लेखक परिचय

जीतेन्द्र कुमार नामदेव

जीतेन्द्र कुमार नामदेव

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सुबह सवेरे बच्चे डम्पू के साथ खेल रहे थे कि डम्पू अचानक दूसरे माले से नीचे जा गिरा। घटना में डम्पू की हालत बहुत गंभीर हो गयी। रामनाथ जी डम्पू की इस हालत को देखकर परेशान हो गये और तुरंत ही भागते दौड़ते डम्पू के उपचार के लिए गये। गांव में डम्पू का इलाज करने वाला एक ही अस्पताल था। रामनाथ जी ने दौड़ते-भागते रिसेप्शन पर बैठी महिला को सारी स्थिति के बारे में बताया। लेकिन रिसेप्शन पर बैठी महिला भी आखिर कर क्या सकती थी ? उसने भी कहा कि पहले कागजी कार्यवाही होगी फिर जाकर कुछ काम शुरू हो पाएंगा। पहले तो डम्पू का परिचय पत्र और उसकी पूरी जन्म कुण्डी चाहिए थी। अब रामनाथ जी की चिंता और भी बड़ गयी। उन्होंने जल्दवाजी में घर जाकर पहले तो डम्पू के सारे दस्तावेजों को खंगाल मारा। दस्तावेजों को लेकर जब वो डम्पू के अस्पताल पहुंचे तब जाकर डम्पू के इलाज की प्रक्रिया शुरू की गयी।
डम्पू दूसरे माले से गिरा था। इसलिए हालत कुछ ज्यादा ही खराब हो गयी। उसका इलाज करने वाले डाक्टरों ने कहा कि डम्पू के इलाज में एक सप्ताह से एक महिने तक का समय लग सकता है। रामनाथ जी की चिन्ताएं और भी बढ़ गयी। उन्होंने भी एक बार संकोच वस पूछ ही लिया कि डम्पू ठीक तो हो जाएंगा। क्या हम फिर से उससे पहले की तरह बातें कर पाएंगे ? डाक्टरों ने कहा कि हां कर तो पाएंगे लेकिन उसके लिए कुछ अंगों को खोल ना पड़ेगा।
डाक्टर की इस बात को सुनकर तो रामनाथ जी के पैरों से मानों जमीन ही निकल गयी। रामनाथ जी चैंक कर बोले कि क्या आप उसका आपरेशन करेंगे ? डाक्टर बोले कि इसमें कौन सी नई बात है। हम तो रोज कईयों का आपरेशन कर देते हैं। डाक्टरों के लिए यह नई बात नहीं थी लेकिन रामनाथ जी के लिए ये बेहद नई बात थी।
रामनाथ जी की परेशानी अब और भी बढ़ने लगी। अगले ही सप्ताह उनका बेटा शहर से घर आ रहा था। अब वो अपने बेटे को क्या मुंह दिखाते ? रामनाथ जी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था। बस अब तो एक ही रास्ता बचा था। वो था भगवान से दुआ करने का कि जल्द से जल्द डम्पू ठीक हो जाए और वो उसे वापस घर ले आयें। डरने जैसी कोई बात नहीं थी लेकिन रामनाथ जी के लिए यह बात डरने से भी ज्यादा थी। उनकी बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी। सबके लाख समझाने पर वो उसे डाक्टरों की देखरेख में छोड़ कर घर चले आये।
अब डम्पू के बिना रामनाथ जी का मन भी कहां लगने वाला था। वो अपने दिल की सारी बातें उसी से तो कहते थे। वह भी हमेशा उनके सीने से लगा रहता था। वो डम्पू की बहुत परवाह करते थे। जब देखों जब उसके लिए नई पोशक और नये-नये तरीके से उसका स्वांग रचाते रहते थे। लेकिन अब कुछ दिनों तक उन्हें हम्पू के बिना ही रहना था।
