लेखक परिचय

सूर्यकांत बाली

सूर्यकांत बाली

जाने माने स्‍तंभकार सूर्यकांत जी 'नवभारत टाइम्‍स' और 'राज सरोकार' पत्रिका के संपादक रह चुके हैं।

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सूर्यकान्त बाली

हर पुरुष प्रधान इतिहासकारों की जमात के पास पूरा मौका द्रौपदी पर आरोप लगाने का था कि वह पांच पुरुषों की पत्नी है और इसलिए दुश्चरित्र है। पर क्या इतिहास द्रौपदी पर ऐसा कोई ओछा आरोप लगाने का दुस्साहस कर सका?

द्रोपदी को जुए में हार जाने का क्षुद्र और पाप कर्म करने के बाद युधिष्ठिर की तो बोलती बन्द हो गई। धृतराष्ट्र एवं दुर्योधन की सेवकाई में खड़े भीष्म, द्रोण आदि के पसीने तो छूट रहे थे, पर मुंह नहीं खुल रहा था। द्रौपदी को जीत लेने के मद में जब दुर्योधन ने विदुर को द्रौपदी को राजसभा में लाने का आदेश दिया तो दुर्योधन को अभूतपूर्व फटकार सुनाने के बाद महात्मा विदुर ने एक सवाल भी खड़ा कर दिया ‘अनीशेन हि राज्ञैषा पणे न्यस्ता’ (सभापर्व 66.4) अर्थात् राजा युधिष्ठिर ने खुद को जुए में हारकर द्रौपदी को दांव पर लगाया है, तो क्या हारा हुआ आदमी किसी को दांव पर लगा सकता है?

विदुर ने क्या कहा, इसकी द्रौपदी को कोई खबर नहीं थी। पर जो सवाल विदुर ने किया, ठीक वही सवाल द्रौपदी का भी था। विदुर द्वारा द्रौपदी को राजसभा में लाने से साफ मना कर देने पर दुर्योधन ने अपने एक दूत प्रातिकामी को द्रौपदी को राजसभा में लाने का आदेश दिया। प्रातिकामी तीन बार गया परन्तु द्रौपदी ने हर बार उसे एक-एक सवाल पूछकर वापस भेज दिया।

पहली बार का सवाल था, ‘जाकर उस जुआरी महाराज से पूछो कि वे पहले खुद हारे थे या पहले मुझे हारे थे?’ युधिष्ठिर कोई उत्तर नहीं भिजवा पाए। दूसरी बार सवाल कुरुवंशियों से था, ‘कुरुवंशियों से जाकर पूछो कि मुझे क्या करना चाहिए? वे जैसा आदेश देंगे, मैं वैसा करूंगी।’ सवाल सीधा धृतराष्ट्र और भीष्म सरीखे कुरुवंशियों से था और आदेश भी उन्हीं से मांगा जा रहा था, पर वे सब सिर नीचा किए रहे और उनके मुंह सिले रहे।

बस, एक सन्देश युधिष्ठिर का गया कि अगर तुम रजस्वला और एकवस्त्र होने के बावजूद राजसभा में आओगी तो सभी सभासद मन ही मन दुर्योधन की निन्दा करेंगे। प्रातिकामी तीसरी बार फिर द्रौपदी के पास गया तो उतावले दुर्योधन ने इस बीच दुश्शासन को द्रौपदी को लाने को भेज दिया और उसके बाद जो दुर्घटित घटा वह हर भारतवासी जानता है।

हम संकेत विदुर और द्रौपदी द्वारा पूछे गए सवालों की ओर कर रहे थे। दुःशासन द्वारा बालों से घसीटी जाती हुई और निर्वस्त्र की जाती हुई द्रौपदी ने राजसभा में लाए जाने के बाद अपनी इस दुरावस्था में भी वही सवाल दूसरे शब्दों में पूछा जो विदुर ने पूछा था, ‘इमं प्रश्नमिमे ब्रूत सर्व एव सभासद:, जितां वाप्यजितां वा मां मन्यध्वे सर्वभूमिपा:?’ (सभापर्व 67.41) अर्थात ‘सारे राजन्य लोग जो यहां बैठे हैं मुझे बताएं। मेरे इस सवाल का जवाब दें कि मैं (धर्म के अनुसार) जीती गई हूं या नहीं?’ भीष्म बोले कि धर्म का स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण मैं कुछ बता नहीं सकता। बाकी कोई कुछ बोला ही नहीं।

सभी अपने-अपने मुंह पर धृतराष्ट्र और दुर्योधन से मिलने वाले वेतन की पट्टी बांधे बैठे रहे। बेशक महाभारतकार ने और इतिहास ने धर्मराज का खिताब महाराज युधिष्ठिर को दे दिया हो, पर धर्म पर जैसा सटीक आचरण द्रौपदी ने आजीवन किया उसकी कोई दूसरी मिसाल पूरे महाभारत में हमें नहीं मिलती।

