लेखक परिचय

अरविंद जयतिलक

अरविंद जयतिलक

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं।

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synthetic milkअरविंद जयतिलक

हर्ष और उल्लास का पर्व दीवाली के आगमन के साथ ही बाजारों में चहल-पहल बढ़ गयी है। गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां, नए परिधान, रोशनी के उपकरण, पटाखे और खाद्य सामग्रियों से दुकानें पट गयी हैं। शहरों के माॅल से लेकर कस्बे और गांवों की दुकानों पर मिठाईयां युद्ध स्तर पर तैयार होने लगी हैं। लेकिन विडंबना यह है कि इन मिठाइयों का एक बड़ा हिस्सा मिलावटी दूध से तैयार हो रहा है जो सेहत के लिए बेहद खतरनाक है। ऐसा नहीं है कि केंद्र व राज्य सरकारें इससे अवगत नहीं हैं। पर दुर्भांगय कि इससे निपटने के ठोस प्रयास नहीं हो रहे हैं। याद होगा सरकारों की रीति-नीति से नाराज होकर ही गत वर्ष उच्चतम न्यायालय ने हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और दिल्ली की सरकारों को ताकीद किया कि वह मिलावटी दूध के काले कारोबारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर बताए कि इसे रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। पर विडंबना है कि अभी तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। जबकि यह तथ्य है कि बाजार में उपलब्ध दूध और उसके उत्पादों का एक बड़ा हिस्सा विभिन्न प्रकार के खतरनाक रसायनों से तैयार हो रहा है। स्वयं केंद्र सरकार स्वीकार कर चुकी है कि देश में 68 फीसद से अधिक दूध खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरणों के मानक के अनुरुप नहीं है। सिंथेटिक और मिलावटी दूध और उसके उत्पाद यूरिया, डिटरजेंट, रिफाइंड आयल, कास्टिक सोडा और सफेद पेंट इत्यादि से तैयार हो रहे हैं। खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने भी माना है कि दूध में घातक रसायन मिलाए जा रहे हैं। गौरतलब है कि पिछले दिनों खुले दुध और पैकेट वाले दूध में होने वाली मिलावट का पता लगाने के इरादे से सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से दूध के 1791 नमूने एकत्र किए गए। ये नमूने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों से लिए गए। सार्वजनिक क्षेत्र की पांच प्रयोगशालाओं में इन नमूनों के विश्लेशण से पता चला कि इनमें से 68.4 फीसद नमूने मिलावटी हैं और वे निर्धारित मानकों के अनुरुप नहीं हैं। इससे समझा जा सकता है कि किस तरह आमजन दूध और उसके उत्पादों के नाम पर जहर पीने और खाने को मजबूर हैं। यह तथ्य है कि एक अरसे से देश में मिलावटी दूध और उससे तैयार खाद्य सामग्रियों की चर्चा अखबारों की सुखियां बन रही हैं। स्वयंसेवी संस्थाओं से लेकर जागरुक नागरिक इस पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं। पर केंद्र व राज्य सरकारें इसे लेकर गंभीर नहीं हैं। अक्सर देखा जाता है कि जब काफी हो-हल्ला मचता है तो सरकारें मिलावटखोरों के खिलाफ दिखावटी अभियान चलाकर अपने कर्तव्यों का इतिश्री समझ लेती हैं। ऐसे में समझना कठिन नहीं कि दूध के काले कारोबारियों का हौसला पस्त क्यों नहीं हो रहा है। यह हैरान करने वाला है कि पिछले कई वर्षों से दूध की मांग लगातार बढ़ती जा रही है जबकि उस अनुपात में उत्पादन नहीं हो रहा है। ऐसे में सवाल लाजिमी है कि फिर दूध की आपूर्ति कैसे पूरी हो रही है? इसका सीधा मतलब यह है कि दूध और उसके उत्पादों के नाम पर जहर बेचा जा रहा है और आमजन का जीवन खतरे में पड़ता जा रहा है। मिलावटी दूध से न केवल लोगों का स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है बल्कि इससे उत्पन रोगों के इलाज में भी उन्हें अपनी गाढ़ी कमाई लुटानी पड़ रही है। एक आंकड़े के मुताबिक देश में मिलावटी खाद्य सामग्रियों के उपयोग से होने वाली बीमारियों से निपटने में प्रति वर्ष 80 हजार करोड़ रुपए खर्च होते हैं। ऐसा नहीं है कि देश में मिलावटखोरी रोकने के लिए सख्त कानून और सजा का प्रावधान नहीं है। लेकिन सच्चाई है कि उस पर ईमानदारी से अमल नहीं हो रहा है। खाद्य पदार्थों में मिलावटखोरी को रोकने और उनकी गुणवत्ता को स्तरीय बनाए रखने के लिए देश में खाद्य संरक्षा और मानक कानून 2006 लागू है। लेकिन मिलावटखोरों में इस कानून का कोई भय नहीं है। जबकि कानून के प्रावधानों के मुताबिक घटिया, मिलावटी, नकली माल की बिक्री और भ्रामक विज्ञापन के मामले में संबंधित प्राधिकारी जुर्माना कर सकता है। इस कानून के तहत अप्राकृतिक व खराब गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री पर 2 लाख रुपए, घटिया खाद्य पदार्थ की बिक्री पर 5 लाख रुपए, गलत ब्रांड खाद्य पदार्थ की बिक्री पर 3 लाख रुपए और भ्रामक विज्ञापन पर 10 लाख रुपए तक का जुर्माने का प्रावधान है। लेकिन सच्चाई है कि तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण गुनाहगारों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं हो रही है। दूध और उससे उत्पादित खाद्य सामग्रियों की जांच के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हो रही है। हर वर्ष त्यौहारों के दौरान स्वास्थ्य और खाद्य विभाग द्वारा खाद्य सामग्रियों के सैंपल लिए जाते हैं। लेकिन मिलावट के लिए जिम्मेदार कारोबारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं होती है। आज जरुरत इस बात की है कि मिलावटखोरी रोकने के कानून का सख्ती से पालन हो और अन्य देशों की तरह खाद्य संरक्षा के मानक तय करने के लिए निगरानी एजेंसियों का गठन हो। अमेरिका का खाद्य संरक्षा व्यवस्था दुनिया के बेहतरीन तंत्रों में शामिल है। इसे स्थानीय, राज्य एवं केंद्रीय स्तर पर लागू किया गया है। यहां का फुड एवं ड्रग एडमिनिस्त्रेशन फुड कोड प्रकाशित करता है। इसमें खाद्य संरक्षा के मानक तय किए गए हैं जिनका उलंघन गैर कानूनी है। इसी तरह आस्ट्रेलिया की आस्टेलियाई फूड एथारिटी उपभोक्ताओं तक शुद्ध खाद्य पदार्थ पहुंचाने के लिए खाद्य कारोबार पर खाद्य संरक्षा मानकों को प्रभावपूर्ण तरीके से लागू करने का काम करती है। जर्मनी में उपभोक्ता अधिकार और खाद्य संरक्षा विभाग इस मामले को देखता है। पूरे जर्मनी में भोज्य पदार्थ बेचने के लिए किसी तरह का प्रतिबंध नहीं है लेकिन वह कानून के मुताबिक तय मानकों के अनुरुप होना चाहिए। लेकिन भारत में स्थिति उलट है। मिलावटखोरों ने मुनाफे के लिए खाद्य संरक्षा और मानक कानून का मजाक बनाकर रख दिया है। देश में न केवल दूध का गोरखधंधा जोरों पर है बल्कि हर खाद्य सामग्रियों में मिलावट चलन में आ गया है। जिला फूड एंड ड्रग एडमिनिस्त्रेशन मिलावट पर अंकुश लगाने में नाकाम है। उचित होगा कि राज्य सरकारें इस त्यौहारी मौसम में दूध और उससे तैयार मिठाइयों की गुणवत्ता को जांचने में संजीदगी दिखाएं और इस खतरनाक कारोबार में लिप्त मुनाफाखोरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे।

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