लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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महिला आरक्षण

महिला आरक्षण

लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन द्वारा बुलाए गए महिला विधायकों के राष्ट्रीय सम्मेलन में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के मुद्दे को उछालकर पिछले दो दशक से ठंडे बस्ते में पड़े मुद्दे को एक बार फिर हवा दे दी है। हालांकि संप्रग सरकार के कार्यकाल में 6 साल पहले महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा में भारी बहुमत से पारित हो चुका है, किंतु लोकसभा में इसे अब तक कृत्रिम और अतार्किक अडंगे लगाकर पारित नहीं होने दिया गया है। लिहाजा राष्ट्रपति को कहना पड़ा है कि विधायिका में आरक्षण दिए बिना महिलाओं का सशक्तीकरण असंभव है। गोया सभी राजनैतिक दलों का दायित्व बनता है कि वे इस लंबित पड़े विधेयक को लोकसभा से पारित कराएं। शीर्ष संस्थाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व से वंचित महिलाएं सशक्त नहीं बन सकती हैं। उन्होंने इस तथ्य की पुष्टि इस बात से की, कि महिलाएं अवसर मिलने पर न केवल नेतृत्व कौशल का अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं, बल्कि समग्र समाज को बेहतर बनाने का काम भी कर रही हैं। इसे पंचायत एवं स्थानीय निकायों में काम कर रहीं 12.70 लाख निर्वाचित महिलाओं की कार्यसंस्कृति में देखा जा सकता है। किंतु इसी सम्मेलन के समापन सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिला आरक्षण मुद्दे को सर्वथा नजरअंदाज करके अपरोक्ष रूप से यह जता दिया कि उनके कार्यकाल में इस विधेयक का पारित होना असंभव ही है। दरअसल कई मुद्दों पर घिरी सरकार अब ऐसे किसी मुद्दे को हाथ लगाना नहीं चाहती,जो उसके लिए बर्र का छत्ता साबित हो।

राज्यसभा से पारित इस विधेयक को कानूनी रूप देने के लिए लोकसभा और पन्द्रह राज्यों की विधानसभाओं का सफर तो तय करना होगा। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से पूर्व कई न्यायालयीन चुनौतियों का सामना भी करना पड़ सकता है। इसलिए यह कदम ऐतिहासिक जरूर है, लेकिन जब तक यह विधेयक कानूनी रूप नहीं ले लेता तब तक इसे ऐतिहासिक कहना न्यायसंगत नही होगा। इसके कानून बनते ही ऐसे कई दोहरे चरित्र के चेहरे हाशिये पर चले जाएंगे, जो पिछड़ी और मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण देने के प्रावधान के बहाने, गाहे-बगाहे पिछले दो दशक से गतिरोध पैदा करते चले आकर बिल लटकाए रखने का प्रपंच रच रहे है। लेकिन जिस दृढ़ संकल्प और राजनीतिक इच्छाशक्ति के चलते डाॅ मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व में सोनिया गांधी ने राज्यसभा में सरकार दांव पर लगाकर मतदान के जरिए विधेयक पारित कराने का जो निर्णायक फैसला लिया था,निसंदेह वह संवैधानिक इतिहास का अनूठा फैसला था।

