लेखक परिचय

विजन कुमार पाण्डेय

विजन कुमार पाण्डेय

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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 विजन कुमार पाण्डेय

देश के अंदर हिंसा, फौज का सीमा पर भारत से तनाव, अदालत का सरकार से तनाव और कादरी की धूम। आम चुनाव से ठीक पहले पाकिस्तान ऐसी जगह खड़ा है, जहां से हर रास्ता मुश्किल नजर आता है। यहां एक प्रश्न है कि क्या पहली बार सरकार कार्यकाल पूरा कर पाएगी। पाकिस्तान की सरकार भारत के साथ सैनिक झड़पों और क्वेटा में शियाओं के कत्लेआम से जूझ ही रही थी कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ की गिरफ्तारी के आदेश दे दिए। प्रधानमंत्री अशरफ पर लंबे वक्त से भ्रष्टाचार के दाग थे। फिर चुनाव से ठीक पहले फैसला क्यों आया। यह सभी सवाल एक साथ ही उठ खड़े हो गए हैं। जी हां, अब पाकिस्तान का क्या होगा। वह मुंह में अमन और हाथ में छुरी लिए घूम रहा है। यह प्रश्न सभी के सामने है। इसका जवाब अभी तक नहीं मिला है। पाकिस्तान प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ को 24 घंटे के भीतर गिरफ्तार करने का आदेश जारी किया गया है। पावर रेंटल प्रोजेक्ट मामले की सुनवार्इ कर रहे सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को प्रधानमंत्री समेत 16 लोगों की गिरफ्तारी का आदेश दिया। मुख्य न्यायाधीश ने इस मामले में आरोपी सभी लोगों को उनके पद की परवाह किए बिना गिरफ्तार करने का आदेश दिया है। 16 में राजा अशरफ भी शामिल हैं। प्रधानमंत्री के सलाहकार फवाद चौधरी ने अदालत के फैसले को असंवैधनिक करार दिया है। उनका कहना है कि सेना और सुप्रीम कोर्ट सरकार गिराने की कोशिश कर रहे हैं। जून 2012 में प्रधानमंत्री बनने से पहले राजा अशरफ पाकिस्तान के जल और ऊर्जा मंत्री थे। उन पर आरोप है कि मंत्री रहते हुए उन्होंने कुछ कंपनियों को फायदा पहुंचाया। आरोप है कि लाभ पाने वाली कंपनियों ने अशरफ को भारी रिश्वत दी। रिपोर्ट के अनुसार राजा अशरफ ने 22 अरब रूपये की रिश्वत ली। इस केस के बाद पाकिस्तान में प्रधानमंत्री को ‘राजा रेंटल कहकर भी चिढ़ाया जाता है। जिस देश का प्रधानमंत्री ही जेल जाने की तैयारी कर रहा हो उस देश की क्या हालत होगी आप समझ सकते हैं। यह भूचालों का देश है। जब-जब वहां भूचाल आता है उसकी लपट भारत में आती है।