घर वापस आकर उनके दिल और दिमाग में बस एक ही बात चल रही थी कि आखिर ऐसा हुआ क्यों ? ना बच्चे उसके साथ खेलते ना ही वो छत से गिरता और ना ही उसके साथ ऐसा होता। रामनाथ जी इसमें पूरी अपनी गलती मान रहे थे। उन्हें लग रहा था कि वो कुछ ज्यादा ही वेफिक्र हो गये थे। तभी तो यह हादसा घटा। अभी छह साल ही तो हुए थे डमपू को आये हुए और उसके साथ ऐसा हो गया। इससे पहले कभी भी ऐसा नहीं हुआ था। पहले बेड, कुर्सी,  से तो गिर जाया करता था लेकिन इतनी ऊचाई से पहली बार गिरा था। डम्पू की हालत बाकई में इस बार गंभीर हो गयी थी।
(अब रामनाथ जी अपनी और डम्पू की कुछ पुरानी यादों में खो गये)
अभी कुछ वर्ष पहले की ही तो बात है। जब उनके बेटे भोलू ने अपनी इंजीनियरिंग की परीक्षा पास की थी। उसके बाद उसकी दूर शहर में नौकरी लग गयी। लेकिन अपने घर वालों से दूरी उसे बरदास्त नहीं होती थी। एक दिन भोलू ने अपने बाबूजी (रामनाथ जी) को एक मोबाईल फोन लाकर दिया। जिस देखकर राजनाथ जी बोले कि ये डब्बा ! ये डब्बा, किस काम में आयेगा ? तो उनके बेटे ने उन्हें बताया कि ये डब्बा नहीं है। बल्कि आधूनिक समय का मोबाइल फोन है। वो बोले में इसका क्या करूंगा ? तो बेटे ने कहा कि जब आप की इच्छा मुझसे बात करने की हो तो इससे बात कर लिया करो। रामनाथ जी बोले कि अरे ये डब्बा मेरे किसी काम का नहीं है। मुझे तो अपना हाल-चाल चिट्ठी में लिख कर भेज दिया करों।
लेकिन फिर उन्होंने बेटे के चेहरे को देखा और बोले चल तू जब इतने प्यार से लाया है तो मैं रख ही लेता हूं। उनके नजर में वो एक डब्बा था और बेटे के लिए एक मोबाइल। तो रामनाथ जी ने तुरन्त ही उसका नाम करण भी कर दिया। रामनाथ जी ने बेटे से कहा कि इसे अगर में डमपू कहूं तो कैसा रहें। बस यह सुनकर परिवार के सभी लोग हंस पड़े।
लेकिन आज सुबह जब वो मोबाइल को चार्जिंग पर लगाकर, नहाने चले गये तो उनका चार वर्ष का नाती टिन्कू उससे खेलने लगा। खेलते-खेलते डम्पू उसके हाथ से छुटक कर दो मंजिले से सड़क पर जा गिरा। रामनाथ के बेटे ने उसे नोकिया मोबाइल, लाकर दिया था। बेटे के बेटे ने उसकी बुरी हालत कर दी। छत से गिरने के बाद मोबाइल बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुका था जिसे ठीक कराने के लिए सर्विस सेंटर पर डाल कर आये थे। इंसान  की तरह अब तो मोबाइलों की जनसंख्या भी बहुत तेजी से बढ़ रही है। अब शहर में मोबाइल सुधारने वाला सर्विस सेंटर भी तो एक ही है। वो भी क्या करें ? आखिर हर मोबाइल की कागजी कारवाई पूरी करने के बाद उसे कम्पनी के मैन सर्विस सेंटर तक पहुंचाया जाता है। तब जाकर ठीक होकर वो वापस मिलता है। रामनाथ जी तो अपने बेटे की भेंट को अपने सीने से लगाकर रखते थे। लेकिन आजकल उनके जैसा और कोई है क्या ?

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