लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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क्या आप अकबर के नवरत्नों को जानते हैं, आइये, मैं बताता हूं
डा.राधेश्याम द्विवेदी
सिर्फ किस्सागोई नहीं:-इतिहास किसी ग्रंथ में उल्लखित विवरणों की पुष्टि मात्र नहीं होता है, अपितु तत्कालिक परम्परा, मान्यता, कला, संस्कृति तथा समाज मे फैली धारणाओं का संवाहक भी होता है। आगरा मुगलकाल की सर्वाधिक समय तक राजधानी रही है। बहुत ही कम समय तक दिल्ली जैसे अन्य शहरों को राजधनी होने का गौरव प्राप्त हुआ है। इस वंश के संस्थापक बाबर से लेकर शाहजहां तक के समय में आगरा भारत की सत्ता का प्रमुख केन्द्र रहा है। बाबर को अपना हुनर दिखाने का ज्यादा समय नहीं मिल पाया था। हुमायूं को भी लड़ाइयों के कारण प्रायः आगरा से बाहर रहना पड़ा था। अकबर ने कठिन परिश्रम करके इस साम्राज्य की बुनियाद को न केवल मजबूत किया था अपितु काफी स्थायित्व भी प्रदान किया था। उसका दरबार अपने युग के शासकों से अलग तथा विलक्षण था , जिसमें चुन-चुनकर अच्छी प्रतिभाओं को स्थान दिया गया था। चूंकि इन विशिष्ट जनों की संख्या नौ थी इसलिए इन्हें नवरत्न का नाम दिया गया । भारतीय संस्कृति एवं वांगमय में एक, तीन, पांच, सात और नौ का महत्व भी ज्यादा रहा है इसलिए इस नौ संख्या को नवरत्नों से महिमा मण्डित किया गया है। नौरत्नों को भारतीय संस्कृति में समुद्र मंथन से निकलने वाले दिव्य प्रतीकों के रुप में भी जाना जाता है तथा भारतीय ज्योतिष एवं अध्यात्म परम्परा में यह अंक बहुत ही शुभ तथा मंगलदायक रहा है। इसलिए अकबर के इतिहास के समीक्षकों ने इसे ग्रहण करने के लोभ से स्वयं को अलग न कर सके ।अकबर के समय में अफगान एवं ईरान परम्परा का बोलबाला था। य़द्यपि उस समय भारतीय परम्पराओं को भी अंगीकार किया जाता था, फिर भी भारत की प्राचीन परम्परा को पूर्णतः आत्मसात नहीं किया जा सका और उसके इतिहासकारों ने नौरत्न शब्द का प्रयोग नहीं किया। जब बादके अंग्रेज तथा भारतीय इतिहासकारों ने अकबर का मूल्यांकन किया तब इस शब्द को अपनी कृतियों में स्थान दिया। आश्चर्य है कि आज हम अपने ज्ञान को बढ़ाने के बजाय इतिहासकारों को ही दोषी ठहरा रहे हैं। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तथा बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी एवं इतिहासकार श्री विन्सेट ए. स्मिथ ने भारत का प्रारम्भिक इतिहास, भारत तथा श्रीलंका की कला ( 1911) तथा अकबर महान पर अपना शोधपरक ग्रंथ प्रस्तुत किया है। अकबर द ग्रेट मुगल का प्रथम संस्करण 1958 ई़ में प्रकाशित हुआ है। इसके 260 पृष्ट के फुटनोट पर लिखा है कि आइने अकबरी के प्रथम भाग के 205वें परिचय क्रम पर मुल्ला दो पियाजा का चित्र कलकत्ता के विक्टोरिया मामोरियल कलेक्सन में लगा है जिसे अकबर का नौरत्न भी कहा गया है। पुनः 362 पृष्ट के दूसरे नं. पर मोनोमेन्टस इन्सक्रप्सन एण्ड क्वाइन्स के उप शीर्षक में अकबर उसके मित्र तथा समकालीनों के रूपचित्र प्रदर्शित किये गये हैं। यह प्रर्दशनी ब्रिटिस म्यूजियम ,दिल्ली म्यूजियम तथा विक्टोरिया मामोरियल म्यूजियम में अकबर के नवरत्नों के रुप में प्रदर्शित किये गये हैं।