लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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Posted On by &filed under विविधा, हिंदी दिवस.


teacherइंदु सिंह “इन्दुश्री’

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भाषा नहीं
‘माँ’ हैं हम सबकी
‘हिंदी’ तो
पहचान हैं हम सबकी
‘देवनागरी’ से
बनी शान हम सबकी
वर्णमाला ऐसी कि
रगों में बस जाये हमारी
तभी तो वो आन हैं हम सबकी ॥
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‘हिंदी’ हैं हम वतन हैं… हिंदुस्तान हमारा… सिर्फ़ शब्द नहीं हमारी मातृभूमि का जयघोष हैं… जो हमें एक साथ ही अपनी अपनी ‘भाषा’ और ‘जड़ों’ से जोड़ता हैं और जिसे सुनकर हमारा मस्तक गर्व से ऊंचा हो जाता लेकिन ये क्या सिर्फ़ कुछ विशेष अवसरों पर ही हम इसे दोहराते और फिर तिरंगे की तरह उतारकर अगले वर्ष तक के लिये किसी अलमारी में सुरक्षित रख देते शायद, यही वजह हैं कि हमारे यहाँ ‘हिंदी दिवस’ एक पर्व, एक रवायत बनकर रह गया हैं जबकि हम तो उस देश के वासी हैं जहाँ देवों की वाणी ‘संस्कृत’ से ‘हिंदी’ का जनम हुआ जो हम सबकी सांसों में बसती हैं तो फिर हम ही क्यों नहीं उसे अपनी जुबान पर इस तरह से बिठाते कि गर, एक ठोकर भी लगे तो मुख से स्वतः ही ‘आह’ निकले ‘आउच’ नहीं, ऐसे ही गर कोई गलती हो तो ‘क्षमा’ कहे न कि ‘सॉरी’ यदि हम इतनी छोटी-छोटी बातों पर ही ध्यान दें देंगे तो एक बहुत बड़ी जंग जीत लेंगे क्योंकि वो लोग जो नहीं चाहते थे कि ‘हिंदी’ कभी इस देश पर एकछत्र राज्य करें उन्होंने ही ये षडयंत्र रचा कि उसे ‘राजभाषा’ का दर्जा देकर भी कभी एकछत्र राज न करने दिया तभी तो हम ‘अंग्रेजो’ की दासता से तो मुक्त हो गये लेकिन अब भी ‘अंग्रेजी’ की गुलामी कर रहे जबकि जिन बातों को ये आधार बनाया जाता कि उनके कारण इसे हर जगह लागू नहीं किया जा सकता और तरह-तरह के चुटकुले या मजाक बनाकर खुद अपना उपहास उडवाते पर, जिस दिन से हमने ठान लिया कि हमें सिर्फ़ अपनी ही भाषा को मान देना हैं उसमें ही अपने सारे काम करने हैं तो फिर ये अभी बेसिर पैर के तर्क-कुतर्क ताक पर रखे रह जायेंगे जिसने ‘हिंदी’ जो हाशिये पर रख दिया हैं ।

हम ही हैं न जो अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में मोटी-मोटी फीस देकर भर्ती करवाते और फिर अभिवादन से लेकर रात्रि सोने तक अंग्रेजी में ही अपनी बात कहने की आदत डालते हैं उसकी जुबान जो ठीक से अपनी बात भी कहना नहीं जानती उस पर अंग्रेजी भाषा की कविताओं के बडे-बडे शब्द रख देते और जब वो अपनी तोतली जुबान में कोई ‘पोयम’ सुनाता तो गदगद हो जाते ये दासता नहीं तो क्या हैं कि फिरंगियों को तो हमने खदेड़कर अपने देश से बाहर कर दिया लेकिन उनकी भाषा सहित उनके तौर-तरीके और रहन-सहन, खाने-पीने की आदतों को इस तरह अपना लिया कि अब अपना ‘भारत’ भी विश्व पटल पर एक ‘विदेश’ ही नजर आता हैं जबकि हम ही कहते कि इस ब्रम्हांड में एकमात्र अपने ‘देश’ को छोड़कर बाकी सब ‘विदेश’ हैं पर, अब आप कहीं भी जाये या ‘नेट’ पर ही किसी और देश के दर्शन करें तो विकास की दौड़ में भले ही कहीं पीछे नजर आये लेकिन उनके उपरी दिखावे की नकल में उनसे कहीं आगे ही नजर आयेंगे ये भूलकर कि वो अपनी जलवायु या मौसम के अनुसार अपना खान-पान और परिधान तय करते हैं हम केवल अपने आपको किसी स्तर पर उनकी बराबरी का साबित करने के लिये इस उपरी आवरण से अपना आप ढंककर खुश हो लेते हैं ।

आपको लगेगा कि इन सब बातों का इस दिवस से कोई लेना-देना नहीं लेकिन जब आप जानेंगे कि भाषा हमारी बोली ही नहीं हमारा दर्शन भी हैं तो कहीं भी इन बातों में अतिश्योक्ति न लगेगी क्योंकि हमारा ही देश हैं जो अपनी भाषा को ‘माँ’ का दर्जा देता हैं और दूसरों की भाषा का भी उतना ही सम्मान करता हैं पर, इसका मतलब ये नहीं कि अपनी पहचान ही खो दे तो आज इस दिवस पर यही कहना हैं… हिंदी को उसका स्थान देना हैं… ये काम हमको और आपको ही करना हैं… जय हिंद… जय हिंदी… 🙂 🙂 🙂 !!!

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