लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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नई दिल्ली, 22 अप्रेल। व्यापार जगत की खबरों को देने वाले एक समाचार पत्र में नक्सलवाद पर अपना आलेख छपवाकर दिग्गी राजा ने ठहरे पानी में कंकर मारकर हलचल तो पैदा कर दी है। राजनैतिक विश्लेषक अब मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजा दिग्विजय सिंह के इस जहर बुझे तीर के पीछे के मंतव्य खोजने में लगे हैं। वैसे दिग्विजय सिंह के राजनैतिक जीवन के हिसाब से कहा जा सकता है कि राजा ने यह तीर भले ही निकाला अपने तरकश से हो, पर इसको रोशन करने वाले तार दस जनपथ की ही बैटरी में जाकर जुडेंगे, जहां से इसे उर्जा मिल रही है।

दस जनपथ के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी के बाद कांग्रेस के नंबर दो ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने यह कदम कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी से विचार विमर्श के उपरांत ही उठाया है। सूत्रों ने कहा कि गृह मंत्री बनने के बाद पलनिअप्पम चिदम्बरम की लोकप्रियता का ग्राफ बहुत ही तेजी से ऊपर आया है। उनकी कार्यप्रणाली के चलते अब गुप्तचर संस्थाएं सीधे उन्हें रिपोर्ट करने लगीं हैं। सरकार में नंबर दो पोजीशन पा चुके चिदम्बरम के पर कतरकर उन्हें साईज में लाने आलाकमान ने अपने विश्वस्त राजा दिग्विजय सिंह के मार्फत यह कदम उठाया है।

इस मामले में यह तर्क भी दिया जा रहा है कि राजा दिग्विजय सिंह कांग्रेस की रग रग से वाकिफ हैं, यही कारण है कि कभी राजनीति में कांग्रेस के चाणक्य रहे कुंवर अर्जुन सिंह के शागिर्द राजा दिग्विजय सिंह ने तिवारी कांग्रेस के गठन के वक्त भी उस नाजुक दौर में न केवल अर्जुन सिंह को साधे रखा था, वरन् कांग्रेस में भी मध्य प्रदेश जैसे सूबे में अपनी कुर्सी सलामत रखी थी। राजा दिग्विजय सिंह के बारे में कहा जाता है कि वे कांग्रेस का अंदरूनी रसायन शास्त्र बखूबी जानते हैं, वे जानते हैं कि किससे किसे मिलाने पर क्या समीकरण बन सकते हैं।

सूत्रों का कहना है कि शशि थुरूर प्रकरण में कांग्रेस की बुरी तरह भद्द पिट रही थी, इसी के चलते राजा दिग्विजय सिंह ने ही सोनिया गांधी को मशविरा दिया था कि इस तरह का एक आलेख अगर वे अपने नाम से प्रकाशित करवा देते हैं तो लोगों का ध्यान इससे बट जाएगा। राजा ने इसके लिए व्यापार की खबरों वाला अखबार इसलिए चुना क्योंकि राजनीति में रूचि रखने वाले लोग कम ही पढा करते हैं, और आलेख के प्रकाशन तक गोपनीयता बनी रहेगी। अगले दिन जब उस अखबार के रिफरेंस से बडे अखबारों में खबर छपी तक जाकर लोग चेते और मामले ने तूल पकडा।

इसके बाद एक के बाद एक खबरें मीडिया जगत में तय रणनीति के मुताबिक प्लांट की जाती रहीं ताकि चिदम्बरम को अहसास हो जाए कि आलाकमान उनकी सक्रियता से खफा है। लोगों को आश्चर्य तो तब हुआ जब सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस के एक जिम्मेदार महासचिव ने यह बात पार्टी फोरम के बजाए अखबार के माध्यम से की और उन पर अनुशासनात्मक कार्यवाही का नाम तक नहीं लिया गया, सिर्फ चेताया गया, वह भी इतने गंभीर मसले पर। शनै: शनै: सबको समझ में आ गया कि राजा अगर गुर्राया है तो इसके पीछे चाबी कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ से ही भरी गई है।

वैसे मीडिया में प्लांट की गई इस खबर में दम लगने लगा है कि छत्तीसगढ और उडीसा में नक्सली कार्यवाही की आड में चिदम्बरम खनन कंपनियों का हित साध रहे हैं। इन क्षेत्रों में खनन का काम करने वाली वेदांता कम्पनी के एक संचालकों में देश के गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम भी रह चुके हैं। राज्य सभा के रास्ते संसदीय सौंध पहुंचे मणि शंकर अय्यर ने तो साफ तौर पर यह बात कह दी थी कि यूपीए सरकार की नक्सल नीति वेदांता, एस्सार, पोस्को और मित्तल जैसे बडे व्यवसायिक घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए बनाई गई है।

-लिमटी खरे

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