महिला आरक्षण विधेयक का मूल प्रारूप संयुक्त मोर्चा सरकार के कार्यकाल के दौरान गीता मुखर्जी ने तैयार किया था। लेकिन अक्सर इस विधेयक को लोकसभा सत्र के दौरान अंतिम दिनों में पटल पर रखा गया। इससे यह संदेह हमेशा बना रहा कि एचडी देवगौड़ा, इन्द्रकुमार गुजराल और अटलबिहारी वाजपेयी सरकारें गठबंधन के दबाव और राजनीतिक असहमतियों के चलते इस मंशा-बल का परिचय नहीं दें पाईं थीं, जो कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार ने जताई थी। जबकि इस सरकार को अपने ही सहयोगी दलों के जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा था। यहां तक की समर्थक दलों ने कांग्रेस को समर्थन वापसी की धमकी भी दी थी। हालांकि प्रजातंत्र में तार्किक असहमतियां, संवैधानिक अधिकारों व मूल्यों को मजबूत करने का काम करती हैं, लेकिन असहमतियां जब मुट्ठीभर सांसदों की अतार्किक हठधर्मिता का पर्याय बन जाएं तो ये संसद की गरिमा और सदन की शक्ति को ठेंगा दिखाने वाली साबित होती हैं। यदि राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति की मंशा के अनुरूप यह विधेयक लोकसभा के पटल पर वर्तमान सत्र में रखा जाता है तो चंद असहमतियां उभरना तय है। लेकिन इनकी परवाह किए बिना सरकार को विधेयक लोकसभा में लाने का साहस दिखाना चाहिए।

उस समय विधेयक से असहमत दलों की प्रमुख मांग थी, ‘33 फीसदी आरक्षण के कोटे में पिछड़े और मुस्लिम समुदायों की महिलाओं को विधान मंडलों में आरक्षण का प्रावधान रखा जाए।‘ जबकि संविधान के वर्तमान स्वरूप में केवल अनुसूचित जाति और जनजाति के समुदायों को आरक्षण की सुविधा हासिल है। ऐसे में पिछड़े वर्ग की महिलाओं को लाभ कैसे संभव है ? हमारे लोकतांत्रिक संविधान में धार्मिक आधार पर किसी भी क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था नहीं है। लिहाजा इस बिना पर मुस्लिम महिलओं को आरक्षण की सुविधा कैसे हासिल हो सकती है ? आंध्रप्रदेश और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने सच्चर व रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों को आधार मानते हुए मुसलमान व ईसाईयों को नौकरियों में धर्म आधारित आरक्षण की व्यवस्था की थी, लेकिन न्यायालयों ने इन्हें संविधान-विरोधी फैसला जताकर खारिज कर दिया था।

दरअसल इस कानून के वजूद में आ जाने के बाद अस्तित्व का संकट उन काडरविहीन दलों को है, जो व्यक्ति आधारित दल हैं। इसी कारण लालू, मुलायम और शरद यादव इस बिल के विरोध में दृढ़ता से खडे़ हो जाते हैं। उत्तरप्रदेश और बिहार में जातियता के बूते क्रियाशील इन यादवों की तिकड़ी का दावा रहता है कि इस अलोकतांत्रिक विधेयक के पास होने के बाद पिछड़ी व मुस्लिम महिलाओं के लिए जम्हूरियत के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। जबकि इनकी वास्तविक चिंता यह नहीं है ? दरअसल 33 फीसदी आरक्षण के बाद बाहुबलि बने पिछड़े वर्ग के आलाकमानों का लोकसभा व विधानसभा क्षेत्रों में राजनीतिक आधार तो सिमटेगा ही,  सदनों में संख्याबल की दृष्टि से भी इन दलों की ताकत घट जाएगी। अन्यथा ये सियासी दल वाकई उदार और पिछड़ी व मुस्लिम महिलाओं के ईमानदारी से हिमायती हैं, तो सभी आरक्षित सीटों पर इन्हीं वर्गों से जुड़ी महिलाओं को उम्मीदवार बना सकते हैं ? बल्कि अनारक्षित सीटों का भी इन्हें प्रतिनिधित्व सौंप सकते हैं। दरअसल इन कुटिल राजनीतिज्ञों के दिखाने और खाने दांत अलग-अलग हैं। गोया तय है कि अल्पसंख्यकों की बेहतर नुमाइंदगी की वकालात के इनके दावे थोथे हैं।

