लेखक परिचय

श्रीराम तिवारी

श्रीराम तिवारी

लेखक जनवादी साहित्यकार, ट्रेड यूनियन संगठक एवं वामपंथी कार्यकर्ता हैं। पता: १४- डी /एस-४, स्कीम -७८, {अरण्य} विजयनगर, इंदौर, एम. पी.

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 modi and saeed
   अमेरिका में  न केवल ‘ अश्वेतों ‘ पर बल्कि प्रवासी भारतीयों -हिन्दू ,सिख  मुस्लिमों  पर भी आये दिन  नस्ली और मजहबी हमले शिद्द्त से जारी  हैं। विगत दिनों जब पेरिस में शार्लि हेब्दों काण्ड हुआ  तो सारे यूरोप  और  अमेरिका ने आसमान सर पर उठा लिया । लेकिन जब अमेरिका ,इंग्लैंड  या  पाकिस्तान में भारतीय मारे जाते हैं तो कोई डकार भी नहीं लेता। उधर सीरिया में दुर्दांत  आईएस  के जुल्म जारी हैं ?  यमन -सूडान में अलकायदा   के खूनी  मंजर किसे  नहीं दिख रहे ? इजरायल और   फिलिस्तीन संघर्ष में   दोनों तरफ के  निर्दोष  ही मर रहे हैं । अफ़गानिस्तान -पाकिस्तान ,बांग्लादेश और  यमन  में अलकायदा -तालिवान के जलजले   बदस्तूर जारी हैं। चूँकि  भारत अंतरार्ष्ट्रीय जगत में एक नामचीन्ह धर्मनिरपेक्ष  लोकतांत्रिक राष्ट्र है। अतएव   भूमंडलीकरण के इस दौर में , इन सभी अंतरार्ष्ट्रीय दुर्घटनाओं  की काली छाया भारत की  एकता और अखंडता   पर न पड़े यह कैसे सम्भव हो सकता  है ?
वेशक  डॉ मनमोहन सिंह  के राज में  भारत की अर्थव्यवस्था चौपट हो रही थी , अंदरुनी हालत  भी ठीक नहीं थे। किन्तु  अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत की धर्मनिरपेक्ष  छवि पर तब भी किसी ने अंगुली नहीं उठाई।  दुनिया भर में  भारत  की धर्मनिरपेक्षता और लोकशाही की  तूती  बोला करती थी ।  विगत यूपीए सरकार की गठबंधनात्मक कमजोरियों ,प्रशासनिक नाकामियों, आकंठ भृष्टाचार  , महँगाई  और उसके खिलाफ उतपन्न  जनाक्रोश को भाजपाई  बड़बोले नेता अपनी सत्ताप्राप्ति  का साधन बनाने में सफल रहे।    लेकिन जब   उन्हें  सत्ता का   प्रचंड बहुमत मिलने से अहंकार हो चला तो हाथों के तोते उड़ने लगे हैं। जब भूमिअधिग्रहण कानून में उलझे ,जब कालेधन की वापिसी में असफल रहे ,जब कश्मीर में मुफ्ती जैसे दोगले  ग़ैरजिम्मेदार  साम्प्रदायिक नेता को मुख्यमंत्री बनाकर उलझे , जब अमेरिकी राष्ट्रपति की नसीहतों में उलझे ,जब संयुक्त विपक्ष ने राज्य सभा में ‘लौह  नेतत्व’ को पटकनी दी तब उन्हें  शायद एहसास हुआ कि  उनकी नादानी  के कारण भारत  चौतरफा संकट से घिर  चुका  है। न केवल भारतीय  वुद्धिजीवी  वर्ग को  ,न  केवल कांग्रेस को ,न केवल सम्पूर्ण गैर भाजपाई-गैर कांग्रेसी  विपक्ष  बल्कि  भारत के  प्रगतिशील तबके को भी बहरहाल   ‘मोदी मान मर्दन’ की चिंता  छोड़कर  अपने वतन की चिंता करनी चाहिए । मौजूदा  महाप्रलयकारी  वैश्विक आतंकवाद की काली परछाई  की लेश मात्र चिंता  किस को  नहीं  है ? अमेरिका  ,यूरोप  ,इजरायल  ,इंग्लैंड  ,फ़्रांस ,चीन ,रूस जैसे गैर इस्लामिक देश भी जब आईएस का कुछ नहीं उखाड़ पा रहे हैं। तो पाकिस्तान  या  भारत को   इस चुनौती से निपटने में कितना  सँघर्ष  करना होगा ?

