लेखक परिचय

विनोद बंसल

विनोद बंसल

लेखक इंद्रप्रस्‍थ विश्‍व हिंदू परिषद् के प्रांत मीडिया प्रमुख हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतर्जाल पर समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन।

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 विनोद बंसल

भारत के मुकुट जम्मू-कश्मीर के श्री नगर शहर से 125 किमी दूर हिमालय की बर्फ़ीली चोटियों के बीच 13,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित भगवान शिव का अदभुत ज्योतिर्लिंग बाबा अमरनाथ के नाम से विश्व भर में प्रसिद्ध है। यह सिर्फ़ करोडों हिन्दुओं की आस्था का केन्द्र ही नहीं बल्कि पूरे भारत वर्ष को एक सूत्र में पिरो कर रखने का एक प्रमुख आधार स्तंभ भी है। भारत तो क्या विश्व का शायद ही कोई कोना ऐसा होगा जहां से श्रद्धालु बाबा के दर्शन करने न आते हों। इस यात्रा से जहां बाबा के भक्त अपनी मन मांगी मुराद पूरी कर ले जाते हैं वहीं कश्मीर क्षेत्र में रहने वाली जनता (अधिकांश कश्मीरी मुसलमान) इससे वर्ष भर की अपनी रोजी रोटी का जुगाड कर लेते हैं। इतना ही नहीं वहां की अर्थव्यवस्था का आधार पर्यटन है जिसको बढावा देने हेतु सरकार करोडों रुपये खर्च करती है किन्तु इस दो महीने की यात्रा से उसे बैठे बिठाये लाखों पर्यटक मिल जाते हैं जिससे करोडों की आय राज्य कोष में जमा होती है। अत्यंत दुर्गम रास्ता, खराब मौसम और आतंकवादियों की धमकियों व हमलों के चलते यात्रा में अनेक बार व्यवधान पडता रहता है। अलगाववादियों के इशारों पर चलने वाले राजनेता तथा कुछ विघटनकारी तत्व इस पवित्र यात्रा को समाप्त करने के तरह-तरह के षडयंत्र रचते रहते हैं। कभी खराब मौसम का बहाना, कभी आतंकवादियों की धमकी, कभी व्यवस्था का प्रश्न तो कभी आस्था पर हमला। बस यूं ही चलता रहता है इसे सीमित दायरे में बांधने या इसे समाप्त करने का कुत्सित प्रयास्। गत अनेक वर्षों से इस यात्रा को ज्येष्ठ पूर्णिमा से प्रारंभ कर श्रावण पूर्णिमा (रक्षा बन्धन) के दिन को पूर्ण किया जाता रहा है। हर साल बाबा का प्रसाद पाने के लालसी निरन्तर बढते ही जा रहे हैं। इसी कारण गत वर्ष का यह आंकडा 8,00,000 को पार कर गया। यात्रा का समय चाहे पूरा हो गया हो किन्तु भक्तों की चाहत बढती ही चली गई। बाबा के भक्तों का यह आंकडा इस बार भी किसी कीर्तिमान से कम नहीं दिख रहा है इस सबके बावजूद इस वर्ष की यात्रा की अवधि को मनमाने तरीके से घटाकर 39 दिन कर दिया गया है जिसे किसी भी तरह से तर्क संगत नहीं कहा जा सकता है।

इस विषय के संदर्भ में विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) द्वारा बुलाई गई प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए विहिप के केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि गत शताब्दी के अन्त में इस यात्रा के दौरान हुए एक हादसे के बाद एक आयोग का गठन किया गया था जिसने अपनी रिपोर्ट में कहा कि वर्तमान व्यवस्था के हिसाब से वहां एक दिन में 10 हजार से अधिक यात्रियों को दर्शन नहीं कराये जाने चाहिए साथ ही यात्रियों की सुविधा हेतु समुचित प्रबन्ध भी आवश्यक हैं। इस हिसाब से भी यदि यह यात्रा 39 दिन तक चलती है तो अधिकाधिक 4 लाख भक्त ही दर्शन कर पायेंगे। इससे न सिर्फ़ 5 लाख से अधिक भक्त बाबा के दर्शन से बंचित रह जाएंगे बल्कि राज्य सरकार व वहां की जनता की रोजी रोटी पर भी लात लगेगी। इस वार्ता को संबोधित करते हुए विहिप के अन्तर्राष्ट्रीय महामंत्री डा  प्रवीण भाई तोगडिया ने बडे ही तीखे अन्दाज में कहा कि जब जम्मू कश्मीर के  मुख्य मंत्री यात्रा को पूरे दो महीने रखने को राजी होकर सुरक्षा देने पर सहमत हैं तो राज्यपाल श्री एन एन वोहरा के क्या बाप की यात्रा है जो इसे डेढ माह तक सीमित कर रहे हैं। राज्यपाल के पिछले हिन्दू विरोधी रवैये पर भी उन्होंने कहा कि बाबा अमरनाथ की जमीन भी इसी व्यक्ति ने हमसे छीनी थी जिसे हिन्दुओं द्वारा दो माह तक संघर्ष कर उसकी छाती पर पांव रख कर वापस लिया गया। हमने ऐलान कर दिया है कि यह यात्रा पूर्व की तरह ज्येष्ठ  पूर्णिमा(04/06/2011) से ही प्रारंभ होगी जिसे रोकने का यदि किसी ने प्रयास किया तो हम देश भर में लोकतांत्रिक तरीके से व्यापक आंदोलन चलायेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि व्यापक जन भावनाओं से जुडा यह आन्दोलन यदि हिंसक हुआ तो इसकी सारी जिम्मेदारी राज्यपाल वोहरा और केन्द्र सरकार की होगी। अन्त में यही कहा जा सकता है कि देश की एकता, अखण्डता, धार्मिक आस्था, और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए इस यात्रा को प्रोत्साहित करने में ही सबकी भलाई है। वैसे भी, जहां एक ओर हमारी केन्द्र व राज्य सरकारें हर राज्य में जगह जगह हज यात्रा हेतु हज हाउस बना कर करोडों रुपए की हज सब्सिडी दे रही हैं तो क्या हिन्दुओं को अपने ही देश में स्वयं के ही पैसे से बिना किसी सरकारी सहायता के अपने आराध्य के दर्शनों की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए ? दूसरी बात यह भी है कि क्या ईद व क्रिसमस जैसे त्योहारों की तिथि कोई राज्यपाल तय करता है जो जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल हमारी इस पवित्र यात्रा की तिथि तय कर रहे हैं। हां! श्राइन बोर्ड के अध्यक्ष के नाते यात्रा के सुचारू रूप से चलने हेतु जो प्रवन्ध आवश्यक है, वे उन्हें करने चाहिए। किन्तु यात्रा की अवधि तो संत समाज व हिन्दू संस्थाऐं ही तय कर  सकती हैं।

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