लेखक परिचय

डॉ. संजय वर्मा

डॉ. संजय वर्मा

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज (सांध्य) में सहायक प्राध्यापक (तदर्थ) के पद पर कार्यरत हैं।

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भाग-1

डॉ. संजय वर्मा

eduभारत में शिक्षा प्रणाली की गौरवशाली परंपरा रही है। प्राचीन काल में भारत का अपने शिक्षा केन्द्रों के कारण पूरे विश्व में विशिष्ट स्थान था। नालंदा और तक्षशिला विश्व प्रसिद्ध शिक्षा केन्द्र थे जहाँ विश्व के कोने-कोने से लोग शिक्षा ग्रहण करने आते थे। प्राचीन काल में भारतीय शिक्षा पद्धति का विशिष्ट होना विश्व के शिक्षार्थियों को आकर्षित करता था। मध्ययुगीन अंधकार और अंग्रेजी दासता ने उस गौरवशाली शिक्षा प्रणाली को लगभग तहस-नहस कर दिया। 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजी दासता से मुक्ति मिली और 26 जनवरी 1950 को भारत गणतंत्र बना। लेकिन आज हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल है कि क्या भारत शिक्षा के सन्दर्भ में अपने प्राचीन गौरव को प्राप्त करने की दिशा में पहल की और यदि हाँ तो उस दिशा में कितनी सफलता मिली है। क्या इतने वर्षों बाद लोकतांत्रिक भारत की सरकारों के दिशा निर्देश में भारत शिक्षा के अपने बुनियादी उदे्श्यों को प्राप्त करने में सफल रहा है? उत्तर स्पष्ट है कि शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करने में भारत अब तक असफल रहा।

देश की शिक्षा प्रणाली दिशाविहीन है। शिक्षाविद् शायद इस बात से सहमत नहीं होंगे क्योंकि आज हमारे देश में आई आई टी, आई आई एम और अन्य उच्च स्तरीय शैक्षिक संस्थान है जो प्रोफेशनल, डाक्टर, इंजीनियर तैयार कर रहे हैं। किन्तु शिक्षाविद् और नीतिनिर्धारणकर्ता शायद इस बात से परिचित नहीं कि देश की आधी से ज्यादा आबादी गाँवों में बसती है और शायद हमारे नीतिनिर्धारणकर्ता हमारे देश और गाँवों को नहीं पहचानते एवं ग्रामीण इलाकों में आधारभूत संरचना की मौजूदा स्थिति उन्हें नहीं पता। हमारे देश में अभी भी बहुत से गाँव सड़कों से जुड़े नहीं है और स्कूल कॉलेज के छात्रों को कड़ी मशक्कत के बाद विद्यालय पहुँचना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर स्कूलों में नामांकन की समस्या है जिसके लिए सर्वशिक्षा अभियान और मिड डे मील स्कीम लाई गई ताकि नामांकन स्कूलों में बढ सके। सच तो यह है कि शिक्षा प्रणाली दिशाविहीन है क्योंकि हमारा शिक्षातंत्र बेरोजगारी बढ़ाने वाला है। आज छोटे शहरों, कस्बों और गाँवों से छात्र परंपरागत डिग्रियाँ लेकर निकल रहे है जो न तो रोजगारोंमुखी हैं और न ही किसी कौशल के विकास में सहायक हैं। दूसरी ओर जो प्राईवेट संस्थान खुल भी रहे है वो गुणवत्ता से परे है और सिर्फ शिक्षा व्यवसायियों के कमाई का साधन हैं।

भारत जैसे देश में जहाँ सभी वर्गों के शैक्षिणक उत्थान के लिए संवैधानिक प्रावधान है। अल्पसंख्यकों के लिए अलग से कानून व बजट का प्रावधान है किन्तु शिक्षा का स्तर स्तरहीन ही है। कहने की आवश्यकता नहीं कि भारत में शिक्षा का मौलिक अधिकार बच्चों को 2010 में मिला। जबकि आज से सौ वर्ष पहले भारत के महान सपूत गोपाल कृष्ण गोखले ने इम्पीरियल लेजिस्लेटिव एसेम्बली से भारतीय बच्चों के लिए इसकी माँग की थी। देश में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए मूल संविधान में तमाम प्रावधान समाहित किए गए है। अनुच्छेद 45 में 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने का प्रावधान किया गया है। अनुच्छेद-46 में शिक्षा की दृष्टि से अति पिछड़े हुए समाज के कमजारे वर्गों हेतु शिक्षा की विशेष व्यवस्था का प्रावधान किया गया है। इतना ही नहीं अनुच्छेद 30 (1) में धर्म व भाषा के आधार पर अल्पसंख्यक समुदायों को अपनी पसंद की शिक्षण संस्थापित करने तथा प्रशासित करने की स्वतंत्रता प्रदान करने का प्रावधान किया गया है। लेकिन संविधान लागू होने के इतने वर्षों बाद भी जब किसी राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संस्था द्वारा देश में शिक्षा की बदहाली की तस्वीर प्रस्तुत की जाती है तो सर शर्म से झुक जाता है। ऐसी ही एक तस्वीर हाल ही में यूनेस्को की एक रिपोर्ट मं सामने आई है जिसके अनुसार विश्व के 70 प्रतिशत वयस्क निरक्षर-नौ देशों में रहते हैं, जिसमें सर्वाधिक 25 प्रतिशत भारत में है। सरकार द्वारा जारी आंकड़ों को मानें तो 6 से 24 साल की उम्र वालों की संख्या 42 करोड़ के आसपास है, जबकि इनमें केवल 22 करोड़ ही शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। जबकि शिक्षा पर सरकार द्वारा प्रति वर्ष भारी-भरकम राशि खर्च की जाती है। क्या यह हमारे देश में सरकार की शिक्षा नीति की विफलता नहीं है?