दूनिया के इस खतरनाक  खूनी  मंजर  की तुलना में भारतीय समाज का सामाजिक  – साम्प्रदायिक   सौहाद्र कहीं ज्यादा काबिले तारीफ़ है। भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को  बनाने में किसी  ओबामा का या ओसामा का कोई रोल नहीं। भारत की गंगा जमुनी तहजीब के परिष्करण में  उन ताकतों का  भी कोई हाथ नहीं जो दुनिया में अपने पेशाब से चिराग जलाने की असफल  कोशिश कर  रहे हैं।  आज  भारत को  न केवल  अमेरिका नसीहत दे रहा है , न केवल मुफ्ती  और मुसर्रत आलम  भारत को धोखा दे रहे हैं ,बल्कि अब तो  श्रीलंका का  नवनिर्वाचित राष्ट्रपति विक्रमसिंघे  भी तमिल अस्मिता को दवाने के नाम पर भारत को आँखें दिखा रहा है।   भारत की धर्मनिरपेक्षता , भारत का लोकतंत्र और भारत की उत्कृष्ट सांस्कृतिक  सभ्यता का निर्माण- साम्राज्य्वादी श्वेत प्रभुओं के द्वारा नहीं बल्कि स्वाधीनता संग्राम के महान अमर शहीदों के बलिदानों से – हुआ है। यह सच है कि  भारत में  हिन्दुओं,मुसलमानों या किसी अन्य धर्म -मजहब के लिए कोई खतरा नहीं है। दरसल किसी भी दर्शन या विचार को कहीं कोई खतरा नहीं है ।
इस दौर में  वे ही ज्यादा  असुरक्षित है जो किसी धर्म मजहब  के नेताओं की वोट कबाडु   घटिया  का चारा बनने को तैयार हो जाते हैं। कोई जातिवाद के कारण ,कोई  मजहब के कारण ,कोई  राजनीति   में धर्म को घुसेड़ने के कारण तो  कोई  अपनी  भाषाई -क्षेत्रीय अहमन्यता के कारण   देश को तोड़ने पर आमादा है।  कोई घोर पूँजीवादी  आर्थिक नीतियों के कारण  उपेक्षित  है।  कोई अरुण जेटली के वर्तमान  बजट से आक्रोशित है। भारत का मध्यम वर्ग  तो मानों अब   खतरे में  ही आ  चुका  है।  इस तरह देखा  जाए तो पूरा देश ही असुरक्षित है। यह जग  जाहिर है कि   ‘मोदी सरकार’  को केवल कार्पोरेट जगत की  ही चिंता  है ? उन्हें अब मंदिर की  चिंता नहीं , हिंदुत्व की चिंता नहीं  , धारा -३७० की चिंता नहीं ।  एक  समान  कानून की भी अब उन्हें चिंता  नहीं बल्कि  उन्हें तो  भाजपा  के उस परम्परागत वोट  की भी  चिंता नहीं जो ‘हर-हर मोदी’ ‘के नमोगान’ में निरंतर लीन  रहता है।  इसीलिये  तो वित्त मंत्री  जी  संसद में डंके की चोट  पर कहते हैं  कि  ‘ मध्यम   वर्ग  अपना ख्याल खुद रखे ‘।  अब जिन्हे देश की  ही फ़िक्र नहीं वे  मध्यम  वर्ग का क्या अचार डालेंगे ?  कांग्रेस को तो  अपनी पार्टी बचाना ही मुश्किल हो रहा है. वे देश क्या बचाएंगे ? तमाम अर्धसामंती ,अर्धपूँजीवादी  क्षेत्रीय  राजनैतिक पार्टियाँ भी कभी धर्मनिरपेक्षता ,कभी लोकतंत्र ,कभी समाजवाद  के नारे तो लगाती हैं। किन्तु ‘वैश्विक खूखार आतंक’ और भारत विरोधी ताकतों का सही आकलन करने की उन्हें या तो  फुर्सत नहीं   या हिम्मत ही  नहीं है। इस  देश की जनता को कहीं महँगाई  ने मारा।  कहीं भृष्टाचार ने मारा। कहीं ‘मंदिर-मस्जिद’ विवाद ने मारा । कहीं गठबंधन धर्म ने मारा। कहीं  झाड़ू ने  मारा।  कहीं ‘मेक इन इण्डिया’  ने मारा  ।  कभी कहीं किसी  ‘ शायनिंग  इण्डिया’  ने मारा ।