ये कला तथा रुपचित्रों का प्रदर्शन किस्सागोई नहीं है। इसे भी इतिहास कला एवं संस्कृति कहा जाता है। इतिहास मात्र लिखित दस्तावेज नहीं होता है अपितु ऐतिहासिक दृष्टि, मान्यताओं एवं कला का प्रदर्शन भी इतिहास ही कहा जाता है।विन्सेंट स्मिथ के अलावा राहुल सांकृत्यायन ने अपने ‘‘अकबर ‘‘ ग्रंथ के अध्याय 5 के पृष्ट 35 पर तानसेन तथा मुल्ला दोपियाजा को अकबर का नवरत्न कहकर सम्बोधित किया है। हमें अपनी सोच व्यापक एवं सर्वांगीण करना चाहिए तथा स्वस्थ व विकासोन्मुख मानसिकता रखनी चाहिए। नव रत्नों के महिमामण्डन से किसी वर्ग को कोई्र नुकसान होता दिखाई नहीं दे रहा है। यह आगरा के इतिहास का छिपा हुआ पहलू ही उजागिर हो रहा है। यह लोगों को अपने इतिहास से रूबरू होने का कुछ और अवसर दिया जाने जैसा है यह पर्यटकों को आकर्षित करने का यह एक अतिरिक्त माध्यम हो सकता है।
आइये, जानते हैं अकबर के नवरत्न:-जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर भारत का महानतम मुग़ल शंहशाह बादशाह था। जिसने मुग़ल शक्ति का भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश हिस्सों में विस्तार किया। अकबर को अकबर-ऐ-आज़म, शहंशाह अकबर तथा महाबली शहंशाह के नाम से भी जाना जाता है। निरक्षर होते हुई भी अकबर को कलाकारों एवं बुद्धिजीवियो से विशेष प्रेम था। उसके इसी प्रेम के कारण अकबर के दरबार में नौ (9) अति गुणवान दरबारी थे जिन्हें अकबर के नवरत्न के नाम से भी जाना जाता है। अकबर के दरबार में 9 विशेष दरबारी थे जिन्हें अकबर के ‘नवरत्न’ के नाम से भी जाना जाता है। अकबर के दरबार को सुशोभित करने वाले 9 रत्न निम्न थे-
1. बीरबल(1528-1583):- दरबार के विदूषक और अकबर के सलाहकार थे। ये परम बुद्धिमान कहे नवरत्नों में सर्वाधिक प्रसिद्ध बीरबल का जन्म कालपी में 1528 ई. में ब्राह्मण वंश में हुआ था। बीरबल के बचपन का नाम ‘महेशदास’ था। यह अकबर के बहुत ही नज़दीक था। उसकी छवि अकबर के दरबार में एक कुशल वक्ता, कहानीकार एवं कवि की थी। अकबर ने उसकी योग्यता से प्रभावित होकर उसे (बीरबल) कविराज एवं राजा की उपाधि प्रदान की, साथ ही 2000 का मनसब भी प्रदान किया। बीरबल पहला एवं अन्तिम हिन्दू राजा था, जिसने दीन-ए-इलाही धर्म को स्वीकार किया था। अकबर ने बीरबल को नगरकोट, कांगड़ा एवं कालिंजर में जागीरें प्रदान की थीं। 1583 ई. में बीरबल को न्याय विभाग का सर्वोच्च अधिकारी बनाया गया। 1586 ई. में युसुफ़जइयों के विद्रोह को दबाने के लिए गये बीरबल की हत्या कर दी गई। अबुल फ़ज़ल एवं बदायूंनी के अनुसार-अकबर को सभी अमीरों से अधिक बीरबल की मृत्यु पर शोक पहुँचा था।
