लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

Posted On by &filed under चिंतन.


कर्मधारा में स्पीड ब्रेकर न बनें

खुद करें या औरों को करने दें

डॉ. दीपक आचार्य

आजकल कर्मयोग की धाराएं प्रदूषित होती जा रही हैं। कार्यसंस्कृति का जबर्दस्त ह्रास होता जा रहा है और ज्यादातर लोग धन के मोह में न अपने कर्म से खुश हैं, न संतोषी।

सभी को लगता है कि जो मिल रहा है वह काफी कम है और ऎसे में इस कमी की क्षतिपूर्ति जहां से भी हो जाए, कर लेने में न कोई बुराई है, न पाप। जो किसी काम के योग्य नहीं हैं और किसी की कृपा या दया से घुस आये हैं, वे भी यही सोचते हैं। और जो निर्धारित कामों से कहीं ज्यादा प्रतिभा सम्पन्न हैं वे भी इसी सोच के होते जा रहे हैं।

धन की प्राप्ति के मामले में हर कोई अपनी प्रतिभाओं को ओवरएस्टीमेट ही करता रहता है। कुछ लोग तो ऎसे निकम्मे हैं जो पान की गुमटी तक नहीं चला सकते, न मजूरी कर सकते हैं, न ही लारी चलाने का माद्दा रखते हैं, फिर भी उसमें खुश नहीं हैं जो उनकी कुव्वत से सौ गुना ज्यादा मिल रहा है।

कुछ पाने की जुगत में आदमी अब प्रतीक्षा भी कराता है और काम भी अटका देता है। आजकल कामों के मामले में लटकाऊ, अटकाऊ, गटकाऊ लोगों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है।

ये लोग कहीं भी किसी भी क्षेत्र में हो सकते हैं। कुछ ईमानदार और श्रेष्ठ लोगों को छोड़ दिया जाए तो काफी संख्या में ऎसे-ऎसे महान लोग हमारे आस-पास से लेकर हमारे अपने क्षेत्रों में कुण्डली मारे बैठे हुए हैं जिनकी पूरी जिन्दगी ही ऎसी हो गई है कि पूरी फुरसत पाने के बावजूद कोई काम समय पर नहीं कर पाते हैं।

कामों को जितना ज्यादा हो सके टालते रहने में सिद्धहस्त हो चुके इन लोगों की महानता के चर्चे हर कहीं सुनने को मिल ही जाते हैं। अपने इलाके में भी ऎसे काम अटकाऊ, लटकाऊ और गटकाऊ लोगों को किसी न किसी गलियारे या बाड़े में आसानी से देखा जा सकता है।

वैसे आजकल कोई बाड़ा या गलियारा ऎसा नहीं बचा है जहां ऎसे लोगों की भरमार न हो। इन लोगों की करतूतों ने इनकी शखि़्सयत को ही पूरी तरह स्पीड़ ब्रेकर का दर्जा दे डाला है।

ये स्पीड़ ब्रेकर किसी के भी कामों को अटका सकते हैं। इस काम के लिए उनके पास ऎसे-ऎसे हुनर होते हैं कि बस। किसी काम को लम्बे समय तक अटकाए रखने की कलाओं में माहिर इन लोगों को जागृत कर काम करा लेना भी कोई कम मशक्कत भरा नहीं है।

इसके लिए जो जतन करने पड़ते हैं उनके बारे में वे ही लोग जान सकते हैं जिनके भाग्य में दुर्भाग्य का ऎसा साया आ पड़ता है कि किसी न किसी बहाने इन स्पीड़ब्रेकरों के दर्शन और जी हूजूरी को विवश होना पड़ता है। फिर किसी जगह ऎसे ही दो-चार स्पीड़ ब्रेकर एक साथ मिल जाएं, फिर तो उस बाड़े या गलियारे का भगवान भी उद्धार नहीं कर सकता।

