लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

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yamunaआइये, यमुना से रिश्ता बनायें

ताज्जुब है कि प्रेम और शांति उत्सव के नाम पर श्री श्री रविशंकर और उनके अनुयायी उस धारा की आजादी को ही भूलने को तैयार हैं, जो शांति की निर्मल यमुनोत्री से निकलकर, प्रेम का प्रतीक बने ताजमहल को आज भी सींचती है! बांकेबिहारी को पूजने वाले भी भला कैसे भूल सकते हैं कि कालियादेह पर नन्हे कान्हा का मंथन-नृतन कृष्ण की
कृष्णा को विषमुक्त कराने की ही क्रिया थी ? आज है कोई जो कान्हा बन कालियादेह को सबक सिखाये ? पुरानी दिल्ली वालों को भी भूलने का हक नहीं कि तुगलकाबाद के किले से लाकर कश्मीरी गेट से अजमेरी गेट के बीच देल्ही को बसाने वाली यमुना ही थी। जिस लालकिले की प्राचीर से उगते हुए आजादी का सूरज कभी सारी दुनिया ने देखा था, उसकी पिछली दीवार से जिसने इश्क किया, वे लहरें भी इसी यमुना की थी। भला कोई भारतीय यह कैसे भूल सकता है !

मुझे खूब याद है कि मेरे पिताजी ने मेरी तालीम के लिए जिस स्कूल को चुना, वह आज भी यमुना के किनारे ही है – लुडलो कैसल। मैं यमुनापार रहता हूं। तब मेरे स्कूल की बस पुराने पुल से होती हुई रोज दो बार यमुना के ऊपर से गुजरती थी, आज मैं गुजरता हूं। पिछले 39 सालों से यही सिलसिला है। यमुना के उस पार जाने के लिए एक मात्र बस नंबर 317 पकङने तब हमें यमुना पुश्ता चुंगी ही जाना पङता था। अकेले में हिम्मत रखना भी मुझे 1978 की यमुना बाढ़ ने ही सिखाया। यमुना के मोटे रेतीले स्पंज में सुरक्षित जलभंडार ने ही आज तक मुझे पानी पिलाया है। मैने चुल्लू से निकाल कर यह पानी खुद पीया है। कभी यमुना किनारे बसे चंदगीराम का अखाङे के दंगल देखकर बदन को कसरती बनाने की चाह मेरे भी मन में जगी थी। मैंने और मेरी पत्नी ने जाने कितनी बसंतपंचमी यमुना को निहारते मनाई होंगी। मेरा मृत नवजात शिशु इसी यमुना के रेती में आज भी कहीं सोया हुआ होगा। मेरी विदाई यदि दिल्ली में हुई, तो मेरा शरीर भी इसी यमुना के किनारे ही भस्म होगा। ये सब क्या भूलने की बातें हैं ?

यमुना के साथ इतने सारे रिश्ते ! इतनी सारी स्मृतियां !! यह सब होते हुए भी मेरा व्यवहार यमुना के साथ वैसा ही है, जैसे श्मशान पहुंचकर वैरागी और बाहर निकलकर पुनः दुनियाई हो जाना। निश्चित ही यह एक मां से एक संतान का व्यवहार नहीं है, तो मुझे यमुना को मां कहने का भी कोई हक नहीं है। यदि मैने यमुना से सच में कोई रिश्ता समझा होता, तो मेरे मन में भी यह सवाल जरूर उठता कि कभी यमुना रेती की सब्जियां खाकर मैने सेहत पाई थी; आज उसी तट की सब्जियां खाकर सेहत गंवा रहा हूं। क्यों ? जिस यमुना की गोदी में मौन-मुखर समाधियों से कभी मन सुवासित होता था, आज उन समाधियों को ही हमने यमुना की दुर्गंध सहने को मजबूर कैसे हो जाने दिया ? यमुना का जो पुश्ता हमारी सुबह-सवेरे सैर की पगडंडी था, हमने उसे रफ्तार का राजमार्ग बना दिया। यमुना की जमीन समाधियों को दी गई; हम देखते रहे। पुश्ते के भीतर नया पुश्ता बना दिया गया; कह दिया गया कि नये पुश्ते के बाहर की ज़मीन यमुना की नहीं हैं। दिल्ली ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