सही मायने में अगर कहा जाए तो अटल बिहारी वाजपेयी देश के पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने देश के सभी बच्चों को साक्षर बनाने का सपना देखा और उसे साकार किया। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान सर्वशिक्षा अभियान नामक कार्यक्रम चलाया। एक निश्चित समयावधि के आधार पर शिक्षा के सार्वभौमिकरण पर आधारित 86वें संविधान संशोधन द्वारा शिक्षा का मौलिक अधिकार देश के लोगों को सौगात में मिला। शिक्षा का अधिकार कानून के तहत शिक्षा का अधिकार आज देश में 6 से 14 साल के बच्चों के लिए एक मौलिक अधिकार है, जिसमें कई ऐसे प्रावधान शामिल है जो यह सुनिश्चित करता है कि अगर कानून को उचित और प्रभावी तरीके से लागू किया गया है तो तस्वीर बिल्कुल बदल जाएगी। लेकिन शिक्षा का मतलब केवल बच्चों को स्कूल तक पहुँच बनाकर निःशुल्क शिक्षा देना नहीं है। शिक्षा एक व्यापक शब्द है। हमें कहने की आवश्यकता नहीं है। आज हमारा जो समाज है, वह परिलक्षित करता है कि भारत और भारत का समाज कितना शिक्षित है। हमारे आस-पास सामाजिक प्रदूषण के जो मामले सामने आ रहे हैं वे हमारी शिक्षा पद्धति पर बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह है।

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का कहना था कि ’’वास्तविक शिक्षा वह है जिससे व्यक्ति के चरित्र का निर्माण हो’’। वास्तव में हमारे देश में शिक्षा का उद्देश्य यही होना चाहिए। लेकिन इस दृष्टिकोण से अगर देखा जाए तो हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था में चरित्र निर्माण का कहीं कोई स्थान नहीं है। वहीं दूसरी ओर हम एक ऐसी शिक्षा पद्धति को अपनाए हुए हैं जो लोगों को इंसान और विद्धान के बजाए बेरोजगारों की फौज तैयार कर रही है। एक सर्वे के अनुसार हमारे देश के लगभग 85 से 90 प्रतिशत नौजवान नौकरी के योग्य नहीं है। हम उन्हें ऐसी शिक्षा पद्धति प्रदान कर रहे हैं जो उन्हें बारहवी, स्नातक एवं स्नातकोत्तीर डिग्री तो दे रही है किन्तु न तो कोई कौशल के विकास में सहायक है और न ही तो उन्हें जीवन का उदे्श्य समझ आ रहा है। ऐसे स्नातक डिग्री धारियों से स्नातक में पढ़े गए विषयों या उसकी मूलभूत बातें या सिद्धांत पूछा जाए तो अधिकतर छात्रों को यह याद नहीं रहता। इन छात्रों से उनके जीवन का उद्देश्य पूछें तो बस यही जवाब मिलेगा कि उन्हें खूब पैसा कमाना है, किन्तु कैसे तो उन्हें इसकी जानकारी नहीं। उनका एक रटा-रटाया जवाब यह भी है कि उन्हें देश की सेवा करनी है पर कैसे यह उन्हें पता नहीं?

हमारी शिक्षा प्रणाली की एक बड़ी खामी अवार्ड और रिवार्ड सिस्टम भी है जिसके फलस्वरूप छात्र पाठ्य पुस्तकों में समाहित ज्ञान या सामाजिक गतिविधियों में भाग लेकर भी उस ज्ञान को आत्मसात् नहीं कर पाते या उसकी उपयोगिता को अपने निजी जीवन में उतार नहीं पाते। अवार्ड या रिवार्ड की लालच या होड़ में छात्र और स्कूल-कॉलेज इन्हें प्राप्त करने के उपरांत अर्जित ज्ञान को भुला देते हैं और उसे आत्मसात नही कर पाते। स्कूल एवं कॉलेज ट्राफियों की होड़ में छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं और शिक्षा के मौलिक सिद्धांत से छात्रों को महरूम कर रहे हैं। ऐसे छात्र डिग्री प्राप्त कर कौशलविहिन या मध्यम दर्जे के मानव संसाधन बनते हैं या बेरोजगारों की फौज में शामिल हो जाते हैं।

आज हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसे नौजवान तैयार कर रही है जिन्हें जीवन का उद्देश्य ही नहीं पता और इनकी तादाद अच्छी खासी है। दूसरी ओर महानगरों में शिक्षा के अच्छे संस्थानों से जो छात्र निकल रहे हैं उनमें से अधिकांश का ठिकाना भारत नहीं बल्कि मोटी तनख्वाह के लालच में सात समुंदर पार जाना है। तो प्रश्न यह है कि जो हमारे देश का ब्रेन है वो ड्रेन हो रहा है और ज्यादातर जो नौजवान नौकरी के योग्य नहीं हैं उनकी फौज हमारे सामने खड़ी है। यही हमारी शिक्षा प्रणाली की विडंबना है और हमें सोचना है कि हमारे देश का भार किन कंधों पर है। जाहिर है शिक्षा और शिक्षा पद्धति के इस संकट से उबरने के लिए मौलिक बदलाव लाने की आवश्यकता है।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज (सांध्य) में सहायक प्राध्यापक (तदर्थ) के पद पर कार्यरत हैं।)

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1 Comment on "भारत में दिशाविहीन शिक्षा प्रणाली: बुनियादी बदलाव की दरकार"

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कुमार विमल
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बिलकुल सही , इंजीनियरिंग एजुकेशन की हालत तो और बदतर है।

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