अबकी बार अरुण जेटली जी ने भारत के मध्यम  वर्ग को  कसके जूता  मारा ।  इसमें भारतीय मध्यम  वर्ग  का  भी कुछ  तो कसूर अवश्य है।  यह वर्ग महा स्वार्थपरक है  ,  घोर सुविधाजीवीहै   और  घोर यथास्थतिवादी   है।  धर्मान्धता का , बाबाओं का और महिला उत्पीड़न का यह सबसे  बड़ा उपभोक्ता समूह है। यह वर्ग अपनी भौतिक आकांक्षाओं की पूर्ती के लिए और उन्नत तकनीकी के लिए , भारत को  वैश्विक पूँजी के आगे घुटने टेकने के लिए मजबूर  कर रहा है।  यही वर्ग कभी जंतर – मन्तर  पर अन्ना हजारे की नौटंकी में शामिल हो जाता है। कभी स्वामी रामदेव  के सामने बैठकर ‘लोम -विलोम’ करने लगता है।  इस मध्यम वर्ग को ही  ,भाषा,क्षेत्रीयता और साम्प्रदयिक उन्माद की  भी  बुरी ‘लत’  है।  यही वर्ग है जो हवा के साथ चलता है।  बहाव के अनुकूल तैरने का आदि हैं .
देश के मध्मयवर्गीय वुद्धिजीवियों को ज्ञात हो कि   जब अधिकांस भारतीय असुरक्षित हैं , जब अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं ,जब  मजदूर -किसान असुरक्षित हैं  तो आप सुरक्षित कैसे रह सकते हैं ? जब दुनिया भर में ईसाई ,मुस्लिम मारे जा रहे हैं तो भारत के  अधिसंख्य हिन्दू नागरिक सुरक्षित कैसे हो सकते हैं  ? ऊपर  से तुर्रा ये कि  जो लोग हिंदुत्व का वोट  बैंक बनाकर सत्ता का खजाना  खाली करने में जुटे हैं, वे हिन्दुओं के लिए  तो कुछ भी नहीं कर रहे हैं।  वे हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों पर ,बाबाओं की यौन लिप्सा पर या मंदिरों में एकत्रित अपार धन राशि के युक्तियुक्तकरण पर एक शब्द  भी नहीं बोलते।   वे केवल सत्ता सुख लूट रहे हैं।  वे  ‘मुफ्तियों’ के आगे  शरणम गच्छामि हो रहे हैं। वे आज मुसर्रत आलम से गलबहिंयां  डाल रहे हैं। कल दाऊद के साथ डिनर करेंगे। वे   गलतियाँ-दर  – गलतियाँ  किये जा रहे है।  वे  अपराध  -दर  – अपराध किये जा रहे हैं। बहु संख्यक हिन्दू मतदाता उन्हें ही वोट किये जा रहे हैं।
