लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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डॉ. दीपक आचार्य 

दुनिया में कई प्राणी ऐसे होते हैं जिन्हें समझ पाना आम आदमी के बूते में नहीं होता। इनके बारे में यह भी पता नहीं चल पाता कि वे किस तरफ मुड़ने वाले हैं, किस करवट बैठने और सोने वाले हैं तथा क्या करने वाले हैं। इनमें से कई प्राणियों का स्वभाव ही अनिश्चय से भरा होता है और कइयों की फितरत ही ऐसी होती है कि इनके बारे में पता नहीं चल पाता।

संसार में विद्यमान भांति-भांति के इन प्राणियों के बीच आदमियों की भी एक किस्म है जिन्हें समझ पाना टेढ़ी ही नहीं बल्कि फटी हुई खीर होता है।

कई लोग समझदार होते हैं, कई आधे समझदार और बहुत सारे नासमझ। इन नासमझों के प्रति कई लोग मोह या भ्रम से, कई खून के रिश्ते निभाने और कई लोग अपने स्वार्थों की वजह से दया, करुणा और सहानुभूति रखते हुए इन्हें समझने और समझाने के लिए हरसंभव कोशिश करने लगते हैं।

हम हमारा अधिकतर समय इन नासमझों को समझने की विफल कोशिशों में ही जाया करते रहते हैं जबकि इतना ही समय हम यदि समझदारों के साथ बिताये होते तो हमें अहसास हो जाता है कि जिन्दगी कितनी कीमती है। लेकिन अधिकांश लोग ऐसा नहीं कर पाते हैं और मूर्खाें, नासमझों या आधे-अधूरों पर ज्यादातर समय खपा देते हैं।

नासमझों का कुटुम्ब बहुत लम्बा होता है। ये हर कहीं पाए जा सकते हैं। ये नासमझ हमारे आस-पास से लेकर अपने गांव-शहर में भी खूब तादाद में पाए जाते हैं। हमारे करीबी समझे जाने वालों में भी काफी संख्या में ऐसे लोग हैं जिन्हें समझदार मानने की भूल आम लोग करते रहे हैं और फिर बाद में पछताने के सिवा कोई चारा नहीं बचता। कई तो ऐेसं हैं जिन्हें जमाने की नज़र में महानतम लोकप्रिय और प्रतिष्ठित माना जाता है लेकिन समझदारी के मामले में उल्लूओं से भी गए बीते हुआ करते हैं।

इन नासमझो में कई कच्ची मिट्टी के बने होते हैं तो कई चिकने घड़े। इस किस्म के लोगों पर की जाने वाली सारी मेहनत बेकार चली जाती है और अन्ततोगत्वा पछतावा हमें ही होता है और हम उन क्षणों को कोसने लगते हैं जब इनके प्रति हमारी सहानुभूति या प्रेम प्रकट होता है। नासमझ के साथ किसी भी प्रकार का सम्पर्क जीवन में कभी भी गंभीर हालात या खतरा पैदा कर सकता है।

ये नासमझ लोग जिस किसी की जिन्दगी में होते हैं या जिनका ऐसे लोगों से सम्पर्क होता है उनके लिए ये नासमझ लोग स्पीड़ ब्रेकर और स्पाईन ब्रेकर के रूप में होते हैं।

जीवन में कर्मयोग को सही और उपयुक्त दिशा देना चाहें तो नासमझ लोगों के बारे में अपनी सारी जिज्ञासाओं को समाप्त कर दें और उन्हें किसी यंत्र से ज्यादा समझने की कोशिश भी न करें।

समस्याएं तब ही पैदा होने लगती हैं जब हम नासमझ लोगों को समझने की कोशिशें करने लगते हैं। नासमझ लोगों की पूरी जिन्दगी प्याज के महीन छिलकों की तरह होती है इसलिए इन नासमझ लोगों को समझने की बजाय जमाने और अच्छे लोगों को समझने में अपनी ऊर्जा लगाएं ताकि जीवन के हर क्षण का बेहतर उपयोग हो सके और जीवनयात्रा के अन्त तक भी ऐसा नहीं लगे कि पूरा जीवन बेकार चला गया इन नासमझों के पीछे।

नासमझ लोगों की सबसे बड़ी पहचान यही होती है कि ये समझदारों को कभी नहीं समझ पाते हैं और इसलिए ऐसी-ऐसी हरकतें करते रहते हैं जो सामान्य आदमी कभी नहीं कर पाता।

नासमझ लोगों की असामान्य और अप्राकृतिक हरकतों का ही असर है कि समझदारों के बीच इनकी खरपतवार ने हमेशा क्षेत्र और समाज के पल्लवन की राह में प्रदूषण फैलाया है।

हर नासमझ आदमी अपने आपको संप्रभु और सर्वशक्तिमान मानता है और उसका यही अहंकार सामाजिक ताने-बाने में दीमक का काम करता रहता है। हर क्षेत्र में ऐसे कई नासमझ लोग रहते ही हैं जिनकी वजह से पूरा इलाका बदनामी झेलता है और समाज की तरक्की पर मौके बेमौके ब्रेक लग जाते हैं।

समझदारों को ध्येय बना लेना चाहिए कि जो हमें न समझ पाए, उसे समझने में समय न गँवा

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