आज भी आधी दिल्ली, यमुना की वजह से पीने का पाती है। इस दृष्टि से यमुना.. दिल्ली की लाइफलाइन है; बावजूद इसके दिल्ली अपनी एहसानफरामोशी से बाज नहीं आ रही। दिल्ली, उलटे यमुना को धमका रही है। ’यमुना जिये अभियान’ के मनोज मिश्र कहते हैं कि यमुना को धमकाते, दिल्ली को कई बरस बीत गये। दिल्ली से गुजरती यमुना की 50 कि.मी. लंबाई में से 22 कि.मी. को हर रोज शहरी सीमायें धमकाती ही हैं। वजीराबाद पुल से ओखला बैराज के बीच की यह दूरी, दुनिया में किसी भी नदी की तुलना में यमुना के लिए सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। इसी हिस्से में यमुना सबसे ज्यादा प्रदूषित है। इसी हिस्से में आकर यमुना सिकुङकर डेढ से तीन कि.मी. चैङी रह जाती है। देखें तो, इस हिस्से को सबसे ज्यादा धमकी सरकारी एजेन्सियों ने ही दी है – 100 एकङ पर शास्त्री पार्क मेट्रो, 100 एकङ में यमुना खादर आई टी ओ मेट्रो, 100 एकङ में खेलगांव व उससे जुङे दूसरे निर्माण, 61 एकङ में इन्द्रपस्थ बस डिपो और 100 एकङ में बनाया अक्षरधाम। मां यमुना के सीने पर आर्ट आॅफ लिविंग का तय आयोजन भी सरकारी सहमति का ही नतीजा है। म्युनसिपलिटी के नाले यमुना में गिरकर सांस रोकने की धमकी रोज दे रहे हैं, सो अलग।
गौर करें कि धमकियां देने को विवश यमुना भी है। महरौली, बसंत विहार से लेकर द्वारका तक की हरियाणा से सटी पट्टी अभी ही त्राहि-त्राहि कर रही है। शेष दिल्लीवासियों को अभी भी पीने का पानी सीमित ही मिलता है। यमुना और सिकुङी… और कीचङ हुई, तो पेयजल की दुर्दशा और गहरायेगी। यही वह हिस्सा है, जिसने 1947 से 2010 के मध्य नौ बाढ. देखी हैं – 1947, 1964, 1977, 1978, 1988, 1995, 1998, 2008 और 2010। किस बारिश में घुसकर यह बाढ़ मेट्रो और डी डी ए के किस निर्माण मंे अव्यवस्था फैला देगी; यमुना कब दिल्ली को 2005 की मुंबई याद दिला देगी; भविष्यवाणी करना मुश्किल है। धमकी यह भी है कि यह हिस्सा भूकंप रेखा से अछूता नहीं। भूकंप केे झटके कभी भी आकर रेत पर टिकी इमारतों को धूल चटा जायेंगे। क्या ये धमकियां अनसुनी करने योग्य हैं ? नहीं! फिर भी हमने आज तक इन्हे अनसुना ही किया।

