लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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 डॉ. दीपक आचार्य

दुआओं का जितना असर होता है उससे कहीं ज्यादा असर होता है बद् दुआओं का। क्योंकि दुआएँ देते वक्त प्रसन्नता का भाव होता है और बद्दुआएं देते वक्त आक्रोष का।

सामान्यतः किसी भी व्यक्ति के लिए चरम प्रसन्नता के क्षण जीवन में बहुत थोड़े आते हैं लेकिन चरम क्रोध और आक्रोष के क्षण कई बार आते-जाते रहते हैं। जब आक्रोष होता है तब सभी इन्द्रियों का भरपूर मानस-आवेश और आवेग विद्यमान रहता है और उन क्षणों में व्यक्ति शून्य हो जाता है तथा आक्रोष पूर्ण।

यह वह स्थिति होती है जब कोई भी व्यक्ति अपने भीतर कुछ भी बचा के नहीं रख सकता, उसे सारा आक्रोष बाहर उण्डेल देना पड़ता ही है। ये ही वे क्षण होते हैं जब सौ फीसदी मन आक्रोष के साथ आसक्त हो जाता है और जहाँ आक्रोषी मन तीव्र वेग से प्रहार करता है तो वह किसी अस्त्र या शस्त्र अथवा परमाण्वीय ताकत से भी ज्यादा घातक होता है।

हालांकि बाह्य तौर पर इसका दिग्दर्शन नहीं हो पाता मगर इसका अचूक प्रभाव सामने वाले लोगों के जीवन पर वज्र की तरह गिर जाता है और तभी से बद् दुआएँ एकत्रित होना शुरू हो जाती हैं।

यह दिगर बात है कि भाँति-भाँति के मद और मोह से अंधे लोगों को मदान्ध होने की वजह से उस समय प्रभाव नहीं पड़ता लेकिन कालान्तर में उनका मानसिक और शारीरिक धरातल क्षरित होने लगता है और अदृश्य रूप से ही उनका व्यक्तित्व विगलित होने लगता है।

यों कोई भी व्यक्ति संकल्प ले ले तो जीवन में दुआएं पाने के हजारों-लाखों रास्ते हैं मगर हमारा दुर्भाग्य यह है कि हम उन रास्तों को छोड़कर अपने पदीय अहंकार और सत्ता के दंभ में वे रास्ते अपना लेते हैं जहाँ पग-पग पर बिछी हुआ करती है बद्दुआएँ।

बद्दुआओं के लिए यह जरूरी नहीं कि यह बड़े कहे जाने वाले लोगों पर ही हमले करती हैं। छोटे से छोटे आदमी के पल्ले भी ये पड़ सकती हैं, क्योंकि ईश्वर ने किसी को छोटा-बड़ा नहीं बनाया है।

इस दुनिया में जो कोई पैदा हुआ है वह सृष्टि और समुदाय के काम का है, यह अलग बात है कि वह काम आए या न आ पाए, और वैसा ही लौट जाए बिना कुछ किए-धराए।

आज हमारे आस-पास की बात हो या बहुत दूर तक की। सभी जगह लोग परेशान हैं। कोई मानसिक तो कोई शारीरिक, और कोई दूसरी-तीसरी बीमारियों के चक्कर में। ज्यादातर लोग निन्यानवें के फेर में परेशान हैं और दिन-रात कोल्हू के बैल या उल्लुओं की तरह भागदौड़ कर रहे हैं।

कोई यह नहीं सोचता कि इन परेशानियों की वजह क्या है? सारे लोग एक-दूसरे के काम आते रहें और दुआएं लेते रहें तो फिर किसी को परेशान क्यों होना पड़े।

दैहिक, दैविक और भौतिक संतापों से त्रस्त लोगों की समस्याओं का विश्लेषण किया जाए तो ज्यादातर ऐसे हैं जो एक-दूसरे से दुःखी और त्रस्त हैं। एक-दूजे से सुखी होने वाले लोगों की संख्या दिनों दिन कम होती जा रही है।

एक बात साफ तौर पर समझ लेनी चाहिए कि अब वो दिन हवा हो गए जब लोग एक-दूसरे के काम करते थे, निष्काम सेवा किया करते थे और बदले में कुछ भी नहीं चाहते थे।

आजकल तो हर आदमी एवज में कुछ पाने की उम्मीद में पागल हुआ जा रहा है। अपने काम के लिए उसे जो मिल रहा है उससे उसे संतुष्टि नहीं है, और चाहता है, खूब चाहता है और इस चाहत ने उसे इतना उन्मादी बना दिया है कि वह अपनी मनुष्यता तक खो चुका है।

इसी उन्माद के कारण उसे कुछ सूझता नहीं, सिवाय अपने को भारी करने के। पागलपन की इस नॉन स्टोप यात्रा का ही परिणाम है कि वह वे काम भी सहजता से नहीं कर पा रहा है जो उसके दायित्वों में आते हैं। रोजाना अपने सम्पर्क में काफी लोग आते हैं और ऐसे में अपने दायित्व की पूर्ति नहीं हो पाने की वजह से ऐसे लोगों की बद्दुआएं मिलने लगती हैं जो बेचारे जमाने की कुटिलताओं और सम सामयिक चालाकियों से वाकिफ नहीं हैं।

रोजाना मिलने वाली बद्दुआएं जमा होती रहती हैं और कोई वक्त ऐसा भी आ सकता है जब ये सारी मिलकर कोई बड़ा विस्फोट न कर डालें। अपनी कुर्सियों के सुरक्षा कवच में धँसे हुए और एयरकण्डीशण्ड के मजे ले रहे लोगों को आज नहीं तो कल इस बात का अहसास जरूर होगा कि बद्दुआएं कितना कुछ संहार कर डालती हैं।

लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और जीवन के उत्तरार्ध में जाकर कहीं आभास होता है अपने भूतकालीन जीवन की खामियों का। इन्हीं खामियों का चिंतन करते-करते आदमी अपराधबोध से ग्रस्त होता हुआ पता नहीं किस दिन खुद हवा हो जाता है।

फिर रह जाता है बद्दुआओं भरा उसका इतिहास, जिसकी दुर्गन्ध परिजनों और पीढ़ियों तक को झेलनी पड़ती हैं, यदि उनमें मानवता के कतिपय संस्कार भी शेष बचे हों तब, अन्यथा राम नाम सत्य के बाद कुछ बचता ही नहीं।

जो लोग कहीं कुछ बने हुए हैं उन्हें चाहिए कि वे दुआएँ ले पाने का सामर्थ्य नहीं रखते हों तो बद्दुआएँ तो कम से कम न लें। यह सारी बातें उन लोगों के लिए ज्यादा मायने रखती हैं जो जमाने के दुर्भाग्य और अपने किसी पूर्व जन्मार्जित पुण्य से ऐसी जगह कुण्डली जमाए बैठे हैं जहाँ से पुचकार भी सकते हैं और फुफकार भी।

अपने जहर की थैली का मुँह बंद रखें और दृष्टि में समत्व एवं करुणा भाव रखते हुए काम करें। अपने काम को इस लायक बनाएँ कि जमाना तब भी याद रखे जब जहर के दाँत निकाल दिए जाएं या तोड़ दिए जाएं….।

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1 Comment on "बद् दुआएँ न लें,ये ही करती हैं बरबाद"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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दुआ बद्दुआ से कुच्छ नही होता कर्म ही सब KUCHH है.

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