दरअसल पाकिस्तान में एक बाद फिर राजनीतिक भूचाल आ गया है। सुप्रीम कोर्ट की ही वजह से पिछले साल यूसुफ रजा गिलानी को प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा था। कोर्ट ने गिलानी को अदालत की अवमानना करने के कारण पद के लिए अयोग्य करार दिया था। गिलानी के इस्तीफे के बाद राजा परवेज अशरफ को प्रधानमंत्री बनाया गया था। उसी समय से ही माना जा रहा था कि राजा भी देर सबेर कानून की गर्मी झेल नहीं पाएगें। राजा को रंक बनना ही था। सर्वोच्च अदालत का आदेश ऐसे वक्त आया है जब पाकिस्तान की राजनीति में अचानक ताहिरूल कादरी का नाम गंूज रहा है। कादरी कनाडा से लौटे हैं। वे चुनाव सुधार, भ्रष्टाचार और अव्यवस्था को खत्म करने के लिए एक अंतरिम सरकार की मांग कर रहे हैं। कादरी की गरज तालिबान के खिलाफ भी है। ऐसा लग रहा है कि कादरी को सेना का समर्थन हासिल है। पाकिस्तान में आम चुनाव होने वाला है। जब वहां चुनाव नजदीक आता है। तभी भूचाल आता है। 1947 में पाकिस्तान आजाद हुआ। तभी से वह सैन्य शासन के लिए मशहूर रहा है। आजादी के बाद यह पहला मौका है जब संसद करीब पांच साल तक चली है। लेकिन इस संसद को भी आखरी समय में अस्थिर किया जा रहा है। वैसे पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को अमेरिका का समर्थन हासिल है। इसे अस्थिर करने के लिए अब कादरी सामने आ गए हैं। पाकिस्तान सेना इस सरकार को पहले ही हटाना चाहती थी। लेकिन अमेरिकी दबाव के कारण ऐसा वह कर न सकी। लेकिन अब वह कादरी के दबाव को सह नहीं सकेगी। जब ताहिरूल कादरी ने भ्रष्टाचार और सरकार की अक्षमता के खिलाफ आंदोलन का बिगुल बजाया तो सरकार के कान खड़े हो गए। कादरी अभी कुछ ही हफ्ते पहले कनाडा से आए हैं। वे मानते हैं कि भ्रष्टाचार और सरकार की अक्षमता ने विकास रोक दिया है। तालिबानी चरमपंथी फल-फूल रहे हैं।

दरअसल कादरी सेना की कठपुतली हैं। जिसका इतिहास तख्ता पलट और चुनावों में दखल देने की इबारतों से भरा पड़ा है। यहां भी पाकिस्तान दो अवाम में बटा हुआ है। कुछ लोग कादरी को सुधारों का मसीहा मान रहे हैं। जबकि कुछ लोग कादरी की मांग को असंवैधानिक मान रहे हैं। कादरी धार्मिक सहिष्णुता की बात करते हैं। वे तालिबान के खिलाफ फतवा भी जारी कर चुके हैं। सेना के साथ संबंधो से इनकार भी करते हैं। वे शांतिपूर्ण प्रदर्शन का दावा करते हैं। लेकिन सच्चार्इ कुछ और है। कादरी अपने को लोकतंत्र का बड़ा समर्थक बताते हैं। उनका कहना है कि सेना से कोर्इ वास्ता उनका नहीं है। लेकिन वे गलत बोल रहे हैं। किसी जमाने में वे पूर्व सेना प्रमुख और राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के पक्के समर्थक हुआ करते थे। कनाडा जाने से पहले वे मुशर्रफ के शासन काल में असेंबली मे थे। आज वही कादरी दूसरे रूप में दिख रहे हैं। सिर पर टोपी और उंगलियों से विजय का निशान बनाए जनता को नचा रहे हैं। पता नहीं इस नाच का फायदा किसे मिलेगा।