इन दलों का दोहरा चरित्र इस बात से भी जाहिर होता है कि जब देश की पंचायती राज्य व्यवस्था में महिलाओं का 33 फीसदी से 50 फीसदी आरक्षण बढ़ाने का विधेयक लाया गया था तब ये सभी दल एकराय थे। यही नहीं जब नगरीय निकायों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण का विधेयक लाया गया था, तब भी इन दलों की सहमति बनी रही। लेकिन जब लोकसभा व विधानसभा की बारी आई तो यही दल गतिरोध पैदा करने लग जाते हैं। क्योंकि यह विधेयक कानूनी स्वरूप ले लेता है तो इनके निजी राजनैतिक हित प्रभावित हो जाएंगे। इनका लोकसभा और विधानसभा में पुरुषवादी वर्चस्व का दायरा 33 फीसदी कम हो जाएगा। राजनेताओं के लिए यह विधेयक इसलिए भी वजूद का संकट है, क्योंकि जिन लोक व विधानसभा क्षेत्रों से ये लोग लगातार विजयश्री हासिल करते चले आ रहे हैं, वह क्षेत्र यदि महिला आरक्षण के दायरे में आ जाता है तो इन्हें चुनाव लड़ना मुश्किल हो जाएगा ? तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी ने भी मुस्लिम समुदाय को बरगलाए रखने के नजरिये से इस विधेयक का विरोध किया था। भ्रष्टाचार में लिप्त ऐसे नेता भी इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं, जिनके लिए सांसद अथवा विधायक के रूप में लोकसेवक बने रहना सुरक्षा कवच का काम करता है।

हमारे देश में विकास को आंकड़ों और व्यक्तिगत उपलब्धि को संख्या बल की दृष्टि से देखने-परखने की आदत बन गई है। इस नाते हम मानकर चल रहे हैं कि 543 सदस्यीय लोकसभा में 181 महिलाओं की आमद दर्ज होने और 28 राज्यों की कुल 4109 विधानसभा सीटों में से महिलाओं के खाते में 1370 सीटें चली जाने से देश की समूची आधी आबादी की शक्ल बदल जाएगी। अथवा स्त्रीजन्य विशमताएं व भेदभाव समाप्त हो जाएंगे। फिलहाल लोकसभा में 12.15 प्रतिशत महिलाओं की ही भागीदारी हैं। दुनिया के 190 देशों में भारत का स्थान 109 वां हैं। 1952 में गठित पहली लोकसभा में सिर्फ 4.4 प्रतिशत यानी 489 में से महज 22 महिलाएं सांसद थीं। जबकि 16वीं लोकसभा में 66 महिलाएं लोकसभा सदस्य के रूप में प्रतिनिधित्वि कर रही हैं। विधानसभाओं में तो महिला विधायकों की उपस्थिति केवल 9 फीसदी हैं। हालांकि असमानता के ये हालत पंचायती राज लागू होने और उसमें महिलाओं की 33 और फिर 50 फीसदी आरक्षण सुविधा मिलने के बावजूद कायम हैं। लेकिन लोकसभा व विधानसभाओं में एक तिहाई महिलाओं की उपस्थिति इसलिए जरूरी है, जिससे वे कारगर हस्तक्षेप कर महिला की गरिमा तो कायम करें ही देश में जो पुरूष की तुलना में स्त्री का अनुपात गड़बड़ा रहा है, उसको भी समान बनाने के उपाय तलाशें। साथ ही महिला संबंधी नीतियों को अधिक उदार व समावेशी बनाने की दृष्टि से उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता भी दिखाई दे। चूंकि नरेंद्र मोदी समझ रहे हैं कि इस विधेयक को पारित कराना टेंढी खीर है,इसलिए उन्होंने बड़ी चतुराई से कह दिया कि ‘महिलाओं को सशक्त बनाने वाले पुरूश कौन होते हैं ? देश के निर्माण में आधी आबादी की सशक्त भूमिका रही है और वह पुरुषों से बेहतर घर चलाती हैं।‘ यानी महिलाओं को घर चलाने की बात कहकर अपनी सीमा जता दी। #महिला आरक्षण

प्रमोद भार्गव

 

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