बड़े  दुःख की बात ये हैं कि  संसदीय राजनीति  की इस दुरवस्था को देश की जनता अभी भी समझ नहीं पायी है !संतोष की बात है कि  -समझदार सचेतन  वामपंथी बुद्धिजीवी -प्रगतिशील तबकों  द्वारा अल्पसंख्यक वर्ग के हितों की पूरी-पूरी वकालत मौजूद है।  किन्तु उनके द्वारा  भी  जाने-अनजाने अधिकांशतः     हिन्दुओं को ही टारगेट किया जा रह है। इससे अल्पसंख्यक वर्ग में एक काल्पनिक असुरक्षा का  भाव  पैदा हो रहा है।   शायद   भी – नाहक ही  आक्रामक और उग्र हो उठते हैं। देश  में वाम पंथ की हिन्दू विरोधी छवि बन चुकी  है। अल्पसंख्यक वर्ग भी टैक्टिकल वोटिंग के कारण एकमुश्त उसे वोट करने लगा है जो भाजपा को हरा सके।  संसदीय लोकतंत्र में वाम की ताकत का कम होना  भी देश के लिए अशुभ  है। टैक्टिकल वोटिंग के कारण  आमतौर पर  देश में और खास तौर  से  बंगाल  के अल्पसंख्यक ममता के साथ हो लिए हैं ।
हिन्दू   मतदाताओं ने  भी बंगाल में ममता और  लेफ्ट से  ऊपर  भाजपा को  तरजीह देना शुरू आकर दिया  है  ! यह कटु सत्य है कि इसीलिये भारत में लेफ्ट की राजनीति अब केवल ‘संघर्ष’ तक ही सिमिटती  जा रही  है।
कोई ‘आरएसएस ‘ का विरोध करे  ,  मोहन भागवत का विरोध करे ,मोदी जी का तर्कसंगत विरोध करे तो यह उसका अधिकार ही नहीं बल्कि कर्तव्य भी है । मैं भी संघ परिवार का धुर विरोधी हूँ।  किन्तु जब कोई ‘मुफ्ती’  आतंकियों  का कृपापात्र हो जाए या कोई ओबामा  जैसा बड़ा नेता सम्पूर्ण हिन्दू  मानस को ही  धर्मनिरपेक्षता की नसीहत दे तो  हमें अपनी सोच को अपडेट करना पडेगा।  हम केवल मोहन भागवत  जी  या मोदी जी या हिन्दू नेताओं   के उग्र वयानों  के निषेध तक ही सीमित क्यों रहें ?  हम  भगोड़े  दाऊद के बारे में ,हाफिज सईद के बारे में ,अफजल गुरु के बारे में या अब्दुलगनी लोन के बारे में चुप क्यों रहें ?वेशक हर धर्म-मजहब का  कोई भी  पढ़ा -लिखा  वेरोजगार  युवा भले ही भूँखों मर रहा हो, किन्तु   अब  वह  ‘गरीब’ ‘सर्वहारा’  कहलाना पसंद नहीं करता।  वह ज़िंदा रहने के लिए किसी भी नैतिक  -अनैतिक  ‘साधन’ को अपना सकता है।  उसे किसी धर्म-मजहब के उसूलों की  या  सर्वहारा क्रांति की कोई दरकार नहीं ! दरसल भारत को खतरा  इसी अधकचरी  मानसिकता  से है। यह वही युवा  वर्ग है जो भटका हुआ है।  यह वर्ग  कभी  भारत के सुरक्षा बालों पर पत्थर फ़ेंकत है। कभी लव-जेहाद का नाटक  करता है।  कभी साम्प्रदायिकता की ‘हुड़दंगलीला’ में शामिल हो जाया करता है।  इस दौर में  कुछ मुठ्ठी भर युवा ही वैज्ञानिक,धर्मनिरपेक्ष  और क्रांतिकारी सोच की समझ  रखते हैं। बाकी अधिकांस तो मजहबी नेताओं द्वारा ऊगले जा रहे लावे में जलने-मरने को फुदकते रहते हैं। कुछ   आधुनिक  मध्यम  वर्गीय उच्च शिक्षित युवा  भी  कार्पोरेट जगत की असुरक्षित  चाकरी के निमित्त ,  कोल्हू के बैल की मानिंद जीने के लिए अभिशप्त हैं। वे नहीं जानते कि  ‘आजादी’ किस चिड़िया का नाम है ?
जिनसे अमेरिका को खतरा है ,जिनसे पाकिस्तान को खतरा है ,जिनसे शार्ली  एब्दो   को खतरा है। जिनसे सारी  सभ्य दुनिया को खतरा है।  उन्ही से भारत को भी खतरा है। किन्तु बड़ी विचित्र और मानसिक दुरवस्था है कि दवे कुचले  उन निर्धन  भारतीयों को ही दोनों ओर  के कटट्रपंथ की ओर से  टारगेट किया जा रहा है जो  दुंर्भाग्य से ‘ हिन्दू ‘ कहलाते हैं ,जिन्हे अतीत में भी सैकड़ों सालों से  चुन-चुन कर  मारा  जाता रहा है । दरसल हिन्दू  निर्धन युवक  आज भी दुनिया में हासिये पर ही है।  उसके लिए कहने को आरएसएस है।उनके वोट बटोरने को  भाजपा है।  धर्म रक्षा के लिए वीएचपी है।  जय-जयकार के लिए अटल-आडवाणी और मोदी हैं। किन्तु इन वेरोजगार या  अपढ़ हिन्दू युवाओं  के लिए ,हिन्दू मजदूरों के लिए ,गरीब हिन्दू किसानों  के लिए  रोटी-कपड़ा -मकान जुगाड़ने के लिए मुस्लमान युवाओं की ही तरह खुद ही संघर्ष करना होगा।
वर्तमान  सरकार की हैसियत तो  एक मामूली ‘मुफ्ती’ के सामने  अब भटे  के  बराबर भी नहीं रही ।  भाजपा विधायकों के समर्थन से मुख्य मंत्री बना व्यक्ति देश विरोधी कामों में   जुट गया और ये सिर्फ संसद में स्यापा कर रहे हैं। क्या इनके भरोसे हिंदुत्व की रक्षा  सम्भव है ?इससे बेहतर तो  ‘बाप-बेटे’ की ही सरकार थी।  वो देश के ख़िलाफ़ तो  कभी नहीं गए।   मुफ्ती साहब  ने खूब  सबक सिखाया  दिया है कि  धारा  ३७०  हटाने की बात तो भूल ही जाओ। एक झंडा ,एक संविधान और एक क़ानून तो छोड़िये  ‘मुफ्तीजी’ को तो कश्मीर के चुनाव में पाकिस्तान की ‘कृपा ‘ ही सर्वत्र नजर आ रही है।  भारतीय फौजियों के सर काटने वाले आतंकी तो ‘मुफ्ती’ को क्रांतिकारी नजर आ रहे हैं।  इस अंधेरगर्दी के खिलाफ एक शब्द नहीं है मोहन भागवत जी के पास।  केवल मोदी जी की क्लाश लेने से ‘देशभक्ति’ पूरी नहीं हो जाती।  सत्ता की मिठास में  तो  पूरा ‘संघ परिवार’ शामिल  ,किन्तु जब ‘मुफ़्ती’ का कड़वा ‘सच’ सामने आया तो  अब ‘अमित शाह और मोदीजी  पर  आँखें तरेर रहे हैं। इधर पूरा विपक्ष भी सरकार को सांस नहीं लेने दे रहा।   वेशक मोदीजी ही इन घटनाओं के लिए प्रारंभिक तौर  पर जिम्मेदार हैं। किन्तु कश्मीर में यदि भाजपा को बहुमत नहीं मिला  तो इसमें भी क्या मोदी जी की ही जिम्मेदारी   है ? यदि पीडीपी के साथ गठबंधन नहीं बनाते तो भी आरोप तो लग ही रहे थे कि  राष्ट्रपति शासन की जुगाड़ चल  रही है !अब  वक्त का तकाजा है कि पूरा देश मोदी को बाद में घेरे-कभी किसी चुनाव में।  अभी तो ततकाल  कश्मीर को बचाने की बात करे। पूरी संसद और पूरा देश एकजुट हो जाए और मुफ्ती को कश्मीर की सत्ता  से बाहर  करे।

श्रीराम तिवारी

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