पाकिस्तान में आज जातीय ज्वालामुखी फट रहे हैं। अभी क्वेटा में आत्मघाती हमले में 115 लोगों की जान चली गयी। यह शिया मुसलमानों के खिलाफ हाल के दशकों में सबसे विभत्स हमला है। अफगानिस्तान की सीमा पर बसे क्वेटा शहर में एक स्नूकर क्लब पर हमला किया गया। इसके अलावा एक और विस्फोट हुआ। ये इलाके शिया बहुल वाले हैं। कुछ यही हालात 2007 में थी। फौजी ताकत जब दम तोड़ रही थी। बेनजीर भुट्टो की तस्वीर में जम्हूरियत का आर्इना दिख रहा था। करीब नौ साल का बनवास खत्म कर बेनजीर पाकिस्तान लौटी थी। उन्हें बड़ी मुश्किल से मुशर्रफ सरकार ने घर वापसी की इजाजत दी थी। कुछ अनहोनी होना का डर था मुशर्रफ सरकार को। हुआ भी वही। सरकार ने उन्हें भी सलाह दिया था कि वे लंबी रैलिया न करें। लेकिन बेनजीर वतन वापसी का इरादा पक्का कर चुकी थीं। वे आर्इ भी अपने वतन। पिता जुलिफकार अली भुट्टो की फांसी और दो भाइयों की वक्त से पहले मौत देख चुकी बेनजीर ने जिस दिन पाकिस्तान में कदम रखा, उसी दिन उनकी रैली में हमला हो गया। उस दिन तो बेनजीर बच गर्इ लेकिन सैकड़ों लागों की जान चली गर्इ। बेनजीर भुट्टो 35 साल की उम्र में बन गर्इ प्रधानमंत्री। उनमें राजनीतिक तजुर्बे की कमी थी। लेकिन वे एक करिश्मार्इ शखिसयत थी। बेनजीर का अपनी पार्टी के अंदर और बाहर भी बहुत आकर्षण था। वे अंतराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान की पहचान थीं। किसी दूसरे पाकिस्तानी को अंतरराष्ट्रीय मंच पर बेनजीर जितनी मान्यता नहीं मिली। मगर घरेलू मोर्चे पर नाकामी और पति आसिफ अली जरदारी की बदनामी से बेनजीर भुट्टो पाक साफ नेता नहीं बन पार्इ। जरदारी का नाम भ्रष्टाचार में इस कदर फंस चुका था कि उन्हें मिस्टर टेन पर्सेंट कहा जाने लगा था। उनके उपर विदेशी बैंकों में अकूत पैसे रखने के आरोप लगे। फिर शुरू हुर्इ दूसरी पारी। पाकिस्तानी फौज और अफगानिस्तान के साथ रिश्तों की वजह से भी बेनजीर पर सवाल उठने लगे। पाकिस्तानी फौज फिर सरकार पर भारी होने लगी। बेनजीर फौज के साथ तालमेल नहीं बैठा पार्इ। अफगानिस्तान में 1996 में जब तालिबान तख्ता पलट रहा था और बेनजीर की सरकार साथ दे रही थी। जुलिफकार अली भुट्टो की तरह बेनजीर भी अफगानिस्तान में हर मुधे के साथ थीं, जो पाकिस्तान के फायदे में जाता हो।

फिर पाकिस्तान इस्लमी कट्टरपंथियों के हाथ में नाचने लगा। आखिरकार बेनजीर के इस्लामी चरमपंथ उनकी जान की दुश्मन बन गये। 27 दिसंबर 2007 को रावलपिंडी में चुनावी रैली के दौरान उन्होंने खुली जीप से दो घड़ी सिर बाहर निकाला। लेकिन इतने ही समय में उन्हें गोलियों से छलनी कर दिया गया। फिर वही हुआ भुट्टो परिवार का एक और सदस्य बेवक्त मौत की गोद में समा गया। बेनजीर की असमय मौत से पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को 2008 के चुनाव में असीम सहानुभूति मिली। सरकार बन गर्इ। घोटालों के आरोप में आठ साल जेल में रहने वाले पति आसिफ अली जरदारी पाकिस्तान के राष्ट्रपति बन गए। चौबिस साल के बेटे बिलावल भुट्टो पार्टी के सह अध्यक्ष बन गए। वही किस्सा फिर सुरू हुआ। आज यही पाकिस्तान हमारे सामने खड़ा है दो चेहरे लेकर। हम अब भी उसके दोनों चेहरे को अच्छी तरह देख नहीं पाए हैं। या हमारी सरकार सब देखकर भी अनदेखी कर रही है। इसका फायदा पाकिस्तान उठा रहा है। इतना होने के बाद भी पाकिस्तानी विदेश मंत्री कह रही है कि भारत युद्ध के लिए आमादा है। पाकिस्तानी विदेश मंत्री हीना रब्बानी खार का यह बयान उस बयान के बाद आया है जिसमें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि पाकिस्तान के साथ सामान्य रिश्ते नहीं हो सकते। चलिए भारत के प्रधानमंत्री को देर से यह बात समझ आयी। पता नहीं क्या मजबूरी है कि भारत पाकिस्तान से दोस्ती का हाथ बढ़ाता रहता है। जबकि वह दोहरी चाल चलता रहता है। दरअसल पाकिस्तान दोस्ती करने लायक है ही नहीं। अब समय आ गया है कि हम उससे दुश्मनी करें। दुश्मन की तरह बरताव करें तो शायद उसे समझ में आ जाय कि दुश्मनी क्या होती है।

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