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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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गौतम चौधरी

कला व्यक्ति को व्यक्ति बनाता है। कला के बिना व्यक्ति अधूरा है। कला वह मार्ग है जिससे व्यक्ति परम सत्ता तक को आत्मसात कर लेता है। ऐसी उक्तियां आम बोलचाल में कहने सुनने को मिल जाती है। लेकिन इसका साक्षात दर्शन भी हो सकता है। विगत दिनों मैं बडोदरा के प्रवास पर था। यह वही शहर है जिसने डॉ0 अम्बेडकर और महर्षि अरविन्द जैसे महामानव को आकार प्रदान किया है। आज भी यह शहर जीवंत है। महाराजा सायाजी राव गायकवाड की बडी सी हवेली। मराठा सलतनत की याद दिलाती है। मराठाओं के राज्य का जब विभाजन हुआ तो एक भाग भोसले को दिया गया। दूसरा भाग होलकर के जिम्मे आया तीसरा भाग सिधिया और चौथा भाग झांसी कहलाया। एक भाग गायकवाडों को भी दिया गया। इन पांचों मराठा रियासतों में गायकवाडों की अलग पहचान है। हालांकि हिन्दू धर्म संस्कृति के लिए प्रत्येक मराठा रियासतों ने अपने अपने ढंग से अच्छा ही किया है लेकिन बडोदरा के गायकवाडों ने तो वह कर के दिखाया जिसे कालांतर तक देश याद रखेगा। आज भी न केवल प्रयोग अपितु परंपराओं को सजोये बडोदरा पूरे पश्चिम भारत की सांस्कृतिक घुरी बन गयी है। शिक्षा के क्षेत्र में भी इस शहर का अपना महत्व है।

विगत दिनों गुजरात की सांस्कृतिक राजधानी बडोदरा प्रवास का मौका मिला। तीन दिनों के लिए वहां गया था, लेकिन कुल आठ दिन बिता कर आया। प्रवास के दौरान कई विद्वान और तत्वज्ञनियों से चर्चा होती रही। संयोग से प्रवास के दौरान शंकर कुमार झा से भी मुलाकात हुई। कुल छः फीट के झा ओएनजीसी मुम्बई कार्यालय में निगमित संचार के उप महाप्रंबंधक हैं। झा कोमल निषाद नामक सांस्कृतिक संस्था के न केवल संस्थापक हैं अपितु आजकल उसके संचालन की पूर्ण जिम्मेवारी भी निभा रहे हैं। आश्‍चर्य, झा न तो गाते हैं और न ही बजाते हैं लेकिन संगीत के विद्याओं के माहिर जानकार झा जब ध्रुपद की व्याख्या करने लगे तो मैं दंग रह गया। ध्रुपद गाइकी में मैं केवल पं0 राम चतुर मल्लिक को जानता था। मल्लिक दरभंगा जिले के चमथा के रहने वाले थे। ऐसा कहा जाता है कि पं0 मल्लिक के पूर्वज राजस्थान से आए थे और संगीत में दरभंगा घराने की नीव रखी थी। जब शंकर झा से मेरी बात होने लगी तो उन्होंने कहा कि ध्रुपद की चार वाणियां है। वाणियों की व्याख्या करते करते झा ने कहा कि ध्रुपद की व्‍युत्पत्ति पर मतैक्य नहीं है लेकिन जब सल्‍तनत काल के बाद भारत में एक नई संस्कृति का विकास हो रहा था तब मुगल बादशाह इस देश की कमान सम्हाल रहे थे। यह संस्कृति मुस्लिम आक्रांताओं को भारतीय परंपरा के साथ सामंजस्‍य स्थापित करने को विवश कर दिया। उसी समय ध्रुपद गायकी अपने पूर्ण विस्तार में आया। पहले लोक गायन की परंपरा थी। शंकर जी का मानना है कि वेद की व्‍युत्पत्ति भी लोक गायन के परंपराओं से ही हुई है। लोक गायन में जब धार्मिक अनुष्ठानों को जोडा जाने लगा तो वह कुछ वर्गों तक सीमित हो गया लेकिन गाने की परंपरा को आगे बढाने का काम इस देश के ऐसे लोगों ने किया जो जंगलों में रहकर तप और साधना किया करते थे। तब संगीत अराधना का एक मार्ग था। भगवान को संगीत से रिझाया जाता था। संगीत में वह ताकत थी जिससे चरम आनंद जिसे हिन्दू धर्म का लक्ष्य तय किया गया है उसकी प्राप्ति होती थी। ध्रपद का शब्दिक अर्थ ध्रुव के समान स्थिर पद है। इस विद्या में स्थिरता का ही महत्व है। झा के ध्रुपद व्याख्या से मैं दंग था। जब मैने उनसे पूछा कि आखिर इसका अध्यन आपने कब किया तो उन्होंने कहा कि संगीत के प्रति अनुरक्ति हमारी पुरानी है। पहले मैं संगीत पर काम करने वाली एक वैश्विक संस्था से जुडा था लेकिन जब मुझे यह भान हुआ कि यह संस्था भारतीय संगीत को विकृत रूप से प्रस्तुत कर रही है तो मैंने तय किया कि एक संस्था ऐसी खडी की जाये जो भारतीय संगीत को न केवल समृद्ध करे अपितु संगीत पर नये नये शोध भी हो।