कुछ स्पीड़ ब्रेकर स्थायी रूप से बरसों तक एक ही जगह जमे रहते हैं, कुछ मोबाइल होते हैं जो कभी इधर कभी उधर रहते हुए इधर-उधर की करते रहते हैं। यों देखा जाए जो स्पीड़ ब्रेकरों का उपयोग दुर्घटनाओं को रोकने के लिए किया जाता है।

मगर इन देहधारी स्पीड़ब्रेकरों की माया ही विचित्र होती है। इनकी उपस्थिति मात्र ही दुर्घटनाओं को आमंत्रित करती रहती है। इनके दर्शन तक भी किसी दुर्भाग्य का संकेत करने लगते हैं।

ये स्पीड़ ब्रेकर जहां होते हैं वहां फाईलों का सरकना धीमे हो जाता है, कार्यसंस्कृति पर ग्रहण लग जाता है। ये स्पीड़ ब्रेकर बरसों तक ऎसे गलियारों या बाड़ों में पड़े रहते हैं कि न तो ये खुद काम करते हैं, न किसी और को करने देते हैं।

एक खासियत और भी है। वह यह कि इनकी उपस्थिति मात्र से किसी भी रफ्तार का कैसा भी काम धीमा और बंद हो जाने की सारी संभावनाएं विद्यमान रहती हैं। कई स्पीड़ ब्रेकर तो एक ही जगह धंसे हुए दशकों निकाल देते हैं और जब तक इनकी पावन मौजूदगी बनी रहती है तब तक पूरा परिक्षेत्र दूषित और जड़ रहने लगता है।

हर जात की तरह इन स्पीड़ ब्रेकरों की भी जात होती है जो हर कहीं पायी जाती है। फिर इनमें पारस्परिक प्रगाढ़ रिश्ता उतना मजबूत रहता है जितना और किसी का नहीं। एक स्पीड़ बे्रकर दूसरे से जी भर कर मोहब्बत करता है, उसके सुख-दुःख में भागीदारी निभाता है और एक-दूसरे के घर भरने में पूरी-पूरी मदद करता है। इन स्पीड़ ब्रेकरों का संबंध ऎसा हो जाता है जैसा कोलतार और सड़क का।

इन स्पीड़ ब्रेकरों का भी अपना अलग समुदाय बन जाता है जो कैसा भी काम हो, अटकाने और अटकवाने के सारे हथकण्डों में माहिर होता है। फिर कामों की बंधी हुई कोख खुलवाने के लिए जो भी टोने-टोटके करने जरूरी होते हैं, उनमें भी इनकी महारत होती है। यही महारत इन स्पीड़ ब्रेकरों को पुष्ट बनाती है और थोड़ा-बहुत हिलाती-डुलाती रहकर सहलाती रहती है।

जो जहां काम कर रहा है, उसे चाहिए कि जो काम उसके सामने आए, तत्काल करे या निर्धारित समयावधि में कर ले, अन्यथा जो लोग जानबूझकर कामों को अटकाते और लटकाते हैं, उन्हें समय भी लटका देता है। जो काम हम नहीं कर सकते हैं, उसके लिए स्पष्ट तौर पर इंकार कर दिया जाना चाहिए अथवा उन लोगों को सौंप दिया जाना चाहिए जो इन कामों को करने योग्य हों।

बेवजह कामों को लटकाए रखने की प्रवृत्ति का अभी त्याग नहीं किया गया तो सच मानिये आने वाले जन्म में ऎसे लोग चिमगादड़ों की शक्ल में खुद उलटे लटके हुए नज़र आएंगे। तब न रुपया पैसा हमारी मुक्ति कर पाएगा, और न ही वह पैसा-टका या उपहार, न ही वे समानधर्मा स्पीड़ब्रेकर जिनका साथ पाकर हम अपने आप तक को भूल जाते हैं, न वे लोग जिनके काम लटकाए रखना हमने अपना धर्म मान लिया था।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz