लेखक परिचय

हर्षवर्धन पान्डे

हर्षवर्धन पान्डे

लेखक युवा पत्रकार और शोध छात्र हैं

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हर्षवर्धन पाण्डे
फ्रांस की राजधानी पेरिस में हुए आतंकवादी हमले ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है | ज्यादा समय नहीं बीता जब साल की शुरुवात में ही एक विवादित कार्टून प्रकाशित करने की सजा के तौर पर हमलावरों ने फ्रांस की राजधानी पेरिस में एक दर्जन से अधिक लोगों की हत्या कर दी थी | उस हमले का सिलसिला तीन दिनों तक पेरिस के विभिन्न हिस्सों में चलता रहा लेकिन इस बार का हमला पूरी तरह सुनियोजित रहा और इसकी तुलना अगर भारत के मुंबई 26/11 और अमरीका के 9/11 से की जा रही है तो इसकी ख़ास वजहें हैं | असल में जिस रणनीति के साथ आतंकियों ने इसे अंजाम दिया और हमले के जो तौर तरीके अपनाए वह ट्वीन टावर, मुंबई सरीखे ही रहे जहाँ आतंकियों ने भीड़ भाड़ वाले स्थानों को अपना निशाना बनाया | धमाके कितने भीषण रहे होंगे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आतंकी हमलों के बाद स्टेट डी फ्रांस स्टेडियम में भारी अफरातफरी मच गई | फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांद भी इसी स्टेडियम में बैठकर फ़्रांस और जर्मनी के बीच खेले जा रहे फुटबाल मैच का आनंद ले रहे थे | शुक्र रहा सुरक्षाकर्मियों का जिन्होंने हमले के बाद उन्हें सकुशल बाहर निकालने में सफलता पाई लेकिन असल निशाना तो बैताक्ला थियेटर था जहाँ पर 1500 से ज्यादा लोगों की भारी भीड़ अमरीकी रॉक बैंड की थाप पर ना केवल थिरक रही थी बल्कि सुगम संध्या का आनंद लेने पहुंची थी लेकिन किसे पता था घंटे भर बीतने के बाद चीख , पुकार और फायरिंग के बीच वहां पर खून का खुला खेल शुरू हो जाएगा और लोगों को सुरक्षित भागने के लिए जमीन के ऊपर पड़ी लाशो से गुजारना पड़ेगा | यही नहीं आतंकियों ने पेरिस में बर्बरतापूर्वक निहत्थे लोगों पर गोलियां बरसाई और जोर जोर से अल्ला हो अकबर के नारे लगाने के साथ ही भागते मासूमों पर बारूद भी फेंका | आतंकियों के हौंसले किस कदर बुलंद थे यह इस बात से समझा जा सकता है कि उन्होंने सड़क से लेकर स्टेडियम , कैफे से लेकर कंसर्ट हाल तक को अपना निशाना एक सुनियोजित रणनीति के तहत बनाया |

पेरिस को निशाना बनाकर आतंकियों ने अपने खतरनाक मंसूबे पूरी दुनिया के सामने जाहिर कर दिए हैं | पेरिस हमले की जिम्मेदारी खतरनाक संगठन आई एस आई एस ने ली है और अब पूरे यूरोप के सामने संकट के बादल मडरा गए हैं | फ्रांस में हुए इन भीषण धमाकों ने दूसरे विश्वयुद्ध की यादें ताजा कर दी हैं जहाँ पूरा देश आपातकाल के साये में जी रहा है | आम आदमी अभी भी दहशत के साये में जी रहा है तो पुलिस भी सघन तलाशी अभियान चलाये हुए है जहाँ उसकी पकड़ में कुछ लोग आये हैं वहीँ 8 आतंकी मौके पर ही ढेर हो चुके हैं | इस घटना के बाद देश की सीमाएं पूरी तरह सील हैं तो पूरे देश में कर्फ्यू सरीखी स्थितियां चरम पर पहुँच चुकी हैं |