बाढ़, दिल्ली को न डुबोए। केन्द्रीय जल आयोग के प्रस्ताव के मुताबिक, इसके लिए यमुना धारा के मध्य बिंदु और एक तरफ के पुश्ते के बीच की दूरी कम से कम पांच किमी रहनी चाहिए। हमने क्या किया ? पुश्ते के भीतर एक और नया पुश्ता बनाकर बोर्ड टांग दिया – ’’सेफ डेल्ही’’। हकीकत यह है कि मेट्रो, खेलगांव, अक्षरधाम सरीखे निर्माण दिल्लीवासियों की सुरक्षा से समझौता कर बनाये गये हैं। पर्यावरण संरक्षण कानून – 1986 की मंशा के मुताबिक, नदियों को ’रिवर रेगुलेशन जोन’ के रूप में अधिसूचित कर सुरक्षित किया जाना चाहिए था। 2001-2002 में की गई पहल के बावजूद, पर्यावरण मंत्रालय आज तक ऐसा करने में अक्षम साबित हुआ है। बाढ़ क्षेत्र को ’ग्राउंड वाटर सैन्चुरी’ घोषित करने के केन्द्रीय भूजल आयोग के प्रस्ताव को हम कहां लागू कर सके ? नदी भूमि पर निर्माण की मनाही वाली कई सिफारिशें हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने नदी भूमि को जलनिकाय के रूप में सुरक्षित रखने कहा; हमने नहीं सुना।
श्री मिश्र का आकलन और आरोप सच है, किंतु यमुना के प्रति हमारी संवेदनहीनता भी झूठ नहीं। याद कीजिए, यमुना की आजादी में ख़लल डालने के विरोध में दो साल लंबा यमुना सत्याग्रह हुआ; हम घर मंे बैठे रहे। हमारे मल-मूल के नाले और हमारे घरों की पन्नियांे ने यमुना की सांस पर ही संकट पैदा कर दिया। हमारे अस्पताल, यमुना में मवाद-सङे-गले अंग..सब कुछ डालते रहे; हम चुप रहे। विरोध जताने बृज से चली एक यात्रा को बार्डर पर ही रोक दिया गया। हमने उसे रमेशबाबा की यात्रा कहकर उसमें शामिल होने की जहमत भी नहीं उठाई। ठेकेदारों से लेकर फैक्टरी, निगम व सरकार तक ने यमुना के साथ ’डंप एरिया’ जैसा व्यवहार किया। विधानसभा में इसे लेकर कभी हल्ला नहीं हुआ। नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल ने यमुना पुश्ते से ठोस कचरा उठाने का सख्त आदेश दिया, किंतु दिल्ली की राजनीति ने क्या किया ? दिल्ली की सफाई व्यवस्था को भाजपा और आम आदमी पार्टी का राजनैतिक अखाङा बना दिया। गत् भारत नदी दिवस पर दिल्ली के वर्तमान जल मंत्री कपिल मिश्र ने भी कहा – ’’यदि हम यमुना को नहीं बदल पाये, तो समझिएगा कि हम व्यवस्था नहीं बदल पाये। क्या इसी अखाङेबाजी से बदलेगी व्यवस्था ??

दरअसल, हम दिल्लीवासी जब तक यमुना से अपनी सेहत, सुख, दुख और समृद्धि के रिश्ते को ठीक से समझने की कोशिश नहीं करेंगे, तब तक हम यमुना के बेबसी के लिए सिर्फ सरकार को कोसते ही रहेंगे, करेंगे कुछ नहीं। खुद अपने और अपने बच्चों को यमुना किनारे ले जाये बगैर यह रिश्ता बन नहीं सकता। यमुना की आंख से अपनी आंख मिलाये बगैर, इस संकल्प का मन में आना मुश्किल है कि यमुना की समृद्धि में मेरा खुद का भी कुछ योगदान हो सकता है। यह बात तभी गले उतरेगी कि मेरे द्वारा हर दिन बचाया एक बाल्टी पानी, यमुना को पानीदार बनाने में सहायक हो सकता है। बिना सीवर, पानी कनेक्शन नहीं देने का नियम आङे आये, तो आये…अपनी हाउसिंग सोसाइटी को सीवर से जोङने की बजाय, बङा सामुदायिक सैप्टिक टैंक बनाकर हम यमुना के दर्द को कम कर सकते हैं। ऐसे नियम को बदल डालें। जल मंत्री महोदय ने कहा कि उनके विधानसभा क्षेत्र करावल नगर के उस हिस्से मंे ज्यादा सफाई थी, जहां सीवर पाइपलाईन नहीं थी; फिर भी नियम नहीं बदला; उलटे खजूरीखास में सीवर को ही आगे बढ़ाया।