इस प्रेरणा से झा ने आज से 26 साल पहले कोमल निषाद नामक एक सांस्कृतिक संस्था की आधारशिला रखी। इस संस्था ने समकालीन लगभग सभी गायकों और वादकों को अपना मंच प्रदान किया है। संस्था आजकल एक नये कार्य में लगी है जो कालांतर में हिन्दी साहित्य के लिए बडी उपलब्धि होगी। झा बताते हैं कि उर्दू में शयरी, नज्म आदि को गाने की परंपना पुरानी है लेकिन हिन्दी में गीतों को छोड दें तो जो नई रचना आजकल आ रही है वह लोगों की जुवान पर नहीं चढने के कारण अपना दर्प खोने लगी है। ऐसी परिस्थिति में साहित्य को जिन्दा रखने के लिए कविताओं को गेय बनाना जरूरी है। झा बताते हैं कि यह कार्य उपर से देखने में जितना आसान लगता है उतना है नहीं। इस कार्य का संकल्प आज से दो साल पहले लिया गया था। उन्होंने कहा कि आज से दो साल पहले हिन्दी के कालजयी कवि, पं0 सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर, कवियित्री महादेवी वर्मा, महान कवि गोपाल सिंह नेपाली और हिन्दी कविता में छायावाद के प्रवक्ता महाकवि जयशंकर प्रसाद की कविताओं का डॉक्‍युमेंटेशन करने की योजना बनायी गयी। इस काम को कोमल निषाद संस्था ने अपने हाथ में लिया। झा जी बताते हैं कि सवसे पहले तो कविताओं का चयन किया गया। फिर उन कविताओं को संगीत रागों में आबद्ध किया गया। यानि कविताओं को कंपोज किया गया फिर जब इतना काम हो गया तो संगीतमय कविताओं को गाने के लिए गायकों को ढूंढने की प्रक्रिया प्रारंभ की गयी। यह सब हो जाने के बाद सबसे बडी चुनौती थी कविताओं की आत्मा को बचाकर रखने की। झा जी ने इस विषय पर भी घनघोर चिंतन किया। कई बात कविताओं को गया गया और फिर उसे कविता की आत्मा के साथ सामंजस्य बिठाकर देखा गया। इस कार्य में कुल एक साल का समय लगा। लेकिन पूरी तन्‍मयता और अपूर्व साधना के बल पर शंकर कुमार झा ने उन कवियों को एक नया आयाम देने में सफल रहे। आज प्रसाद, निराला, दिनकर, महादेवी और नेपाली की कविताओं की सीडी तैयार की जा चुकी है। झा जी इसे बेचने के लिए नहीं महज डॉक्‍युमेंटेशन के लिए बनवाये हैं। हालांकि मीर और गालिब पर भी सीडी तैयार किया गया है लेकिन वह सीडी उन शेर और नज्मों के हैं जो आज लोगों की जुबान पर नहीं है।

बडोदरा, बडोदरा के किले और महल फिर वहां शंकर जी से मुलाकात और हिन्दी के लिए कोमल निषाद संस्था का योगदान ऐसी कुछ स्मृतियों को मैं अपने साथ लेकर चंडीगढ चला आया। लगा कि उसे लिखा जाना चाहिए। यह न तो मेरी स्मृति है और न ही यात्रा वृतांत। इस आलेख को संपादक जिस नजर से देखें परंतु पाठकों तक ले जाने के लिए मैंने इसे लिखा है। इसकी अगली कडी में ध्रुपद राग और उसकी व्याख्या के साथ ही ध्रुपद की वाणियों पर विस्तार से लिखूंगा।

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