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अभिनव भट्ट 

रोशनी की सत्ता अंधेरा कायम होने पर ही समझ में आती है। जब रात बिल्कुल घनी होती तो सुबह दस्तक देने को बेकरार रहती है। अंधेरा और ऊजाला एक ही स्कूल में पढ़ने वाले सहपाठी ही हैं। लेकिन दोनों में से एक की उपस्थिति दूसरे को गैरहाजिर कर देती है। दोनों तत्वों के मध्य एक ’बनाम’ की स्थिति कायम रहती है। वैसे तो हमारे जीवनशैली का प्रत्येक चरण ’बनाम’ से होकर गुजरता ही है। जहाँ भी चुनाव का प्राव धान होगा वहाँ ’बनाम’ स्थापित होता है। फैसला करना तो हमारे हाँथ में है कि किसे चुनकर अपने इस जीवन की सफलता का राजमार्ग बनायें?

सदाचार बनाम भ्रष्टचार, सच्चरित्रता बनाम चरित्रहीनता, साक्षरता बनाम निरक्षरता, मूल्य बनाम अवमूल्यन आदि की परिस्थिती से गुजरते हुए हमारा जीवन व्यतीत होता है। सभी ‘बनामों’ का मर्म एक ही है उजाला बनाम अंधेरा। मनुष्य अक्सर ही दोराहे पर खड़ा रहता है। एक रास्ता दिन के उपवन में पहुंचाता है, तो दूसरा अंधेरों के घने जंगल में। यह सब बातें तो सैद्धांतिक थीं। व्यवहारिकता के धरातल पर दृष्टिपात करने पर प्राप्त होता है कि सदाचार अब भ्रष्टाचार के अंधेरे में तब्दील हो चुका है। ईमान का उजाला कदाचार के समक्ष धूमिल होता जा रहा है। गुलामी के अंधेरे से हमारे महापुरुषों ने भारत को स्वतंत्रता के प्रकाश में लाकर खड़ा किया लेकिन व्यभिचारियों ने भ्रष्टाचार को ही भारत का चरित्र बना दिया। आज तिहाड़ में लोकतंत्र की संसद लगती है। ये हमारे चरित्र में मिलावट कर रहे हैं।

सच्चरित्रता भारत की पहचान है। चरित्र की शक्ति राष्ट्र को बलवती बनाती है। राम-कृष्ण-बुद्ध-जैन आदि महामानवों लागों ने भारत के मानचित्र को आलोकित किया है। इनकी शक्ति चरित्र थी। भारत के चरित्र की रक्षा के लिये ही राम ने चैदह वर्षों तक वनवास किया एवं रावण का नाश किया। कृष्ण ने गीता के उपदेश में कर्म की प्रधानता कही है। यही श्रमशीलता ही तो भरत का चरित्र रहा है। कुछ न करते हुए देश का अन्न खाना अकर्मण्यता है, जिसकी निन्दा अट्ठारहों पुराण और सभी उपनिषद करते आये हैं। श्रम की लयकारी ने संगीत, खेल एवं मानसिक स्थिरता को जन्म दिया। वर्तमान परिदृश्य इन उजालों से मुँह फेरता दिखायी दे रहा है। मुफ्त का खाने की आदत बनती जारही है। गोदामों में अन्नपूर्णा सड़ रही हैं। लेकिन किसी भूखे का निवाला नहीं हो पाती। भारत को अकर्मण्य बनाने के लिये उच्चस्तर पर प्रयास किये जा रहे हैं। शराबों की भट्ठी मंे देश के भविष्य को उजाला दिखाया जा रहा है। इन अंधेरों के सौदागरों को पता ही नहीं है कि शराब के भट्ठी की रोशनी पता नहीं कितने ही घरों के चिरागों को बुझा देती चुकी है। इस मानसिकता का दमन ही दिवाली का उत्सव है। श्रमपूर्ण संस्कृति की पुनः प्रतिष्ठा ही भारत को अजेय प्रकाशवान¨ देश बना पायेगी।