युधिष्ठिर के जीवन में फिर भी एक घटना ऐसी घटी कि उन्हें भी परोक्ष रूप से झूठ का सहारा लेना पड़ा जब उन्होंने यह जानते हुए भी कि द्रोणपुत्र अश्वत्थामा जीवित हैं और अश्वत्थामा नामक हाथी ही मरा है, झूठ बोल दिया कि ‘पता नहीं हाथी मरा है या मनुष्य, पर अश्वत्थामा मारा गया है।’ इसी कथन पर द्रोण ने हथियार फेंक दिए और द्रुपद-पुत्र धृष्टद्युम्न के हाथों मृत्यु का वरण किया। किन्तु द्रौपदी पर तो आप ऐसे किसी छोटे से अधर्माचरण का भी आरोप नहीं लगा सकते।

एक दो उदाहरणों की परीक्षा कर ली जाए। अपने स्वयंवर में द्रौपदी ने कर्ण को मछली की आंख पर बाण का निशाना लगाने से रोक कर ठीक किया या गलत? बेशक कर्ण को मौका नहीं दिया गया और कह सकते हैं कि उससे अन्याय हुआ। पर हमें नहीं भूलना चाहिए कि छत पर लटकती, झूलती उस यंत्र-मछली की आंख फोड़ने की शर्त बेशक पिता द्रुपद ने रखी थी, पर विवाह तो द्रौपदी का होना था। स्वयंवर तो द्रौपदी रचा रही थी। अपना वर तो स्वयं द्रौपदी को चुनना था। चाहे कारण तब की सामाजिक प्रथाएं रही हों या कोई और, स्वयं वर चुनने का अधिकार-प्राप्त द्रौपदी को हक था कि वह अपनी शर्त पूरा करने का मौका किसे दे और किसे न दे। कर्ण को मना करने वाली द्रौपदी पर आज तक इतिहास आरोप नहीं लगा पाया कि उसने वैसा कर कोई गलत काम किया।

हर पुरुष प्रधान इतिहासकारों की जमात के पास पूरा मौका द्रौपदी पर आरोप लगाने का था कि वह पांच पुरुषों की पत्नी है और इसलिए दुश्चरित्र है। पर क्या इतिहास द्रौपदी पर ऐसा कोई ओछा आरोप लगाने का दुस्साहस कर सका? बल्कि यहां तो माजरा ही अलग है। द्रौपदी का पांचों पाण्डवों से विवाह हो या न हो, इस पर कुन्ती विस्मित है, धर्मराज कहे जाने वाले युधिष्ठिर चिन्तित हैं और पिता द्रुपद किंकर्तव्यविमूढ़ हैं। पर द्रौपदी? उसके चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं, उसके व्यवहार में कोई उतावलापन नहीं और आगे चलकर पांच पतियों की अकेली पत्नी के रूप में उस पर किसी को कोई आपत्ति तक नहीं।

बल्कि पांच पतियों की अकेली पत्नी के रूप में द्रौपदी का आचरण् इतना आदर्श और अनुकरणीय माना गया, तभी तो महाभारतकार ने उसके इस पत्नी रूप को दैवी गरिमा प्रदान कर दी और कई ऐसी कथाओं-उपकथाओं की सृष्टि अपने प्रबंधकाव्य में की जिससे द्रौपदी का जीवन दिव्य वरदानों का परिणाम नजर आए। जैसे कुन्ती के प्रणीत पुत्रों को देवताओं का आशीर्वाद बताकर गौरव से भर दिया गया, वैसे ही द्रौपदी के पांच पुरुषों (बेशक पांचों भाइयों) की पत्नी होने को भी तपस्या और वरदान का नतीजा बताकर उसे आभा से भर दिया गया। महाभारतकार और इतिहास का द्रौपदी के प्रति इससे बड़ा श्रध्दावदान और क्या हो सकता है?