2.अबुल फ़ज़ल(1551-1602 ):- अबुलफज़ल ने अकबर के काल को क़लमबद्ध किया था। उसने अकबरनामा और आइना-ए-अकबरी की भी रचना की थी।अबुल फजल ने अकबर के काल को कलमबद्ध किया था। उसने अकबर नामा की भी रचना की थी। इसने ही आइन-ए-अकबरी भी रचा था।सूफ़ी शेख़ मुबारक के पुत्र अबुल फ़ज़ल का जन्म 1550 ई. में हुआ था। उसने मुग़लकालीन शिक्षा एवं साहित्य में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है। 20 सवारों के रूप में अपना जीवन आरम्भ करने वाले अबुल फ़ज़ल ने अपने चरमोत्कर्ष पर 5000 सवार का मनसब प्राप्त किया था। वह अकबर का मुख्य सलाहकार व सचिव था। उसे इतिहास, दर्शन एवं साहित्य पर पर्याप्त जानकारी थी। अकबर के दीन-ए-इलाही धर्म का वह मुख्य पुरोहित था। उसने अकबरनामा एवं आइने अकबरी जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की थी। 1602 ई. में सलीम (जहाँगीर) के निर्देश पर दक्षिण से आगरा की ओर आ रहे अबुल फ़ज़ल की रास्ते में बुन्देलासरदार ने हत्या कर दी।
3.टोडरमल:– राजा टोडरमल अकबर के वित्त मंत्री थे। इन्होंने विश्व की प्रथम भूमि लेखा जोखा एवं मापन प्रणाली तैयार की थी।उत्तर प्रदेश के एक क्षत्रिय कुल में पैदा होने वाले टोडरमल ने अपने जीवन की शुरुआत शेरशाह सूरी के जहाँ नौकरी करके की थी। 1562 ई. में अकबर की सेवा में आने के बाद 1572 ई. में उसे गुजरात का दीवान बनाया गया तथा बाद में 1582 ई. में वह प्रधानमंत्री बन गया। दीवान-ए-अशरफ़ के पद पर कार्य करते हुए टोडरमल ने भूमि के सम्बन्ध में जो सुधार किए, वे नि:संदेह प्रशंसनीय हैं। टोडरमल ने एक सैनिक एवं सेना नायक के रूप में भी कार्य किया। 1589 ई. में टोडरमल की मृत्यु हो गई।

4.तानसेन:-संगीत सम्राट तानसेन का जन्म ग्वालियर में हुआ था। उसके संगीत का प्रशंसक होने के नाते अकबर ने उसे अपने नौ रत्नों में शामिल किया था। मिंया तानसेन अकबर के दरबार में गायक थे। वह कविता भी लिखा करते थे। उसने कई रागों का निर्माण किया था। उनके समय में ध्रुपद गायन शैली का विकास हुआ। अकबर ने तानसेन को ‘कण्ठाभरणवाणीविलास’ की उपाधि से सम्मानित किया था। तानसेन की प्रमुख कृतियाँ थीं-मियां की टोड़ी, मियां की मल्हार, मियां की सारंग, दरबारी कान्हड़ा आदि। सम्भवत: उसने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था।
5.मानसिंह:- राजा मान सिंह आम्बेर (जयपुर) के कच्छवाहा राजपूत राजा थे। वह अकबर की सेना के प्रधान सेनापति थे। इनकी बुआ जोधाबाई अकबर की पटरानी थी।आमेर के राजा भारमल के पौत्र मानसिंह ने अकबर के साम्राज्य विस्तार में बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। मानसिंह से सम्बन्ध होने के बाद अकबर ने हिन्दुओं के साथ उदारता का व्यवहार करते हुए जज़िया कर को समाप्त कर दिया। काबुल, बिहार, बंगाल आदि प्रदेशों पर मानसिंह ने सफल सैनिक अभियान चलाया।
