लेखक परिचय

प्रवीण दुबे

प्रवीण दुबे

विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

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-प्रवीण दुबे-

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वैश्विक महाशक्ति अमरीका यदि किसी व्यक्ति या देश की प्रशंसा के पुल बांधे तो पूरी दुनिया का ध्यान उस ओर आकर्षित होना सामान्य बात है। अमरीकी विदेश मंत्री जॉन कैरी ने भारत की यात्रा पर आने से पूर्व भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यह कहते हुए प्रशंसा की है कि ‘जो विकास की योजना भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चुनावी नारे ‘सबका साथ, सबका विकास’ में दिखाई पड़ती है वह एक महान सोच है। निश्चित ही यह गर्व करने का विषय हो सकता है कि दुनिया के सबसे ताकतवर देश का विदेश मंत्री भारत के प्रधानमंत्री की प्रशंसा में कसीदे पढ़ रहा है। लेकिन इसके साथ यह प्रश्न उठना भी अवश्यंभावी है कि आखिर कैरी ऐसा क्यों कह रहे हैं? 


जहां तक भारत और अमरीका के संबंधों का सवाल है तो सभी को यह बात मालूम है कि अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते बहुत अधिक घनिष्ठ कभी नहीं रहे। जिस समय रूस खंडित नहीं हुआ था और अमेरिका के लिए चुनौती बना हुआ था, भारत को रूसी संरक्षण प्राप्त था और अमेरिका भारत के विरोधी देश में शामिल था। रूस के विखंडन के बाद जब दुनिया की सामरिक और कूटनीतिक स्थिति में बदलाव आया तब अमेरिका के नजरिए में थोड़ा बदलाव अवश्य देखने को मिला।
 विदेशी मामलों के विशेषज्ञों की बात पर गौर किया जाए तो यह वही अमेरिका है जो भारत के कट्टर दुश्मन पाकिस्तान को सदैव सामरिक मदद देता रहा है। यहां तक कि पाकिस्तान से हुए युद्ध के दौरान भी अमेरिका ने अरब सागर में पाकिस्तान की सहायतार्थ अपना नौसैनिक बेड़ा तक तैनात कर दिया था। इतना ही नहीं, पिछली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के समय जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पोखरण परमाणु परीक्षण किया था उस दौरान भी अमरीका ही वह देश था जिसने इसका प्रबल विरोध करते हुए भारत पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध आरोपित किए थे। 


अभी कुछ समय पूर्व ही इसी अमरीका ने जब नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं थे उस समय उनकी अमरीका यात्रा के लिए वीजा देने से इंकार कर दिया था। भारत को नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर और पाकिस्तान द्वारा भारत में फैलाए जाने वाले आतंकवाद को लेकर अमेरिका का रवैया दो मुंह सांप जैसा रहा है। उसके राजनयिक भारत में भारत जैसी और पाकिस्तान में पाकिस्तान को अच्छी लगने वाली बातें करते रहे हैं। कश्मीर मसले पर अमेरिका खुलकर भारत के पक्ष में  बयान क्यों नहीं देता? वह पाकिस्तान से खुलकर यह क्यों नहीं कहता कि पूरा कश्मीर भारत का हिस्सा है। वह खुलकर यह क्यों नहीं कहता कि पाकिस्तान अपने यहां संचालित भारत-विरोधी आतंकी प्रशिक्षण शिविरों को बंद करे। 


आखिर क्यों अमेरिका दाऊद और हाफिज सईद जैसे भारत विरोधी आतंकियों को पकडऩे के लिए पाकिस्तान पर दबाव नहीं बनाता? यह जानते हुए भी कि जो लड़ाकू विमान वह पाकिस्तान को दे रहा है उनके सर्वाधिक इस्तेमाल की संभावना भारत पर ही है, बावजूद इसके अमेरिका द्वारा लगातार पाकिस्तान को सामरिक मदद दी जाती रही है। जहां तक तकनीकी क्षेत्र में अमरीकी कंपनियों की भारत में आमद का सवाल है, इसे जायज ठहराया जा सकता है लेकिन अमेरिका यदि यह चाहे कि सभी क्षेत्रों में अमरीकी कंपनियों के लिए भारत के दरवाजे खोल दिए जाएं तो यह एक बड़ी भूल होगी। ऐसी स्थिति में अमेरिकी विदेश मंत्री का भारतीय प्रधानमंत्री की नीतियों का खुलकर समर्थन करना संदेह को जन्म देता है। वैसे भी पूरी दुनिया इस बात को पक्की तौर पर जानती है कि अमेरिका अपनी पूंजीवादी सोच और विश्व आर्थिक व्यवस्था में अपना दबदबा कायम करने के उद्देश्य से विभिन्न देशों के प्रति अपनी नीतियों को बदलता रहता है। 


कैरी द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा वाले बयान को अगर पूरा पढ़ा जाए तो साफ हो जाता है कि भारत की नई सरकार के दौर में अमेरिका अपने हितों के लिए जमीन तलाशने की कोशिश कर रहा है। कैरी ने साफतौर पर कहा है कि ”यदि भारत की सरकार निजी प्रयासों के लिए ज्यादा समर्थन देने की योजना को पूरा करती है। यदि वह पूंजी प्रवाह के लिए ज्यादा उन्मुक्तता पैदा करती है और मजबूत बौद्धिक संपदा अधिकार देती है तो यकीन मानिए ज्यादा अमरीकी कंपनियां भारत में आएंगी। उन्होंने यह भी कहा कि हम दुनियाभर में अपने व्यापारिक साझेदारों के साथ व्यापार और निवेश बढ़ाने के लिए काम करते हैं, अब भारत को यह तय करना है कि वह वैश्विक व्यापार व्यवस्था में कहां खड़ा होता है।


 कैरी का संकेत साफ है कि भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े बाजार में अमरीका के साथ व्यापारिक साझेदारी बढ़ाई जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा अमरीकी कंपनियां इस बड़े बाजार में प्रवेश करके आर्थिक लाभ उठा सकें। वैश्वीकरण के इस दौर में एक सीमा तक यह सही कहा जा सकता है, लेकिन यह सीमा क्या हो इसका निर्णय बेहद सोच समझकर सरकार को लेना होगा। अब जबकि अमरीकी विदेश मंत्री भारत में है, हमारे राजनयिकों को भारत और भारत की जनता के हितों को दृष्टिगत रखते हुए बिना दबाव में आए दृढ़ता से अपना पक्ष रखने की जरुरत है। कैरी द्वारा मोदी का गुणगान किए जाने के पीछे भारत से नजदीकियां बढ़ाकर अपना उल्लू सीधा करने की अमरीकी चाल से भारत को सावधान रहना होगा क्योंकि व्यक्ति से देश बड़ा होता है।

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