लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

विश्व बैंक ने दुनिया से अत्याधिक गरीबी और भूख को वर्ष 2030 तक मिटाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। किंतु जलवायु परिवर्तन गरीबी को मिटाने के लिए किए जा रहे वैश्विक प्रयासों को कमजोर कर रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के असर पर हाल में प्रकाशि‍त रिपोर्ट में विश्व बैंक के चेतावनी भरे नि‍ष्कर्ष बताते हैं कि तापमान में तेजी से बढ़ोतरी के कारण दुनिया के कई इलाकों में फसलों की उत्पादकता बुरी तरह प्रभावित हो रही है, जिसके कारण आने वाले दिनों में अनाज उत्पादन और जल आपूर्ति में भारी कमी आएगी।

आज जो विश्वभर में लोगों को गरीबी और भूख से मुक्त करने के प्रयास चल रहे हैं उन पर प्रतिकूल असर पड़ने की बात करते हुए रपट तापमान में डेढ़ से दो डिग्री सेल्सियस की वृद्धि‍ होना बताती है। टर्न डाउन द हीटः कन्फ्रंटिंग द न्यू क्लाइमेट नॉर्मल” नामक इस नई रिपोर्ट का मुख्य ध्यान गर्मी बढ़ने के विशेष क्षेत्रीय प्रभावों पर है। इस पर विश्व बैंक के अध्यक्ष जिम योंग किम ने तो यहां तक कह दिया है कि गरीबी को खत्म करना, वैश्विक समृद्धि‍ को बढ़ाना और वैश्विक असमानता को कम करना पहले ही मुश्किल है। तापमान में दो डिग्री की और बढ़ोतरी होने से यह और भी अधिक मुश्किल हो जाएगा। इसके अलावा आने वाले दिनों को लेकर इस बात की आशंका भी इन दिनों व्यक्त की जा रही है कि औसत तापमान में औद्योगीकरण के बढ़ते स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि‍  हो सकती है। जिसके कारण मौजूदा समय में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन और तेजी से होगा।

इसका अर्थ यह निकलता है कि भविष्य में अत्यधिक गर्मी, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि‍ और चक्रवातों के जल्दी-जल्दी आने का खतरा बढ़ेगा। दुनिया पर इसका प्रभाव यह होगा कि दो डिग्री की वृद्धि‍ ब्राजील की सोयाबीन फसल का उत्पादन 70 प्रतिशत तक कम कर देगा। पिघलते ग्लेशियर एंडीज के आसपास के शहरों के लिए खतरा बन जायेंगे और पश्चिमी तट पर रहने वाले समुदायों की मत्स्य आपूर्ति सीधे तौर पर प्रभावित होगी। दो डिग्री की वृद्धि‍ का यह भी मतलब है कि दुनिया में मक्का, गेहूं और अंगूर की फसलों के उत्पादन में 50 प्रतिशत की कमी आ जाएगी। उत्तरी रूस में बर्फ से ढंके क्षेत्र में लगातार बर्फ पिघलेगी जिसके कारण नुकसानदायक मिथेन गैस के उत्सर्जन में बढ़ोत्तरी होगी और  गर्मी बढ़ने की प्रक्रिया को और बढ़ावा मिलेगा।

वस्तुत: इस प्रकार की रिपोर्ट आ जाने के बाद दुनिया में चल रहे भूख मिटाने के प्रयासों के सामने एक बड़ी चुनौति खड़ी हो गई है। विश्व के विकसित और विकासशील देश तो इस समस्या से जैसे-तैसे सामना कर लेंगे किंतु ऐसे में उन देशों का क्या होगा जो अभी तीसरी दुनिया अथवा विकास की प्रारंभि‍क अवस्था में माने जाते हैं। वैसे भी पृथ्वी पर पड़ने वाले जलवायु परिवर्तन का प्रभाव किसी देश पर यह देखकर नहीं पड़ने वाला कि वह किस केटगरी का है।  

