लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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आप की नमाज में ”नम” धातु, है, ”देव वाणी” का।

और ”आमीन” हमारे ॐ का अपभ्रंश है।

”बिरादर” आपका, हमारा ”भ्रातर” है।

”कारवाई” आपकी, हमारी ”कार्यवाही” है।

मोहबत में भी मोह (प्रेम) भी तो, उधार हमारा है।

मक्का करते ही हो ना प्रदक्षिणा,

और काबा का पत्थर शालिग्राम है।

”मस्ज़िद” में ”मस्ज” धातु यह मज्जन है।

”धोकर साफ़ करने” के अर्थ वाला,

प्रवेश पर ”वज़ु” करते ही हो ना?

माँ को जब पुकारते हो ”अम्मा”

वह ”अम्बा” भी है, देव वाणी का,

”अम्बा माता”

तो क्या माँ को अम्मा पुकारना बंद करोगे?

फिर, क्यों डरते हो? इस वतन को , वंदन करते?

क्यों डरते हो, ”वन्दे मातरम” कहते?

हम मरेंगे, तो राख हो जाएंगे।

जल जाएंगे, खाक़ हो जाएंगे।

ऊड जाएंगे हवाओ में, चहुं ओर फैल जाएंगे।

अथवा जल में बह जाएंगे।

आप तो इस धरती में गड जाओगे,

युगो युगों तक,

कयामत तक,

चैन की नींद सोओगे।

जिस धरती में सोओगे,

दाना, पानी, आसरा ले ज़िंदगी जियोगे?

???????? क्या क्या कहे???????

जिस डाल पर बांधा घोंसला ?

उसी को काटने वाले को क्या कहोगे?

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15 Comments on "डॉ. मधुसूदन की कविता/ बुखारी जी से…"

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डॉ वेद व्यथित
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डॉ वेद व्यथित

बन्धु इन्हें सम्भवत: वहां भी चैन यानि विश्राम नही मिलेगा क्यों किवहन भी ये कयामत की प्रतीक्षा में ही बैचेन रहेंगे

डॉ. मधुसूदन
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डॉ. राजेश जी कपूर, आप की पंक्तियां अच्छी लगी। पर डर रहा हूं, कि सदा इन अपेक्षाओं पर परखा गया तो? मानवीय भूलें हो सकती है। आप दर्शाते रहिए।

डॉ. मधुसूदन
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सभी पाठकों का नाम लिए बिना धन्यवाद करता हूं। आप सभी के विचारों को पढा।सभी, मुझे भी विचार करने पर विवश करते हैं। ===>यह हमारे देव वाणी की गरिमा है। संसार भरमें ऐसी भाषा नहीं, और देवनागरी जैसी लिपि नहीं। लिख ही, रहा था, तो विचार आया, कि ====>नमाज पढने का आसन भी तो “वज्रासन” है। जब झुक कर सर नंवाते है, तो “शशांकासन” (खरगोश) बन जाता है। सोचा आपको अवगत कराउं।

SANJAY
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आपने हमारे मुंह की बात छीन ली। बहुत सुन्दर और तथ्यपरक कविता। इन बुखारियों की आंख कब खुलेगी? आप द्वारा दिए गए शोधपरक तथ्यों को पढ़कर मन प्रसन्न हो गया। आपके लेख भी बहुत उच्च कोटि के होते हैं। मैं आपका नियमित पाठक हूं। बस, आप लिखते रहिए और जागरण करते रहिए। शुभकामनाएं!

himanshu kaushik
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aap kitna bhi inko sach bta do par sach ke pass se nikal jayege lekin kahavat hai na ki ,”patnala vahi girega”.or usme bhi bukhari sareekhe ho to phir kya ho sakta hai.ishwar sadbudhi de.Om.

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