6.अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना:- अब्दुल रहीम खान-ऐ-खाना एक कवि थे और अकबर के संरक्षक बैरम खान के बेटे थे।अब्दुर्रहीम उच्च कोटि का विद्वान एवं कवि था। उसने तुर्की में लिखे बाबरनामा का फ़ारसी भाषा में अनुवाद किया था।जहाँगीर अब्दुर्रहीम के व्यक्तित्व से सर्वाधिक प्रभावित था,जो उसका गुरु भी था।रहीम को गुजरात प्रदेश को जीतने के बाद अकबर ने ख़ानख़ाना की उपाधि से सम्मानित किया था।
7.मुल्ला दो प्याज़ा:-अरब का रहने वाला प्याज़ा हुमायूँ के समय में भारत आया था। उनका असल नाम अब्दुल हसन था और वह सम्राट अकबर के दरबार के नवरत्नों में एक थे अब्दुल हसन अपना अधिकांश समय किताबें पढ़ने में गुजारते थे. उन्हें साधारण जीवन मंज़ूर न था और उनका सपना था कि वह अकबर के दरबारियों में शामिल हों.इसी कोशिश में कई महीने की मशक्कत के बाद वह किसी तरह शाही परिवार के मुर्ग़ीखाना के प्रभारी बन गए. पढ़े-लिखे होने के कारण मुल्ला इससे बेहद निराश थे, पर उन्होंने धैर्य न खोया और मेहनत करते रहे.अकबर मुल्ला से प्रभावित हुए और उन्हें शाही पुस्तकालय का प्रभारी बना दिया. हालाँकि मुल्ला इससे भी बहुत खुश नहीं थे, पर उन्होंने धीरज बनाए रखा.एक साल गुज़रा और जब अकबर पुस्तकालय गए तो देखकर बेहद खुश हुए कि हर किताब ज़री और मखमल से लिपटी थी.अकबर इस क़दर प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें शाही दरबार में जगह दे दी. मुल्ला का सपना हक़ीक़त में बदल गया.मुल्लाह दो पिअज़ा अकबर के सलाहकार थे।भोजन में उसे दो प्याज़ अधिक पसन्द था। इसीलिए अकबर ने उसे दो प्याज़ा की उपाधि प्रदान की थी।
8. हक़ीम हुमाम:- हक़ीम हुमाम, मुग़ल सम्राट अकबर का सलाहकार और नवरत्नों में से एक था। यह हक़ीम अबुलफ़तह गीलानी का भाई था। इसका नाम हुमायूँ था। जब हक़ीम हुमाम, अकबर बादशाह की सेवा में भर्ती हुआ तब सम्मान के विचार से इसका नाम पहले हुमायूँ कुलीख़ाँ हुआ और इसके अनंतर यह हक़ीम हुमाम के नाम से प्रसिद्ध हुआ।यह खत (लिपि) पहिचानने में और कविता समझने में अपने समय का एक विशेषज्ञ था। यह मनोविज्ञान तथा वैंद्यक में कुछ गम रखता था। आचारवान, उदार, मीठा बोलने वाला तथा मिलनसार था। यह बावर्ची खाने के भंडारी-पद पर नियत था, पर बादशाह का मुसाहेब तथा परिचित होने से इसका सम्मान अधिक था। हक़ीम हुमाम अकबर के सलाहकार थे।यह अकबर के रसोईघर का प्रधान था।
9.फैजी (1547-1595) फैजी अबुल फ़ज़ल का भाई था। वह फ़ारसी में कविता करता था। राजा अकबर ने उसे अपने बेटे के गणित शिक्षक के पद पर नियुक्त किया था। अबुल फ़ज़ल का बड़ा भाई फ़ैज़ी अकबर के दरबार में राज कवि के पद पर आसीन था। वह दीन-ए-इलाही धर्म का कट्टर समर्थक था। 1595 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

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