लेखक परिचय

अरविन्‍द विद्रोही

अरविन्‍द विद्रोही

एक सामाजिक कार्यकर्ता--अरविंद विद्रोही गोरखपुर में जन्म, वर्तमान में बाराबंकी, उत्तर प्रदेश में निवास है। छात्र जीवन में छात्र नेता रहे हैं। वर्तमान में सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक हैं। डेलीन्यूज एक्टिविस्ट समेत इंटरनेट पर लेखन कार्य किया है तथा भूमि अधिग्रहण के खिलाफ मोर्चा लगाया है। अतीत की स्मृति से वर्तमान का भविष्य 1, अतीत की स्मृति से वर्तमान का भविष्य 2 तथा आह शहीदों के नाम से तीन पुस्तकें प्रकाशित। ये तीनों पुस्तकें बाराबंकी के सभी विद्यालयों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को मुफ्त वितरित की गई हैं।

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अरविन्द विद्रोही

डॉ राम मनोहर लोहिया युग दृष्टा थे | समाजवादी विचारो के प्रचारक व आम जनता के हित के तमाम कार्यक्रम देने वाले , सिद्धांतो का प्रतिपादन करने वाले तथा जन संघर्षो को खड़ा करने वाले डॉ लोहिया आम जनता के हित की सरकारों के गठन का प्रयास करते थे और सरकारों पर जन नियंत्रण का प्रभावी काम भी करते थे | डॉ लोहिया के विचारो – सिद्धांतो – संघर्षो की कसौटी पर खरे उतरे बगैर कोई भी समाजवादी सरकार सफल नहीं मानी जा सकती है |

वर्तमान में डॉ लोहिया के विचारो पर १९९२ में बनी समाजवादी पार्टी की उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व में सरकार चल रही है | यह सरकार जनता के विश्वास रूपी मतों से निर्वाचित हुई है | आम जनता ने सुश्री मायावती के नेतृत्व में चल रही तत्कालीन बहुजन समाज पार्टी की सरकार में व्याप्त भ्रस्टाचार , नौकरशाही के दबदबे से त्रस्त आकर बसपा सरकार के खिलाफ सड़क पर लगातार संघर्ष कर रहे समाजवादी कार्यकर्ताओ की मेहनत को देखते हुये बसपा को सत्ता से बेदखल किया | समाजवादी पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र ने बसपा सरकार के भ्रस्टाचार से त्रस्त जनता के साथ साथ बेरोजगार युवाओ को आकर्षित करने में सफलता पाई और सोने पर सुहागे का काम किया था | बसपा सरकार को दुबारा ना आने देने के लिए कृत संकल्पित मतदाताओ के मन को पक्का किया था- क्रांति रथ पर निकले , उम्मीदों की साइकिल पर सवार युवा समाजवादी अखिलेश यादव के जन आकर्षण की छमता और सौम्यता पूर्ण आचरण ने | वर्षो के पश्चात् संघर्ष के बलबूते सत्ता में वापस आए समाजवादी कार्यकर्ताओ की आशा के केंद्र बिंदु बने मुख्य मंत्री अखिलेश यादव को अब समाजवादी पुरोधा डॉ राम मनोहर लोहिया की बातों का पुनः स्मरण करना होगा | डॉ लोहिया ने वर्षो पहले ही चिंता व्यक्त करी थी कि — किसी भी बड़े आन्दोलन में एक अजीब तरह की वाहियात चीज या मोड़ बन जाया करता है | एक तरफ वे लोग कि जो आन्दोलन के उद्देशों के लिए तकलीफ उठाते है , दूसरी तरफ वे लोग जो आन्दोलन के सफल होने के बाद उसके हुकुमती कम-काज को चलते है | और आप याद रखना कि ये संसार के इतिहास में हमेशा ही हुआ है | लेकिन इतना बुरी तरह से नहीं हुआ कभी जितना कि हिंदुस्तान में हुआ है | और मुझे खतरा लगता है कि कही सोशलिस्ट पार्टी कि हुकूमत में भी ऐसा ना हो जाये कि लड़ने वालो का तो एक गिरोह बने और जब हुकूमत का काम चलाने का वक़्त आए तब दूसरा गिरोह आ जाये |

समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्व काल की बातो पर चर्चा के बजाये वर्तमान समाजवादी सरकार के द्वारा अल्प काल में लिए गये फैसलों पर निष्पक्ष नज़र डालने से उम्मीदों की साइकिल की रफ़्तार धीमी , पकड़ कमजोर और दिशा गंतव्य से अलग जाती दिखती है | समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने नव गठित सरकार को काम करने के लिए ६ माह का समय देने और उसके पश्चात् काम काज का आकलन करने की बात करी थी और अपने आकलन में शत प्रतिशत सफल सरकार बताया था | सपा मुखिया ने हालिया संपन्न विधान सभा चुनाव में कार्यकर्ताओ से कहा था कि सरकार बनने के पश्चात् उनके सम्मान में कोई कसर नहीं रखी जाएगी और इस बात को सरकार गठन के पश्चात् भी दोहराया गया | आम जनता की बात दीगर है, आज समाजवादी पार्टी का निष्ठावान कार्यकर्ता भी हताशा के दौर में पहुच चुका है , उसे लोकसभा चुनावो में जनता के बीच दुबारा मत मांगने किन उब्लाब्धियो के बूते जाया जाये यह समझ नहीं आ रहा है | बेरोजगारी भत्ते , लैपटॉप वितरण आदि में पाबंदियो का सवाल कैसे देना है यह समाजवादी कार्यकर्ताओं को समझ नहीं आ रहा है | कानून व्यवस्था और नौकरशाही दोनों बदहाल है , ये अखिलेश सरकार की प्राथमिकताओ में होने चाहिए | सरकार के फैसले जाने अनजाने उत्तर प्रदेश की सत्ता से बेदखल हो चुकी बहुजन समाज पार्टी के जनाधार को पुख्ता करने का काम कर रहे है | बिगड़ी कानून व्यवस्था के चलते और नौकरशाही के अपने ढर्रे के चलते आम जनों को अब बहुजन समाज पार्टी का शासन काल याद आ रहा है जिसमे प्रशासनिक नियंत्रण – कानून व्यवश्ता चुस्त- दुरुस्त रहती थी |

डॉ लोहिया महान समाजवादी विचारक थे | उनके विचारो – सिद्धांतो का अनुपालन ना करने वाला समाजवादी कैसे हो सकता है ? भारत की विधान सभाओ और संसद का लोकतंत्र की गरिमा को बढ़ाने के बजाये सत्ताधारी दल और उसके बड़े नेता के पिछलग्गू बनने की प्रवृत्ति से उनको तकलीफ थी | सार्वजनिक जीवन में बढती बेईमानी और स्वार्थवादिता को लेकर डॉ लोहिया के मन में ग्लानि होती थी | नेहरु और कांग्रेस को आजाद भारत में व्याप्त सभी बुराइयों की जड़ मानने वाले डॉ लोहिया ने इसको उखाड़ने के लिए गैर कांग्रेस वाद की नीति अपनाई थी | संसद और संसद के बाहर डॉ लोहिया और उनके साथियो ने देश को गरम किया और १९६७ के चुनावो में कांग्रेस को ८ राज्यों में पराजित किया | डॉ लोहिया की इच्छा थी कि राजनीति में गति आए , कांग्रेस का एकाधिकार समाप्त हो , राजनीतिक दल कार्यक्रम अभिमुख बने | डॉ लोहिया ने अपनी सरकारों को समयबद्ध कार्यक्रम और उनको लागु करने के लिए ६ माह का समय दिया था | जय प्रकाश नारायण से साफ तौर पर डॉ लोहिया ने कहा था , — मैं सरकार का आदमी नहीं हूँ , इसलिए मुझे दिलचस्पी नहीं है कि सरकार क्या करती है | अगर वह ६ महीने कुछ नहीं करती , कुछ ऐसा नहीं करती कि जिससे देश का मन उछले तो मैं इस सरकार को गिराने की मुहिम शुरू करूँगा | इसके पहले १९५४ में भी मानव प्राणों का मूल्य सत्ता से अधिक मानने वाले डॉ लोहिया जो कि पुलिस के द्वारा भीड़ पर बर्बर गोलीबारी के विरुद्ध रहते थे , ने आम जन हित के सवाल पर अपनी पार्टी की सरकार को घेरा था और वो सरकार चल नहो सकी | १९५४ में ट्रावनकोर कोचीन वर्तमान में केरल में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नेता पट्टम थानू पिल्लै मुख्य मंत्री थे | वहा पुलिस की गोलीबारी में अनेको लोग मारे गये , नैनी जेल में बंद डॉ लोहिया ने अपनी ही सरकार का इस्तीफा माँगा | इस मुद्दे पर पार्टी टूटी , डॉ लोहिया ने कहा था – सुधरो या टूटो | कुछ माह पश्चात् सरकार भी गिरी | सत्ता को जनता के हित के लिए उपयोगी मानने वाले डॉ लोहिया के कार्यक्रमों व सिद्धांतो पर दृष्टि डालने और उसका अनुपालन करने का काम समाजवादी सोच की सरकार की प्राथमिकता में होना ही चाहिए |

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