शिक्षा साधारण को विशिष्ट बनाने की क्रिया है। शिक्षा यदि देश के संप्रभुता के साथ मिलकर बाँटी जाय तभी उसकी सार्थकता समझ में आती है। शिक्षा का उद्देश्य ही होता है कि शिक्षार्थी को अज्ञानता के अंधेरे से निकाल ‘ज्ञानपुर’ के प्रकाश की नगरी में लाकर खड़ा करना। आज की शिक्षा फे्रंचाइजी के अंधेरे में झोंकी जा रही है। पराधीनता की अवस्था में भारत के शिक्षक परंपरा का निर्वहन आचार्य रामचंद्र शुक्ल, मुंशी प्रेमचंद्र इत्यादि महामनीषी करते थे। आज शिक्षा की पूरी आधारशिला ही शिक्षा सामंतों के पास चली गयी है। वहां बच्चे को शिक्षा के साथ अपराध भावना, हीनभावना से ग्रसित करने की शिक्षा भी दी जाती है। इस देश में अब आश्र्चय जनक उलटफेर देखने को मिलते हैं। शिक्षा का स्तर एवं साक्षरता दर, दोनों में ही इजाफा हुआ है। इसके साथ ही साथ बेरोजगारी के आँकड़े भी बुलंद होते जा रहे हैं। अंधेरे भविष्य से ग्रस्त शिक्षा की परंपरा को बदलना ही दीपोत्सव की सार्थकता होगी।

दूसरे के उत्थान में ही भारत का मूल्य निहित है। सहयोग की भावना ही श्रेष्ठ मूल्यों की कसौटी रहा है। यही मूल्य राष्ट्र की संप्रभुता को सांप्रदायिक, जातिवाद, भाषावाद के अंधेरों से खींचकर देव-दीपावली के पर्व में शरीक़ करता है। जहां लोग संदर्भ की उंगलियां पकड़कर चलने लगते हैं वहीं संप्रदाय बन जाता है। संप्रदायों के खानों बंटना भारत के मूल्यों से समझौता करना है। आज राजनीति इसी मूल्य को गौण करके संप्रदाय के पथ से गुजर रही है। सांप्रदायिकता नामक अवमूल्यन ऐसा कृष्णपक्ष है जिसमें कार्तिक की अमावस्या नहीं आती है। शुक्लपक्ष तो बहुत ही दूर की कौड़ी है।

 

त्याग भारतवर्ष की कसौटी रहा है। त्याग के ही कारण हम सदियों की पतंत्रता से मुक्त हुए। बात चाहे राम की हो या शबरी की, बुद्ध की हो या महावीर जैन की। महात्मा गांधी से लेकर अन्ना हजारे तक सभी ने सब कुछ त्याग कर ही देश को उजाला दिखाया है। स्वयं अंतिम व्यक्ति का वस्त्र धारण करने वाले गांधी ने अंतिम व्यक्ति को पूर्ण आजादी का शृंगार दिया है। जितने भी महापुरुषों का नाम लें, वे सभी अपने घर से अत्यंत धनाढ्य रहे हैं, लेकिन उन्होंने अपनी समस्त संपत्ति को ठोकर मारकर ही आज फलक पर आसीन हैं। भारत में इसीलिए दान की बड़ी संमृद्ध परंपरा रही है। दान देने से अशक्त के घर में भी रोशनी होती है। इससे बड़ा पुण्यशाली देश कौन होगा? महर्षि दधीचि ने सृष्टि रक्षा के लिए तो अपनी देह तक दान में दी थी। जनम के दानी होकर भी हमारे संस्कार में जमाखोरी का कृष्णपक्ष कैसे पनप गया? यह एक विचारणीय बिन्दू है। जमाखोरी व्यक्ति को कंस जैसा पातकी बनाती है।

 

कत्र्तव्यों के पथ पर चलने वाला भारत आज न जाने कैसे अधिकारों की दुहाई देने लगा। जिम्मेदारी से कतराकर हम अधिकारों को हासिल नहीं कर सकते। क्योंकि अधिकार भी हमें नये कत्र्तव्यों का बोध कराते हैं। कभी कम वेतन के लिए हड़ताल, तो कभी रूतबों में कमी होने के कारण अड़ना, जाति-भाषा-पंथ के खानों में विभक्त होना, हमें कत्र्तव्यों से पलायन करने का पाठ पढ़ाते हैं। जब हम तन की इच्छाओं की आहूति देंगे तभी हमारा वतन दीपावली की तरह जगमगाएगा। दीपावली-देव दीपावली कोई एक दिन का त्यौहार नहीं है, यह तो संकल्प का एक दिन है कि हम आज से भारत देश को अपनी सच्ची निष्ठा और ईमान की मेहनत के दीपों से वर्ष पर्यन्त आलोकित करेंगे। इस लोकतंत्र का जब तक अंतःकरण से सम्मान नहीं होगा तब तक दीपावली के कारण बने राम का वनवास समाप्त नहीं हो पायेगा।

संपर्क-
अभिनव भट्ट
एन 1/14, नगवां, लंका, वाराणसी-221005

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