बेशक महाप्रस्थानिक पर्व (अध्याय 2, श्लोक 6) में युधिष्ठिर फतवा-सा दे देते हैं कि चूंकि द्रौपदी का अर्जुन से विशेष पक्षपात था, इसलिए वह सबसे पहले मृत्यु को प्राप्त हो रही है। पर न तो महाभारतकार और न ही जनसामान्य ने इस युधिष्ठिर वाणी को कोई मान्यता दी है। और अगर पक्षपात था भी तो वह स्वाभाविक और धर्मपूर्ण था और स्वयंवर- कथा का जानकार हर भारतवासी इसके पीछे का रहस्य जानता है कि अर्जुन के कारण ही द्रौपदी पांचों भाइयों की पत्नी बन सकी थी।

बाल्यकाल में मिले जिस प्रशिक्षण के कारण द्रौपदी और धृष्टद्युम्न का जैसा प्रतिरोधी चरित्र बना, क्या उसमें भी हमें अन्तर नहीं देखना चाहिए? धृष्टद्युम्न तो इस हद तक चला गया कि उसने निहत्थे द्रोण का सिर अपनी तलवार से काट दिया। और जब अर्जुन, सात्यकि आदि ने उसके इस कठोर कर्म की भर्त्सना की तो द्रुपदपुत्र ने अपने कृत्य का पुरजोर समर्थन किया। उसके कुछ तर्क तो दिमाग को हिला देने वाले हैं। मसलन उसका यह सवाल (द्रोण् पर्व, 197, 24-26) कि यज्ञ, अध्यापन आदि कर्म कभी न करने वाले द्रोण को किस आधार पर ब्राह्मण जैसा मान लिया जाए? पर अपने भाई के इस तरह के मानस के बावजूद, अपने चीरहरण के समय द्रोण के चुप रह जाने के बावजूद, अभिमन्यु को घेरकर की गई हत्या में शामिल सात महारथियों में द्रोण के शामिल होने के बावजूद द्रौपदी ने द्रोणाचार्य का हमेशा सम्मान रखा और अपने पतियों का गुरु होने का आदर उन्हें हमेशा दिया।

उसने गुरुपुत्र होने के कारण ही उस अश्वत्थामा का भी वध नहीं होने दिया, जिसने उसके पांच पुत्रों की सोते में हत्या कर दी थी। तुलना करेंगे तो ही द्रौपदी के चरित्र की विलक्षणता समझ में आएगी। भाई धृष्टद्युम्न ने चारों ओर से अपने लिए बरसती धिक्कार की परवाह न करके निहत्थे द्रोण को मार डाला, क्योंकि उस पर वैसा न करने का कोई दबाव नहीं था। परन्तु द्रौपदी ने इस हद तक नैतिक बंधन में खुद को बांध लिया कि उसने न केवल वह आदर द्रोण को दिया, बल्कि द्रोण पुत्र अश्वत्थामा को क्षमा करने में भी द्रौपदी ने अपने इसी नैतिक शिखर का परिचय दिया। जब भी मौका मिला, द्रौपदी ने अपने पतियों को पुरुषार्थ से भर देने का कर्तव्य निभाया, बेशक पूरे धैर्यपूर्वक वह उनके साथ वनवास और अज्ञातवास के कष्ट भी भोगती रही।

अगर युधिष्ठिर की बात ही मान ली जाए कि द्रौपदी का अपने पांचों पतियों में से अर्जुन से विशेष अनुराग था, तब तो इसे हम द्रौपदी का परम बलिदान माने बिना नहीं रह सकते कि वनवास के दौरान जब वेदव्यास ने अर्जुन को तपस्या करने को कहा तो अर्जुन के बिना न रह सकने वाली द्रौपदी न उसे उग्र तपस्या की प्रेरणा दी और भरोसा दिलाया कि वह उसके बिना भी यथाकिंचित रह लेगी (वन पर्व, अध्याय37)

द्रौपदी के अद्वितीय नारी चरित्र के एक रूप की चर्चा हम लोगों के बीच बहुत कम होती है कि वह कृष्ण की सखी थी। द्रौपदी का एक नाम कृष्णा भी है। वह सांवली थी, इसलिए भी और कृष्ण की सखी थी, इसलिए भी। पर आगे चलकर कर्मकाण्डी लोगों ने कृष्ण की बहन बताकर द्रौपदी को कृष्णा प्रचारित करवा दिया। ऐसा मानस द्रौपदी के अद्वितीय चरित्र को भला क्या समझेगा?

पर ऐसा मानने वालों को आप चाहें तो उंगलियों पर गिन सकते हैं। अन्यथा इस देश में द्रौपदी का जो सम्मान हुआ है, उसे कृपया उस प्रसंग में देखिए जो हमारे मानस में चीरहरण के नाम से दर्ज है। द्रौपदी ने आर्त होकर पुकारा। माधव, माधव कहा और कृष्ण ने उसके वस्त्र को अनन्त आकार देकर दुश्शासन के पसीने छुड़वा दिए। यह घटना घटी हो या न घटी हो, पर हमने उसे बनाया और माना है। द्रौपदी के अद्वितीय नारी चरित्र को मान्यता देने का यह शानदार काम इस देश ने महाभारतकार के जरिए किया है।(भारतीय पक्ष)

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