाह धार्मिक अधिकार के दायरे में आते तो अधिकांश मुस्लिम देशों में इन्हें कैसे समाप्त कर दिया गया? यहाॅ तक कि अपने को इस्लामी राष्ट्र कहने वाला और शरीयत के अनुसार चलने का दावा करने वाले पाकिस्तान में भी तीन तलाक प्रतिबन्धित तो किया ही जा चुका है, दूसरा विवाह भी कोई व्यक्ति बगैर न्यायालय की अनुमति के नहीं कर सकता।
पर भारत में ऐसे सुधारों पर बात करने मात्र से ही इस्लाम खतरे में पड़ जाता है, मुस्लिमों की पहचान को संकट खड़ा हो जाता है। यह बात और करने की है कि मुस्लिम महिलाओं को भी बराबरी एवं निजी स्वतंत्रता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 14,15 और 21 में मिला है, जिसका हनन धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर नहीं किया जा सकता। हिन्दुओं में सती प्रथा की समाप्ति, बाल विवाह और दहेज प्रथा पर रोक इसके ज्वलंत उदाहरण है। पर ऐसे सुधारों का स्वागत करने के वजाय यह कहा जा रहा है कि यदि मुस्लिम कानून में पति को ऐसे अधिकार न रहे तो वह पत्नी की हत्या कर सकता है। यह भी कहा जा रहा है कि हत्या के विरोध में सजा का कानून होने के वावजूद हत्याएं कहां बंद हो रही है? यानी कुल मिलाकर ये जंगल राज के पक्षधर है, जिन्हें कुछ भी करने का अधिकार हो। डा. अम्बेडकर जो कि संविधान की ड्राफ्ट समिति के अध्यक्ष थे, वह चाहते थे कि कामन सिविल कोड को नीति निर्देशक तत्वों में नहीं, बल्कि संविधान में उसका स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए। मीनू मसानी, श्रीमती हंसा मेहता एवं राजकुमारी अमृत कौर ने यह कहते हुए इसका विरोध किया था कि निजी कानूनों का अस्तित्व आगे चलकर राष्ट्रीयता के विकास में बाधक बनेगा। निःसन्देह उनकी आषंका सच साबित हुई है तभी तो अलगावबादी सुर इतनी आक्रमकता के साथ निकल रहे है कि प्रकारांतर से सरकार को जंग की चुनौती दी जा रही है। यहाॅ तक कि लुधियाना के मौलवी हबीब उर रहमान यह कहने की हिम्मत कर सकते है कि मुसलमान केवल शरियत को मानेंगे। सरकार मुस्लिमों के मामले में दखल देने की जुर्रत न करे, याद रखे कि हम 26 करोड़ हैं।
जहाॅ तक समान कानूनों का प्रश्न है वहाॅ अग्रेजों ने कुछ मुस्लिम निजी कानूनों केा किनारे कर 1832 में आपराधिक क्षेत्र में समान कानून लागू कर दिए थे। इसी आधार पर 1860 में इण्डियन पैनल कोड बना था, जिसमें धारा 494 के तहत एक पति या पत्नी रहते दूसरा विवाह करना दंडनीय माना गया था। 80 प्रतिशत दीवानी व्यवहारों में भारतीय नागरिकों में एक रूपता है। किराए का कानून, संपत्ति अंतरण, संविदा वस्तुओं में विक्रय को और कस्टम कानून सभी भारतीयों पर समान रूप से लागू हैं। पर दुर्भाग्य से ’’फूट डालो और राज करो’’ के तहत 1937 में अंग्रेजों ने मुस्लिम पर्सनल लाॅ लागू कर दिया, जिसका मुख्य स्त्रोत षरियत है। मुस्लिम धर्म गुरूओं का कहना है कि शरियत आधारित होने से यह दैवी कानून है और सीधे अल्लाह एवं पैगम्बर का आदेश है, जिनमें कोई बदलाव नहीं हो सकता। जबकि हकीकत यह है कि हजरत मुहम्मद की मृत्यु के बाद इस्लाम सुन्नी और शिया में बंट गए। सुन्नी भी चार स्कूलों और शिया तीन स्कूलों में बंट गए। कहने का आषय यह कि शरियत की रचना दैवी नहीं, बल्कि मनुष्यों द्वारा हुई है। बडी बात यह कि यदि ’’आॅख के बदले आॅख’’ और ’’हॅाथ के बदले हाॅथ’’ और ’’जान के बदले जान’’ जैसे आपराधिक कानूनों की जगह मुसलमानों के लिए भी आधुनिक आपराधिक कानून लागू हो सकते है, तो विवाह और तलाक के मामलों में क्यों नहीं? दुर्भाग्य का विषय यह कि स्वतंत्र भारत में मुस्लिम लाॅ में व्यक्ति की गरिमा और मानव अधिकारों के हित में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। शहबानों प्रकरण में देश की शीर्ष अदालत यह कह चुकी है कि मुस्लिम समुदाय में निजी कानूनों में सुधार होना चाहिए। सर्वाेच्च न्यायालय यह भी कह चुका है कि ’’समान नागरिक संहिता’’ इस देश में विषमताओं को दूर कर, पूरे राष्ट्र को जोड़ने का कार्य कर सकती है। एवं अन्य मामलों में निष्कर्ष में कहा गया कि कामन सिविल कोड अनिवार्य रूप से लागू होना चाहिए, क्योकि इससे एक ओर जहाॅ मुस्लिम महिलाओं की सुरक्षा होगी, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय एकता और एकात्मता को बौता नहीं हो सकता।

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