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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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1_243819857मध्यप्रदेश के खाद्य नागरिक आपूर्ति मंत्री पारस जैन की सोच के अनुसार यदि तख्तियां टांगने या घरों के सामने लिखने का काम किया जाये तो हर घर के सामने की दीवार मे नेम प्लेट की जगह किसी के घर मैं बेईमान हँ, मैं चोर हँ, मैं डकेत हँ, मैं राष्ट्रद्रोही हँ, मैं कामचोर हँ, मैं लापरवाह हँ जैसे वाक्य लिखे हुये पाये जायेंगे। अभी हाल ही मे मध्यप्रदेश शासन के मंत्री ने यह घोषित किया है कि वे गरीबी रेखा का लाभ लेने वाले परिवारों के घरों की दीवार के सामने मैं गरीब हूं, लिखवायेंगे। उनकी यह सोच गरीबों के स्वाभिमान पर ठेस पहँचाने वाली सोच है। ऐसी किसी सोच को अमलीजामा नहीं पहनाया जाना चाहिये। ऐसी तख्तियां टांगने के पहले शासन को विचार कर लेना चाहिये कि उसे बाँकी घरों में भी कुछ तख्तियां टांगना होगी जो गरीब बनाये रखने के लिये काफी हद तक जिम्मेदार है।

मध्यप्रदेश के सांख्यिकी विभाग के आंकडे बोलते हैं कि मध्यप्रदेश मे 33.6 प्रतिशत लोग 12 रूपये प्रतिदिन औसत आमदानी पर एवं 8.7 प्रतिशत लोग 9 रूपये प्रतिदिन की औसत आमदनी पर अपना गुजारा कर रहे हैं, पर सभी अपने स्वाभिमान के साथ जी रहे हैं। परिवार का पालन पोषण कैसे करते है इसका वे बखान नहीं करते। खाली पेट भी सोते है तो अपने बाजू वालों को इस बात का एहसास नही होने देते। अपनी गरीबी का ऐसे लोग मजाक बनाना नहीं चाहते शायद इस बात का एहसास मध्यप्रदेश सरकार के खाद्यय नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री पारस जैन को नही है और वे गरीबी का मजाक बनाना चाहते हैं, गरीब के घर मे तख्ती लटकाने का इरादा जाहिर कर चुके हैं। गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालो के घरों में ‘मै गरीब हूं’ इस प्रकार की तख्ती लटकाने का उन्होंने ऐलान किया है। सरकार यदि ऐसे निर्णय पर अमल करती है तो यह गरीबो की मजबूरी का खुला मजाक होगा और उनके स्वाभिमान को ठेस पहंचेंगी।

आज भी गरीबी रेखा से नीचे और गरीबी रेखा में जीने वालो का प्रतिशत कम नही है। यह सरकार के लिये शर्म की बात होना चाहिये और तख्ती यदि टांगना ही है तो उन बेईमानों के गले मे टांगना चाहिये जो इस परिस्थिति को आज भी बनाये रखने के लिये जिम्मेदार हैं। देश की आजादी के 6 दशक पूर्ण होने के पश्चात भी आखिर गरीबी दूर क्यों नही की जा सकी विचार इस बात पर होना चाहिये। मंत्री यदि अपने नाम के अनुरूप काम करने की इच्छाशक्ति जागृत कर लें और पारस के गुण के अनुरूप लोहे को छूकर सोना बनाने की क्षमता पैदा कर काम करे और योजनाये ऐसी बनाये जिससे गरीबी दूर हो जाये, गरीब के घर मे ‘मै गरीब हूं’ कि तख्ती लटकाकर उसे बेइज्जत न करे। तख्ती उन अधिकारियो के गले मे लटकाये जो अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के कारण अमीरों को गरीबी रेखा के कार्ड जारी कर रहे हैं और’मै बेईमान हूं’ की दूसरी तख्ती उन अमीरों के गले में लटकाये जो गरीब न होते हुये सुविधाओ का लाभ उठा रहे हैं। हमारे शहर का रामू मोची पीढी दर पीढी फटेहाल जिंदगी जी रहा है। आजादी के 6 दशक बीत जाने के पश्चात भी उस परिवार पर सरकार की योजनाएं रहम क्यों नहीं दिखा पाई, मंत्री पारस जैन को इस बात पर विचार करना चाहिए।

रामू मोची हर शहर और गांव मे मिल जायेंगे जो पीढी दर पीढी फटे हाल जिंदगी जीने के लिये मजबूर है पर सरकारें आती गईं, योजनाएं बनती रही और योजनाओ के नाम पर नेता, अधिकारी और गांव के कल्लू पटेल मालामाल होते रहे। बेईमान होने की तख्ती नेता अधिकारी और कल्लू पटेल के गले मे टंगना ही चाहिये। गरीब के स्वाभिमान को ठेस पहँचाने वाली उस मन:स्थिति को त्याग देना चाहिये। जनता अपना प्रतिनिधि अपने कल्याण और अपने अधिकारों की रक्षा के लिये चुनती है अपनी इज्जत गली मे लाने के लिये नहीं। आज यदि प्रदेश मे गरीबी है तो उसके लिये सरकार जिम्मेदार है जिम्मेदारी से भागते हुये सरकार का मंत्री इस प्रकार की बेतुकी बाते करें, यह शोभा नहीं देता और सरकार अपने गिरेबान मे झाँककर देखे बेईमानो की फौज उसके आसपास खडी हुई हैं। पंच से लेकर प्रदेश का मुखिया तक दूध का धुला नहीं है। चपरासी से लेकर मुख्य सचिव तक गरीबों की थाली मे छेद कर रहा है। बनाना है तो शोषणमुक्त समाज बनाए, बेईमानों पर हंटर चलाए और गरीबी दूर करने के ठोस कदम उठाए। गरीबों को बेइज्जत कर स्वर्णिम मध्यप्रदेश की कल्पना नहीं की जा सकती। देते क्या है गरीबो को महिने मे 100-50 रूपये की राहत, उनके संबंध मे अपमानजनक तख्ती लटकाने का विचार है और उद्योगपतियों को जिन्हे करोडों रूपए की राहत देते हैं उनके बारे में कभी चर्चा भी नही होती। सरकार और पारस जैन को खुले दिमाग से ऐसी बातों पर विचार कर ही निर्णय लेना चाहिये।

Yasonati, Seoni

yasonati@gmail.com

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