लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

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विश्व वन्यजीव सप्ताह ( 2-8 अक्तूबर ) पर विशेष
विश्व वन्य जीव संगठन के ताजा आंकङे कह रहे हैं कि हमने पिछले 40 सालों में प्रकृति के 52 फीसदी दोस्त खो दिए हैं। बीती एक सदी के भीतर बाघों की संख्या एक लाख से घटकर तीन हजार हो गई है। स्थलचरों की संख्या में 39 फीसदी और मीठे पानी पर रहने वाले पशु व पक्षी भी 76 फीसदी तक घटे हैं। उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में कई प्रजातियों की संख्या 60 फीसदी तक घट गई है। यह आंकङों की दुनिया है। हकीकत इससे भी बुरी हो सकती है। इंसान यह सोचकर बच नहीं सकता कि वन्य जीव घट रहे हैं तो इससे उसकी तरक्की का कोई लेना-देना नहीं है। हकीकत यही है कि प्रकृति की कोई रचना निष्प्रयोजन नहीं है। हर रचना के नष्ट होने का मतलब है कि कुदरत की गाङी से एक पेच या पार्ट हटा देना; और वन्य जीवों से शुरु संकट अब आगे बढकर पूरी जैव विविधता पर छा गया है।
जैव विविधता के मामले में दुनिया की सबसे समृद्ध गंगा घाटी का हाल किसी से छिपा नहीं है। भागलपुर का गंगा क्षेत्र, डाॅलफिन रिजर्व एरिया के तौर पर दर्ज है; फिर भी डाॅलफिन के अस्तित्व पर ही खतरे की खबरें खूब हैं। समुद्री खारे पानी पर पलने वाली जैवविविधता में गिरावट लगातार जारी है। मूंगा भित्तियों पृथ्वी पर पर्यावरणीय संतुलन की सबसे प्राचीन कहे जाने वाली प्रणाली है। मूगा भित्तियां कार्बन अवशोषित करने का प्रकृति प्रदत अत्यंत कारगर माध्यम हैं। हमारी पृथ्वी पर जीवन का संचार सबसे पहले मूंगा भित्तियों में ही हुआ। इन्हे जीवन की नर्सरी कहा जाता है। खतरा अब, जीवन की इस नर्सरी पर भी है। हम मूंगा भित्तियों का कई लाख वर्ग हेक्टयर क्षेत्र खो चुके हैं।  दुनिया का सबसे बङा जीवंत ढांचा कहे जाने वाले ग्रेट बैरियर रीफ का अस्तित्व खतरे में है। जब जीवन की नर्सरी ही खतरे में हो, तो जीवन बचेगा.. यह गांरटी मुश्किल है। यह खतरा भूलने के लिए नहीं है। कारण याद रखना जरूरी है।
कारण हैं बढता तापमान, बढता पर्यावरणीय असंतुलन, बढता कार्बन, कचरा, बढता जहर और बढता उपभोग। अध्ययन बताते हैं कि आज हमने वातावरण मंे कार्बन उत्सर्जन की मात्रा इतनी बढा ली है, जितनी कि पिछले 10 लाख सालों में कभी नहीं बढी। हम इतना उपभोग करने लग गये हैं, जितना कि हमारे पूर्वजों ने कभी नहीं किया। दुनिया यदि अमेरिकी लोगों जैसी जीवन शैली जीने लग जाये, तो 3.9 तथा कतर देशवासियों जैसा उपभोग करे, तो करीब 4.8 अतिरिक्त पृथ्वी के बगैर हमारा गुजारा होने वाला नहीं है। यह काल्पनिक बात नहीं कि धरती, पानी, हवा, जंगल, बारिश, खनिज, मांस, मवेशी… कुदरत की सारी नियामतें अब इंसानों को कम पङने लगी हैं। इंसानों ने भी तय कर लिया है कि कुदरत की सारी नियामतें सिर्फ और सिर्फ इंसानों के लिए है। वह भी सबसे पहले मेरे लिए। इसीलिए ये सारी लूट है; विवाद हैं; रसहीन होते रिश्ते हैं।
संकट असल में रिश्तों का ही है। औरों को क्या कहूं, पहले मैं दिल्ली के जिस मकान में रहता था, वह मकान छोटा था, लेकिन उसका दिल बहुत बङा था। क्योंकि वह मकान नहीं, घर था। उसमें चींटी, चिङिया से लेकर सांप और केचुंए तक सभी के रहने की जगह थी। अब मकान थोङा बङा हो गया है। मंजिलें बढी हैं; लेकिन साथ-साथ रोशनदानों पर बंदिशें भी। मेरी बेटी गौरया का घोसला देखने को तरस गई है। कबूतर की बीट से नीचे वालों को भी घिन आने लगी है। चूहे, तिलचट्टे, मच्छर और दीमक जरूर कभी-कभी अनाधिकार घुसपैठ कर बैठते हैं। उनका खात्मा करने का आइडिया ’हिट’ हो गया है। हमने ऐसे तमाम हालात पैदा करने शुरु कर दिए हैं कि यह दुनिया.. दुनिया के दोस्तों के लिए ही नो एंट्री जोन में तब्दील हो जाये। ऐसे में जैव विविधता बचे, तो बचे कैसे ? गौरतलब है कि अब इंसानों की गिनती, दुनिया की दूसरी कृतियों के दुश्मनों में होने लगी है। खल्क खुदा का ! जीवन इंसानी शिकंजे में !!
