लेखक परिचय

ललित गर्ग

ललित गर्ग

स्वतंत्र वेब लेखक

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old ageललित गर्ग-

उम्र के हर लम्हें को जीभर कर जीना चाहिए और उनमें सपनों के रंगों की तरह रंग भरने चाहिए, हर पीढ़ी सपने देखती हंै और उन सपनों में जिन्दगी के रंग भरती है। ढलती उम्र के साथ विश्वास भी ढलने लगता है, लेकिन कुछ जीनियस होते हैं जो ढलती उम्र को अवरोध नहीं बनने देते। वे अक्सर एक कदम आगे की एवं नयेपन की सोचते हैं। इसी नए के प्रति उनके आग्रह में छिपा होता है विकास का रहस्य। कल्पनाओं की छलांग या दिवास्वप्न के बिना हम संभावनाओं के बंद बैग को कैसे खंगाल सकते हैं? सपने देखना एक खुशगवार तरीके से भविष्य की दिशा तय करना ही तो है। किसी भी उम्र के मन में सपनों की विविधता या विस्तार उसके महान या सफल होने का दिशा-सूचक है।
स्वप्न हर उम्र का व्यक्ति संजोता है, जो बहुत आवश्यक है। खुली आंखों के सपने जो हमें अपने लक्ष्य का गूढ़ नक्शा देते हैं। अक्सर लोग स्वप्नशील लोगों पर हंसते हैं, लेकिन स्वप्नशील लोग ही सफल होते हैं। इसलिये सपनों की महत्ता पर यकीन करना ही चाहिए। शेख सादी ने बहुत मार्मिक कहा है कि जो व्यक्ति विवेक के नियम को तो सीख लेता है पर उन्हें अपने जीवन में नहीं उतारता वह ठीक उस किसान की तरह है, जिसने अपने खेत में मेहनत तो की है पर बीज बोए ही नहीं।’ इसलिये जीवन को संवारने एवं उपयोगी बनाने के लिये हर लम्हें को जीना जरूरी है।
यह सच है कि हर दिन के साथ जीवन का एक नया लिफाफा खुलता है, नए अस्तित्व के साथ, नए अर्थ के साथ, नई शुरूआत के साथ। हर आंख देखती है इस संसार को अपनी ताजगी भरी नजरों से। गायक बनने की इच्छा रखने वाला करोड़ों दर्शकों के सामने गीत गाने का ख्वाब बुनता रहता है। दुनिया जीत लेने की चाहत हर इंसान की होती है। यह तो है सकारात्मक मन की उड़ान, सपनों का संसार। एक चित्रकार रंगों से, लेखक शब्दों से, संगीतकार धुनों से और अभिनेता भावों से अपने संसार को रचता है, उसमें रंग भरता है। उन्नत विचारों का जो बीज बो दें तो वही उग आता है।
कुछ लोग ‘विजनरी’ होते हैं, वे जानते हैं स्वप्नों का महत्व। डा. ए.पी.जे. अब्दूल कलाम के कहे अनुसार- ‘सपने वे नहीं जो नींद में लिये जाये, बल्कि सपने वे होते हैं जो सोने नहीं देते।’ अर्नाल्ड टायनबी ने अपनी पुस्तक ‘सरवाइविंग द फ्यूचर’ में सलाह देते हुए लिखा है ‘मरते दम तक जवानी के जोश को कायम रखना।’ होता यही है कि उम्र के हर मोड़ पर हम जो मूल्य बनाते हैं, दिमाग में अच्छे विचारों के बीज बोनेे की क्षमता को विकसित रखते हैं, उसी से जीवन सफल और सार्थक होता है। आज इस सोच का सर्वथा अभाव है। इसीलिये उम्रदराज लोग निष्क्रिय हो जाते हैं, जीवन से पलायन की सोच उनमें घर कर जाती है। आखिर क्यों बढ़ती उम्र को हथियार बनाकर निष्क्रियता एवं अकर्मण्यता को जीने की होड पनप रही है? क्यों इस उम्र में आराम करने की उम्र के रूप में जीने की मानसिकता पनप रही है?
स्वामी विवेकानन्द, सुभाषचन्द्र बोस, गांधी, नेहरू, शास्त्री, आचार्य तुलसी – भारत के पास सदैव ऐसी ही पीढ़ी की प्रेरणाएं रही हंै, जो उम्र के बढ़ने के साथ-साथ ज्यादा सक्रिय, ज्यादा रचनात्मक, ज्यादा संवेदनशील एवं ज्यादा ऊर्जावान होकर देश एवं समाज के उत्थान में भागीदार रही। जिनका यथार्थ अलग-अलग था। जिनके सपने अलग थे। जिनके कर्म विविध थे। और जिनकेे संकट भी विविध थे। एक बात सबमें काॅमन थी-उनमें हिम्मत थी, निराशा नहीं थी। ऊंचे सपने और ऊंची कामनाएं थीं। उन्हें पाने की जिद थी। जबर्दस्ती थी। उनके लिए कुछ भी कर गुजरने का माद्दा था। वे भविष्यवादी थे। दरअसल हमारी वह पीढ़ी महज स्वप्नजीवी पीढ़ी नहीं थी, वह रोज यथार्थ से जूझती थी, उसके सामने जीवन से जुड़ी तमाम विषमताओं और अवरोधों की ढेरों समस्याएं भी थी। उनके पास कोरे स्वप्न ही नहीं, बल्कि आंखों में किरकिराता सच भी था। उनमें अपने समय की विदू्रपताओं को चुनौती देकर नया भविष्य गढ़ने का संकल्प-स्वप्न भी था। आज उन आंखों से सपने क्यों गायब हो रहे हैं?