हालंकि इस हमले के तुरंत बाद फ्रांस सरकार हरकत में आ गई और उसके राष्ट्रपति ओलांद ने आई एस आई एस को सबक सिखाने के लिए सीरिया के रक्का में हवाई ताबड़तोड़ कार्यवाहियों को अंजाम दिया लेकिन हमले से एक बात साफ़ हो गई है आई एस आई एस की चुनौतियों से पार पाना दुनिया के लिए अभी कोई आसान काम नहीं है क्युकि आज वह अपने साथ बड़े लडाकाओं की भारी भरकम फ़ौज न केवल खड़ी कर चुका है बल्कि अपने साथ अत्याधुनिक हथियारों का बड़ा जखीरा भी रखे हुए है | ख़ास बात यह है कि आई एस आई एस की ताकत को बढाने में कई देश न केवल उसे फंडिंग कर रहे हैं बल्कि युवाओं को इस्लाम के नाम पर उकसाया जा रहा है | आतंक के इस रास्ते पर चलने वाले युवाओं को मिलने वाली मुहमांगी रकम भी उन्हें आतंकवाद की राह पकड़ने को मजबूर कर रही है | पेरिस के इन हमलों के पीछे ऐसे युवाओं की भूमिका सामने आ रही है जिनकी उम्र 30 बरस से कम है जो यह बताने के लिए काफी है आई एस आई एस पूरी दुनिया से ऐसे युवाओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिशों में सफल रहा है | फ्रांस की ही बात की जाए तो उसकी गिनती हाल के वर्षो में ऐसे देश के रूप में होने लगी है जहाँ के युवा आई एस में शामिल होने के लिए सीरिया को अपना आशियाना बनाये हुए हैं और कट्टरता का नकाब ओढे हुए हैं | ऐसे युवा आई एस के साथ मिलकर पूरी दुनिया में खूनी खेल खेलने के लिए तैयार बैठे दिखाई देते हैं | फ्रांस की सरकार सीरिया की असद सरकार के खिलाफ है और आई एस आई एस को नेस्तनाबूद करने के प्रयासों में अमरीका की गोद में बैठकर आतंकियों के खिलाफ खेल रही है | पिछले कुछ समय से फ़्रांस जेहादी आतंकवाद के खिलाफ जिस तरीके से एकजुट होकर मोर्चा खोले हुए है शायद इसी बदले की भावना से आतंकवादियों ने पेरिस को निशाना बनाया |
अमरीका के नेतृत्व में कई यूरोपीय देश की सेनायें इस समय इन आतंकवादियों के खिलाफ मिलजुलकर लड़ रही हैं लेकिन अभी तक आई एस आई एस के साम्राज्य को तहस नहस नहीं किया जा सका है जो एक बड़ी चिंता का विषय इस समय बना हुआ है | आई एस आई एस ने पेरिस में सुनियोजित तरीके से हमलों को अंजाम दिया और समय भी ऐसा चुना जब शहर में भीड़ भाड अधिक रहती है | आतंकियों के हमलों से फ्रांस के नागरिक सहमे नजर आते हैं | इन हमलों में सवा सौ से अधिक लोग अपनी जान गवा चुके हैं वहीँ ढाई सौ से अधिक लोग घायल हुए हैं | फ्रांस के लिए यह बरस सबसे बुरा साबित हुआ है | नए साल की शुरुआत जहाँ फ्रांस