लेखक परिचय

डा.राज सक्सेना

डा.राज सक्सेना

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chickenडा.राज सक्सेना
वह सुरा – पात्र  दो दयानिधे,जब मूड बने तब भर जाए |
है आठ लार्ज, कोटा अपना,बिन – मांगे  पूरा कर जाए |
प्रातः   उठते ही हैम – चिकन,
फ्राइड फिश से हो ब्रेकफास्ट |
हो    मट्न लंच में हे स्वामी,
मैं बटरचिकन से करूं लास्ट |
मिलजाय डिनर बिरयानी का,संग चिकनसूप भरकर आए |
है आठ लार्ज,   कोटा अपना,बिन मांगे,     पूरा कर जाए |
हो आमलेट से, दिवस शुरू,
तीखे कैचप के  साथ प्रभो |
फ्राईफिश, सींक कवाब मिले,
जब करूं  लंच मैं महाप्रभो |
बस  मुर्गतन्दूरी, मटन – करी,नित नैक्स्टडिनर लेकर आए |
है आठ लार्ज,   कोटा अपना,बिन  मांगे  पूरा    कर जाए |
कीमे   से  भरा  पराठा      भी,
मक्खन के साथ मिले स्वामी |
हर  लंच – डिनर में  नान-वैज्-,
की तीन डिशेज कर दे स्वामी |
फ्राइडलीवर और किडनी भी,दारू संग चखने तर आए |
है आठ लार्ज कोटा अपना,बिन मांगे,  पूरा कर जाए |
होजाय भले कैंसर फिर भी,
मैं नहीं डरूं वह शक्ति  दे |
अगड़्म्-बगड़म बस नानवैज,
दे दे मुझको मत भक्ति दे |
हो मुर्ग मुसल्ल्म अंत समय,उदरस्थ करे और तर जाए |
अंतिम घड़ियों में आठ लार्ज ,कवि’राज’पिये और मर जाए |
वह, सुरापात्र  दो     दयानिधे,
               जब मूड,  बने तब भर जाए |…………….

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