वास्तव में ग्लोबल वार्मिंग के  कारण पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव के परिदृश्य में भारतीय वैज्ञानिकों ने जो दुनिया से भूख मिटाने के लिए किए जा रहे प्रायासों में अपना अमूल्य योगदान देते हुए पहल की है, वर्तमान दौर में उसकी जितनी तारीफ की जाए निश्चि‍त ही वह कम कहलाएगी। क्यों कि भूख शब्द सीधे अनाज से जुड़ा हुआ है, यदि दुनिया में अनाज की पैदावार पानी की कमी के वाबजूद बड़ा दी जाए तो इतना तय है कि संसार का कोई आदमी भूख के कारण फिर नहीं मरेगा। इस फार्मुले पर चल कर बहुत हद तक जानवरों और पशु-पक्षि‍यों को भी बचाया जा सकता है।

वस्तुत: भारतीय कृषि वैज्ञानिकों को गेहूं की जन्म कुंडली तैयार करने में अहम सफलता मिली है। वर्तमान में जलवायु परिवर्तन से गेहूं की खेती प्रभावित हो रही है, जिससे उत्पादकता में समुचित वृद्धि नहीं हो पा रही। गेहूं की खेती के लिए ठंडे वातावरण की जरूरत होती है, लेकिन साल दर साल तापमान वृद्धि से गेहूं की पैदावार में अपेक्षित सुधार नहीं हो रहा है। किंतु कृषि वैज्ञानिकों की नई जीनोम आनुवांशिकी तैयार करने की इस उपलब्धि से गेहूं की ऐसी खास प्रजातियां तैयार की जा सकेंगी, जिनकी खेती कहीं भी और किसी भी मौसम में करना संभव होगा। वैज्ञानिकों द्वारा विकसित गेहूं की इन नई प्रजातियों की खास बात यह है कि इसकी फसल पर रोग व कीटों का प्रकोप नहीं होगा और तो ओर यह जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त हैं। कम अथवा बिना सिंचाई के अच्छी पैदावार मिलेगी। क्षेत्रीय भौगोलिक जलवायु के हिसाब से फसलों के बीज तैयार करना आसान होगा तथा स्थानीय बारिश और मिट्टी की नमी से ही फसल तैयार हो जाएगी। भविष्य में जीन सीक्वेंशिंग की इस उपलब्धि से सूखारोधी प्रजातियां विकसित की जा सकेंगी।

भारत में यह सफलता भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, पंजाब कृषि विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की साझा टीम को मिली है। हमारे वैज्ञानिकों की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया की खाद्य जरूरतों के मद्देनजर उन्होंने जो गेहूं की जन्मकुंडली बनाई उस पर सि‍र्फ 35 करोड़ रुपये खर्च आया है। जिसे कि देश के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के जैव प्रौद्योगिकी विज्ञान विभाग ने उपलब्ध कराई थी।

आज विश्व बैंक की दुनिया के लिए खाद्यानपूर्ति को लेकर की जा रही चिंता के वक्त भारत के कृषि‍ वैज्ञानिकों की यह गेहूं की नई प्रजातियां विकसित करने की खोज वास्तव में खाद्य सुरक्षा के लिए किसी क्रांति से कम नहीं कहलाएगी। आने वाले दिनों में जब ग्लोबल वार्मिंग का असर और अधि‍क बढ़ेगा तब दुनिया के सामने सबसे बड़ा संकट निश्चित ही भूख से लड़ना होगा, क्यों कि जिस तेजी से वैश्विक जनसंख्या बढ़ रही है। उसकी पूर्ति भोजन के परंपरागत माध्यमों से करना संभव नहीं, ऐसे में दुनिया के सामने यही विकल्प है कि वह अपने भूख से लड़ने के लिए नवीनतम संसाधन बढ़ाए। वस्तुत: भारतीय वैज्ञानिकों की यह पहल आज विश्व को भूख से लड़ने के नए औजार मुहैया कराते दिखायी देते हैं। जिसे देखकर यह भी कहा जा सकता है कि दुनिया से भूख मिटाने की सबसे सार्थक पहल का शंखनाद आज भारत से हो गया है।

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