की मशहूर व्यंग्य पत्रिका चार्ली एब्दो के कार्यालय से हुई जिसमें दो बंदूकधारियों ने पत्रिका के संपादक स्टीफन सहित 12 लोगों की हत्या कर दी थी वहीँ शहर के विभिन्न हमलों में कुछ लोग भी मारे गए थे लेकिन वो हमला हाल के हमलों जैसा भीषण नहीं था | अभी के हालत आम इंसान के मन में एक अजीब सा डर पैदा कर देते हैं | आतंकियों की कोशिश पेरिस में व्यापक नुकसान करने की थी और एक आतंकी की पहचान जिस तरह फ़्रांसीसी नागरिक के रूप में हुई है उसने पहली बार झटके में कई सवालों को खड़ा किया है और यह सोचने पर मजबूर किया है किया आतंकी स्लीपर सेल के आसरे खूनी खेल खेलने का ताना बाना बुनने में लगे हुए हैं जहाँ स्थानीय लोगों को कट्टरपंथी बनाने में आमादा हैं | एक आतंकी के पास से मिले सीरयाई पासपोर्ट से यह सवाल भी खड़ा हुआ है कि पेरिस हमले के आतंकियों के तार सीधे सीरिया से जुड़ते चले जा रहे हैं जहाँ उन्हें आई एस आई एस ने न केवल ट्रेनिंग दी बल्कि कट्टरपंथी बनने को मजबूर कर दिया | फ्रांस की सेना जिस तरह सरिया और ईराक में अमरीकी सरकार के साथ मिलकर कदमताल कर रही है उससे यह सवाल पेचीदा हो चला है कहीं आतंकवादियों ने यह सब जानकर फ़्रांस को अपना निशाना तो नहीं बनाया हुआ है | असल में इसका सबसे बड़ा कारण यही है | साथ ही फ्रांस में यूरोपियन देशों की सबसे अधिक मुस्लिम आबादी रहती है और यूरोप के इस गेटवे तक आसानी से पहुंचा जा सकता है शायद इसी को ध्यान में रखते हुए आतंकवादियों ने पेरिस को चुना जिससे पूरे यूरोप को धमकाया जा सके | इस आतंकी हमले का सीधा प्रभाव अब शायद शरणार्थियों के संकट को बढ़ाएगा | फ्रांस यूरोप के उन देशो में शामिल है जिन्होंने सीरिया के संकट के चलते कई शरणार्थियों को शरण देने पर रजामंदी जताई थी लेकिन संभवतया इस संकट के बाद अब मुस्लिमों को शरण देने में अपने कदम फ्रांस की सरकार को शायद पीछे खींचने पड़े क्युकि शरणार्थियों के वेश मे आई एस अपने लडाके फ़्रांस भेजे जो कुछ समय बीतने के बाद इसी तरह का आतंक का खूनी खेल दुबारा शुरू कर दें क्युकि अब आतंक का नया चेहरा आई एस बन रहा है जहाँ वह स्लीपर सेल के मदद से बड़ी कार्यवाहियों को अंजाम देने में लगा हुआ है | चार्ली एब्दों पर हमले के बाद आई एस ने फ्रांस के खिलाफ फिर से बड़े हमलों की चेतावनियाँ भी जारी की थी लेकिन फ़्रांस की सरकार ने इसे हल्के में लिया जिसका परिणाम सबके सामने है | पूरी मानवता आज पेरिस के हमलों से शर्मसार हुई है |