यह तो दुनिया शहर की। देहात के दरवाजे इतने नहीं, पर कुछ संकीर्ण तो जरूर ही हुए हैं। शौच की ताजा सुविधा ने गांवों मे झाङ व जंगलों में निपटने की रही-सही जरूरत को ही निपटाना शुरु कर दिया है। नतीजा यह है कि जंगल के घोषित सफाई कर्मचारी सियार अपनी डयूटी निपटाने की बजाय खुद ही निपट रहे हैं। भेङ-बकरियों के चारागाह हम चर गये हैं। नेवला, साही, गोहटा के झुरमुट झाङू लगाकर साफ कर दिए हैं। हंसों को हमने कौवा बना दिया है। नीलगायों के ठिकानों को ठिकाने लगा दिया है। उधर बैसाख-जेठ में तालाबों के चटकते धब्बे और छोटी स्थानीय नदियों की सूखी लकीरें इन्हे डराने लगी हैं और उधर इंसान की हांक व खेतों में खङे इंसानी पुतले। हमने ही उनसे उनके ठिकाने छीने। अब हम ही उन पर पत्थर फंेकते हैं, कहीं-कहीं तो गोलियां भी। वन्य जीव संरक्षण कानून आङे न आये, तो हम उन्हे दिन-दहाङे ही खा जायें। बाघों का भोजन हम ही चबा जायें। आखिर वे हमारे खेतों में न आयें, तो जायें, तो जायंे कहां ?
हो सकता है कि जब कभी हम वन्य जीव सप्ताह के इस मौके पर हम सप्ताह-सप्ताह खेल रहे हों; जब हमारेे मीडिया दोस्त स्पेशल स्टोरी दिखा रहे हों….. मेरे गांव के सियार प्यास से बिलबिला रहे हों और पत्थर के निशाने पर आकर कोई बेबस नीलगाय चोट से कराह रही हो। ..तो क्या बाघ, गिद्ध, घङियाल, डाॅल्फिन आदि…आदि के बाद अब सियार, नीलगाय, गौरैया वगैरह के लिए भी कोई अभ्यारण्य या आरक्षित क्षेत्र बनाया जाये ? हो सकता है कि कोई संस्था सुन ले और यदि मांग कर बैठे। लेकिन यह उपाय नहीं है। उपाय है, भोग की जगह, उपयोग का अनुशासन।
यही रफ्तार जारी रही, तो एक दिन यह पृथ्वी कम पङ जायेगी, इंसानी लालच के लिए और आंसू कम पङ जायेंगे अपनी गलतियों पर रोने के लिए। प्रकृति अपना संतुलन खुद करती ही है। एक दिन वह करेगी ही। यह तय है। अब तय तो सिर्फ हमे करना है कि सादगी को शान बनायें, प्रकृति व उसकी दूसरी कृतियांे को उनका हक लौटायें, ’’जिओ और जीने दो’’ का सिद्धांत अपनायें, वन्य ही नहीं, पूरी जैव विविधता बचायें या गायें, छटपटायें – आ ढूंढ लंे ग्रह और कोई।

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