समझने की जरूरत है कि यमुना को बचाना, यमुना से ज्यादा खुद को बचाने के लिए है। यह सोच ही संकल्प देगी कि पाॅलीथीन पर लगाये प्रतिबंध को लेकर दिल्ली सरकार सख्त भले ही न हो, हमंे खुद सख्त होना बेहद जरूरी है। सीवर लाइनों में रसायन और पाॅली कचरा कदापि न जाने पाये, इसके लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की प्रतीक्षा करने की जरूरत कहां हैं ? हम इसका नियंत्रण अपने घर-फैक्टरी-दुकान के कचरे का ठीक से ठिकाने लगाकर ही कर सकते हैं। यमुना की खाली जमीन को घनी हरी पट्टी बेल्ट में बदल देने के लिए बीज बिखेरने का काम तो बच्चों की कोई भी टोली कभी भी कर सकती है। इस पर कौन रोक लगा सकता है ? जब तक यमुना अपने प्रबल प्रवाह व गुणवत्ता को वापस हासिल नहीं कर लेती, पूजा-पाठ की शेष सामग्री या मूर्तियों का नदी में विसर्जन अनुकूल नहीं है।ऐसी परंपराओं को उलट देने में सरकार कहां बाधक है ? पंचाट का आदेश इसमें सहयोगी है। जे एन यू और राष्ट्रपति भवन ने बारिश का पानी संजोने की कभी नायाब पहल की थी। शेष दिल्ली अभी भी प्रतीक्षा कर रही है। क्यों ? जल मंत्री कपिल मिश्र ने अपने बयान में कहा कि दिल्ली को अपने पानी के लिए न रेणुका बांध चाहिए और न शारदा-यमुना नदी जोङ। कैसे करेंगे ? क्या कोई योजना ज़मीन पर उतरनी शुरु हुई ?

ये प्रश्न हैं। यह सवालपूछी जरूर हो, किंतु जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है। अतः आइये, अब हम न किसी को कोसें, न रोयें… बस! एक दीप जलायें। यमुना का जीवन दीप !! विश्वास कीजिए, एक दिन प्रदूषकों और सरकारों को अवश्य शर्म आयेगी। वे जल-मल-शोधन की विकेन्द्रित प्रणालियों को नकारना बंद करेंगे। प्रदूषक, प्रदूषण मुक्ति में योगदान को प्रेरित व विवश किए जायेंगे। नदी-तालाब-झीलों की भूमि पर अतिक्रमण न हो। उनका भू-उपयोग न बदला जाये। हमंे अनुचित पर निगाह रखनी है; उचित में सहयोग करना है। फिर देखिएगा, एक दिन रिवर-सीवर अलग रखने व प्रदूषण को उसके स्त्रोत पर ही निपटाने की नीति भी आ जायेगी और नदियां अपना प्राकृतिक प्रवाह भी हासिल कर लेंगी। आइये, शुरुआत तो करें; हमें एक अदद रिश्ते की कसम।
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संलग्नक – एक
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यमुना गणित या आंकङों में यमुना
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उद्गम: यमुनोत्री ग्लेशियर

संगम : प्रयागराज, इलाहाबाद

कुल लंबाई: 1376 कि.मी.
( यमुनोत्री से हथिनीकुंड – 172 किमी, हथिनीकुंड से वजीराबाद – 224 किमी, वजीराबाद से ओखला – 22 किमी, ओखला से चंबल संगम, इटावा – 490 किमी, चंबल संगम से गंगा संगम तक – 468 किमी )
जलग्रहण क्षेत्र: 3.45.848 वर्ग किमी

घाटी राज्य : सात
( उत्तराखण्ड, हिमाचल, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश )

सहायक नदियां: 12
( कमल, गिरि, टोंस, असान, सोम, छोटी यमुना, हिण्डन, चंबल, काली, सिंध, केन और बेतवा )

मुख्य नाले: 26
( नाला नंबर-2.8, भूरिया नाला, मथुरा-वृंदावन नाला, आगरा नाला दिल्ली के 22 नाले। दिल्ली नालों के नाम – नजफगढ, मैगजीन रोड, स्वीपर काॅलोनी, खैबरपास, मैटकाॅफ, कुदसिया बाग, मोट, यमुनापार नगरनिगम, मोरी गेट, सिविल मिल, पावर हाउस, मेन नर्सिंग होम, नबंर 14, बारापुला, महारानी बाग, कालकाजी, ओखला, तुगलकाबाद, शाहदरा, सरिता विहार, एल पी जी बाॅटलिंग प्लांट, और तेहखण्ड।)

नहरें: छह
( डाकपत्थर, असान, पश्चिमी यमुना, पूर्वी यमुना, आगरा और गुङगांव नहर )