पेरिस हमलों की पूरी दुनिया ने एकसुर में निंदा की है और तुर्की के अन्तालिया में जी 20 देशों के सम्मेलन में भी पेरिस हमलों की छाया साफ देखी गई | वहां पर सभी देशों ने कड़े शब्दों में इन हमलों की ना केवल निंदा की बल्कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को मिल जुलकर लड़ने का एलान किया है लेकिन मात्र एलान भर से कुछ नहीं होना है क्युकि आतंकवाद से लड़ने की नीति किसी भी देश के पास नहीं है | आज सभी देशों को चाहिए वह एकजुट होकर आतंक के खिलाफ बड़ी लड़ाई लडने के लिए खुद से तैयारी करें | अमरीका की बात करें तो जी 20 में ओबामा ने भी खुलकर आई एस आई एस के खिलाफ कार्यवाही की बातें दोहराई हैं लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि पूरी दुनिया आज अमरीका की गलत नीतियों का परिणाम भोग रही है | ईराक से लेकर अफगानिस्तान और सीरिया से लेकर अरब देशों में काम कर रही सरकारों को अपदस्त करने का खुला खेल जो अमरीकी सरकारों के दौर में चला है उसके परिणाम पेरिस सरीखे हमलों के रूप में हमारे सामने आ रहे हैं जहाँ बेगुनाह नागरिक मारे जा रहे हैं | कभी मास्को पर हमला हो जाता है तो कभी विमान शर्म अल शेख से उड़ान भरने के कुछ पलों बाद दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है | कभी चार्ली एब्दो के दफ्तर को निशाना बनाया जाता है तो कभी कंसर्ट हाल में एकत्रित मासूमों पर लोग बंधक बनाकर मारे जा रहे हैं | एक लम्बे अरसे से अक्सर बड़े बड़े मंचो से सभी देश आतंकवादी ताकतों के खिलाफ एकजुट होने की बातें करते नहीं थकते लेकिन उसके बाद इन बैठकों का नतीजा ढाक के तीन पात सरीखा ही रहता है | आतंक का कोई रंग और मजहब नहीं होता लेकिन राजनीति और मुल्कों के टकराव के रास्तों के रंग ने आतंक के चेहरे को स्याह बना डाला है | हिंसा का खूनी खेल खेलने वाले कुछ आतंकी संगठन कुछ देशों के लिए जहाँ आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे हैं वहीँ कुछ देश परोक्ष रूप से ऐसे खतरनाक आतंकी संगठनो को मदद भी दे रहे हैं जिससे आतंकवादियों के खिलाफ लड़ने की उनकी नीयत पर भारी सवाल भी खड़े होते हैं | गुड तालिबान बेड तालिबान , गुड पाकिस्तान बेड पाकिस्तान अब ऐसे नारों से काम नहीं चलेगा | भारत की ही बात करें तो पहले पूरी दुनिया हमारे देश की आतंकी घटनाओं पर ध्यान नहीं देती थी लेकिन अमरीका , फ्रांस के हमलों ने विकसित दशों के सोचने के तौर तरीकों में बदलाव हाल के वर्षो में तो जरूर ला दिया है शायद तभी जी 20 में प्रधानमन्त्री मोदी को यह कहने को मजबूर होना पड़ा यह समय आतंकवाद को परिभाषित करने का है जिसमे आतंकवाद के जन्म दाताओं की सही पहचान जरूरी है और फिर उनके साथ कार्यवाही करने का मानक एक होना चाहिए |
आतंकवादियों के खिलाफ दोहरे मापदंड उठाने की नीतियों का प्रतिफल आज पूरी दुनिया पेरिस सरीखे हमलो के रूप में देख रही है | अब समय आ गया है जब पूरी दुनिया को आतंक के इस दानव के खिलाफ कोई बड़ी कार्यवाही एक साथ करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए | आई एस आई एस के खिलाफ अब बड़ी कार्यवाही का समय निश्चित ही आ गया है इसके लिए जरूरी है कोई रास्ता अमरीका और रूस से निकले क्युकि आई एस से लड़ने के मसले पर दोनों के दोहरे मापदंड साफ़ दिख रहे हैं | जहाँ रूस ने आई एस आई एस के ठिकानों पर जबाबी कार्यवाही कर यह साबित किया है कि वह अल बगदादी के साम्राज्य का खात्मा कर ही चैन से बैठेगा वहीँ अमरीका दोमुही बातें कर अपना विरोध पहले से ही जता चुका है | अब ऐसे हालातों में आतंकवाद