आज जब हम एक नये भारत का निर्माण करने में जुटें हैं, तब युवाओं के साथ-साथ ढ़लती पीढ़ी की भी ऊर्जावान सक्रियता अपेक्षित है। मशहूर ग्रीक फिलाॅस्फर हेरोडोट्स का कहना है, प्रतिकूलता हमारी मजबूतियों को सामने लाती है। जब आप अपनी सबसे बड़ी चुनौती के सामने सकारात्मक होते हैं और संरचनात्मक तरीके से रेस्पाॅन्स देते हैं, तो एक खास किस्म की दृढ़ता, मजबूती, साहस, चरित्र, जो आप में ही निहित होता है। भले ही आपको उसका अहसास नहीं हो, वह आपको निखारने लगता है।
हम चलते हैं, गिरते हैं, उठते हैं। जिंदगी आगे बढ़ती है और जिंदगी के कैनवास की रेखाएं अलग-अलग आकार लेने लगती है। बस एक फर्क होता है- कुछ लोग जिंदगी में आई मुश्किलों से टूट जाते हैं, उनसे हार जाते हैं और कुछ इसे चुनौती मानते हुए दिक्कतों की आंखों में आखें डालते हैं, मुस्कराते हैं तथा मैदान में और मजबूती से डट जाते हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी दृढ़ इच्छाशक्ति के जरिए वह जीतते हैं, उदाहरण बनते हैं, हम सभी के लिए। आज ऐसे ही लोगों की जरूरत है। हमारे ही इर्द-गिर्द न जाने कितने ही ऐसे लोग होंगे, जिन पर अपने मुसीबतों का पहाड़ टूटते देखा होगा, मदद के दरवाजे बंद होते देखे होंगे, लेकिन क्या मजाल उनके जीवट में कोई खरोंच पड़ जाए। दरअसल भारत को ऐसे ही लोगों ने गढ़ा है, ऐसे ही लोग जिंदगी को ज्यादा मायनेदार बना सकते हैं।
यह भी बिल्कुल सच है कि वक्त के साथ न बदलने वाले, कहीं पीछे छूट जाते हैं। सौभाग्य न केवल वीरों का साथ देता है, बल्कि उनका भी साथ देता है जो किसी भी नए बदलाव के लिए तैयार होते हैं। हम मनचाहे स्थान पर पहुंचने के लिए जो कीमत अदा करते हैं, हमारा जीवन उसी के अनुसार बनता है। वे व्यक्ति अथवा वृक्ष ही जीवित रह पाते हैं, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी स्वयं को ढालने की क्षमता रखते हैं। बेहतरी के लिए बदलाव चाहते हैं, तो आपको वर्तमान से असंतुष्ट होना ही होगा। जीवन में बदलाव का एक ही तरीका है आप लगातार इसे नया रूप देते रहें। कुछ भी हमेशा एक-सा नहीं रहता, जिस तरह दो व्यक्ति एक ही चीज को एक तरह से नहीं परखते। यहां तक कि विविध परिस्थितियों में एक ही व्यक्ति की राय भी बदल जाती है। हमें न केवल समय के साथ बदलना पड़ता है, बल्कि नए अविष्कार भी करने होते हैं। जब हालात बिगड़ जाएं, तो उन्हें जुगत से संवारना पड़ता है। हम जो भी कर रहे हों या हमें करना पड़े, उसी में प्रसन्नता की तलाश ही एक अच्छी पहल है। हमें अप्रसन्न नहीं रहना चाहिए, क्योंकि हालात बदलते रहते हैं। रोने, पछताने या सिर धुनने से दुख, मायूसी व निराशा के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता। आपकी प्रत्येक गतिविधि का लक्ष्य नया निर्माण ही होना चाहिए। यह कोई ऐसी चीज नहीं जिसे आप दुनिया या दूसरे लोगों से मांग सकें, बल्कि आपको इसे पाने क लिए मेहनत करनी होगी। यह अपने साथ बहुत जिम्मेदारियां लेकर आती है उन उत्तरदायित्वों के निर्वाह और एहसास को समाज का कोई मापदंड या कोई करीबी भी आपके लिए नहीं गढ़ सकता। उन सिद्धांतों को गढ़ने के लिए अपने भीतर झांकने की जरूरत होती है। ‘फ्राॅम सेल्फ टू ग्रेटर सेल्फ’ खुद से खुद की यात्रा अक्सर सृजनात्मक कार्य करने वालों के जिम्मे ही आती है। जो न जाने कितनी अनकही अनदेखी बातों, भावों को हमारे सामने ले आते हैं। जो हो गया, उसे हम स्वीकार नहीं कर पाते। और जो नहीं मिला, उसे छोड़ नहीं पाते। अधूरी ख्वाहिशों के दुख हमें उस सुख से भी दूर कर देता है, जो हमारा हो सकता था। शारीरिक परेशानियों से हार नहीं मानने वाली हेलन केलर ने कहा है, ‘खुशी का एक दरवाजा बंद होता है तो दूसरा खुल जाता है। हम बंद दरवाजे को ही देखते रह जाते हैं। उसे नहीं देख पाते, जिसे हमारे लिए खोला गया था।’ हमें हेलन केलर की भांति ढ़लती उम्र को भी रचनात्मक एवं सृजनात्मक बनाना चाहिए।

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1 Comment on "ढ़लती उम्र को पलायनवादी न बनने दे"

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आर. सिंह
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.क्या आलेख वे बूढ़े और जवान पढ़ेंगे,जो एक उम्र के बाद वाले सक्रीय लोगों को हर समय कहते रहते हैं कि अपनी उम्र का तो ख्याल कीजिये?

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