मौजूदा बंाध/ बैराज: छह
( उद्देश्य: डाकपत्थर और असान से बिजली, हथिनीकुण्ड से सिंचाई, वजीराबाद से पेयजल, आई टी ओ से पावर हाउस और ओखला से आगरा नहर को आपूर्ति )

प्रस्तावित बांध: तीन

मिट्टी के प्रकार: आठ
( 42 फीसदी मिट्टी कछारी, 25.5 मध्यम काली, 15 काली-लाल मिश्रित, 5.5 गहरी काली, 5 लाल-पीली, 4 भूरी पहाङी, 2.5 लाल बलुही और 0.5 फीसदी चूनेदार )

खनिज: नगण्य

भूजल: अधिकतम से न्यूनतम तक
( यमुना घाटी के उत्तर-पूर्व समतल में 15 प्रतिशत क्षेत्र में अच्छा और व्यापक। पश्चिमी और दक्षिण पश्चिमी क्षेत्र के 19 प्रतिशत में सीमित। बुदेलखण्डी भूभाग वाले 4 प्रतिशत में इतना कम कि दोहन की दृष्टि से प्रतिबंधित। )

भूतल: पहाङी, छोटी पहाङी, पठारी और समतल। समुद्र तल से 100 मीटर से 6.320 मीटर ऊंचाई पर अवस्थित।

वर्षा: 130 से 1600 मिमी तक।

वार्षिक जल बहाव: 0.3 मिलियन क्यूबिक मीटर से 100 बिलियन क्यूबिक मीटर तक।

तापमान: 5 से 42 डिग्री तक।

वाष्पीकरण: 250 से 450 मिमी तक।

फसलें: बाजरा-मक्का जैसे कम पानी फसल अधिक पानी पीने वाले धान तक।

सिंचाई हेतु छोङे जाने वाला जल: ताजेवाला से 6 बिलियन क्यूबिक मीटर और ओखला से 2.1 बिलियन क्यूबिक मीटर।
( उक्त मात्रा का मौसमी जलबंटवारा: ताजेवाला से मानसून में 2.8, मानसून बाद 0.9, सर्दी मंे 0.9 और गर्मी मंे 1.9 बिलियन क्यूबिक मीटर। ओखला से मानसून मंे 0.9, मानसून के बाद 0.4, सर्दी में 0.4, गर्मी में 0.4 बिलियन क्यूबिक मीटर। )

भू-उपयोग: अत्यंत व्यवसायिक, कृषि और जनसंख्या दबाव वाला क्षेत्र। यमुना खादर भी अब इसकी चपेट मंे।

प्रदूषण: भारत की सर्वाधिक प्रदूषित नदी का दर्जा।

गुणवत्ता की श्रेणी: यमुनोत्री से आगरा के बीच ’ए’ से ई तक।
( कारण: नाइट्रोजन, पोटेशियम, फासफोरस और बायोमाइडस जैसे कृषि रसायन की मौजूदगी में पिछले 25 वर्षोंं में चार गुना वृद्धि। देहरादून, यमुना नगर, करनाल, सोनीपत, पानीपत, दिल्ली, फरीदाबाद, वल्लभगढ, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बागपत, गाजियाबाद, नोएडा, मथुरा और आगरा घरेलु और औद्योगिक कचरे के मुख्य स्त्रोत। हरियाणा के 22, दिल्ली की 42 और उ. प्र. की 17 फैक्टरियों द्वारा यमुना मंें सीधे तरल कचरा बहाने की रिपोर्ट। )

संबंधित एजेंसियां: घाटी प्रदेशों की सरकारें, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा अन्य संबंधित विभाग; जैसे दिल्ली सरकार का दिल्ली जल बोर्ड, पर्यावरण विभाग, भूमि एवम् भवन विभाग, नगर विकास विभाग, सिचंाई व बाढ नियंत्रण विभाग। भारत सरकार का केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण एवम् वन, नगर विकास एवम् जलसंसाधन मंत्रालय। केन्द्रीय भूजल बोर्ड, केन्द्रीय जल आयोग, ऊपरी यमुना नदी बोर्ड और दिल्ली विकास प्राधिकरण।

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