के मसले पर नई लकीर कैसे खिंच पायेगी यह सवाल दिनों दिन गहराता ही जा रहा है लेकिन उससे भी बड़ा सवाल पेरिस के फिर से अपने पैरों में खड़े होने का भी है क्युकि इस भीषण आतंकवादी हमले ने पेरिस शहर की सांसें ही थाम कर रख दी | धमाकों की आवाजों से जहाँ पूरा शहर काँप उठा वहीँ नेशनल स्टेडियम में बैठे दर्शक अभी तक धमाकों से सहमे हैं और वो भीषण मंजर याद कर रोने लगते हैं तो समझा जा सकता है फ़्रांस के दिल में यह किस तरह की भीषण चोट रही | 10 महीने पहले जब चार्ली के दफ्तर पर हमला हुआ था तो लाखों लोगों ने पत्रिका के पक्ष में और आतंकवाद के विरुद्ध एकजुटता का प्रदर्शन किया था | नागरिकों ने अपनी तख्तियों पर मैं चार्ली हूं का नारा लिख रखा था | यह एकता मार्च एक तरह से फ्रीडम ऑफ स्पीच के पक्ष में भी था लेकिन देखना होगा क्या फ़्रांस की जनता इन भीषण हमलों के दोषियों के खिलाफ एकजुटता का प्रदर्शन चार्ली सरीखे मार्च को निकालकर कर पाती है या नहीं क्युकि आतंक के विरुद्ध आंधी को पेरिस शहर से ही गति दी जा सकती है और फिर पूरा यूरोप फ़्रांस की छतरी तले आकर पूरी दुनिया को एकजुटता का पाठ निश्चित ही पढा सकता है |वैसे भी इन हमलों के तुरंत बाद फ़्रांस के राष्ट्रपति ओलांद ने कहा भी है फ्रांस आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता से खड़ा रहेगा और इस संकल्प का समर्थन पूरी दुनिया करेगी | उम्मीद की जानी चाहिए इस बार कोई न कोई रास्ता जरूर निकलेगा |
आतंकवाद आज वैश्विक समुदाय के सामने बडी समस्या का रुप ले चुका है जिससे निपटना किसी चुनौती से कम नहीं है | निःसंदेह कुछ देश आतंक के नए चेहरों को खाद पानी अपनी सरजमीं पर दे रहे हैं लेकिन आज ऐसे दलों को दुनिया से अलग करने की जरूरत है | साझा प्रयास करने की नई पहल संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में ही अब शुरू हो सकती है | जी 20 देशों का एक मंच से आतंक के खिलाफ निपटने का ऐलान सराहनीय है | इसी तरह अन्य देशों को आतंक के खिलाफ बड़ी लकीर अब खींचनी ही होगी | इस्लाम के नाम पर जहाँ लोगों को गुमराह किया जा रहा है वहीँ कट्टरपंथी ताकतें अब युवाओं को आतंक का नया ककहरा सिखाने में लगी हुई हैं | आज आई एस के रूप में आतंक का नया चेहरा हम सबके सामने है जहाँ बडी संख्या में युवा ऐसे संगठनो की की तरफ पूरी दुनिया से उन्मुख हो रहे हैं जिनका मकसद बेगुनाहों को मारना और किसी ख़ास विचारधारा के लिए काम करना बन गया है | ऐसी ताकतों के खिलाफ पूरी दुनिया की एकजुटता नई लकीर खींच सकती है | देखना होगा आपसी गिले शिकवे भुलाते हुए क्या सभी देश आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक जंग अब पेरिस हमलों के बाद लड़ पाते हैं या नहीं ?

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1 Comment on "आतंकवादियों के खिलाफ दोहरे मापदंड"

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mahendra gupta
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इतना सब कुछ होने के बाद भी ये सुधरने वाले नहीं है , आज भी भारत में होने वाले आतंकी हमले के खिलाफ इतनी एकजुटता व सामूहिक विरोध हमें देखने को नहीं मिलेगा अमेरिका इन सब आतंकवादियों को किसी किसी प्रकार से पालता पोषता रहा है ,आई एस में भी उसके स्वार्थ निहित हैं उसका यहाँ लड़ने का मकसद तेल पर अधिकार प्राप्ति है,रूस भी कुछ ऐसी ही नीयत से ही आगे बढ़ा है है , पाक पर नियंत्रण के लिए ये इतने सक्रिय कभी क्यों नहीं हुए ?

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