लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

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आर. सिंह

‘रंजन मुझे प्यार करता है पापा.’

‘यह कैसे हो सकता है?’

प्रोफेसर साहब सोंच में पड गये.

‘बेटी तुम पागल तो नही हो गयी हो?

‘नही पापा, उसने स्वयं मुझसे कहा कि वह मुझे प्यार करता है.’

‘बेटी तुम पढी लिखी हो.एक वैज्ञानिक की बेटी ही नही,तुम स्वयं एक कम्प्युटर साइंटिस्ट हो.तुम एैसा सोच भी कैसे सकती हो?रंजन प्यार कर ही नही सकता,क्योंकि प्यार मानवीय भावनाओं का द्दोतक है और रंजन मानव नही है.’

‘पापा मैं नही मानती कि रंजन मानव नही है.क्या कमी है उसमे?किस बात में वह भिन्न है मानवों से? मानवों में मानवता का विकास भी तो अचानक नही हुआ. डार्विन के सिद्धान्त के अनुसार मानव अपने वर्तमान रुप में अनेक विकास चरणों को पार कर पहुचा है.फिर रंजन में मानवीय गुणों का विकास क्यों नही हो सकता? उसमे प्यार की भावनाएं क्यों नही पनप सकती?

प्रोफेसर साहब देखते ही रह गये अपनी लाडली बेटी को.उनको पता ही नही चल रहा था कि वे इसका क्या जवाब दें?क़या सचमुच उनकी बेटी पागल हो गयी है? उनकी तीव्र वुद्धि वाली बेटी को क्या हो गया है? उस बेटी को जिसका लोहा कभी कभी प्रोफेसर साहब को भी मानना पडा है.कम्प्यूटर साइंस में उनकी जितनी उपलब्धियां हैं,उसमे पिछले पाँच वर्षों में जो इजाफा हुआ है,उसमे उनकी बेटी का सहयोग कुछ ज्यादा ही रहा है. स्वतंत्र रूप से भी कम्प्यूटर साइंस में अपनी उपलब्धियों से उसने उस क्षेत्र में इस छोटी उम्र में भी अपना एक स्थान बना लिया है.लोग कभी कभी आश्चर्य करते हैं कि इतने कम उम्र वाली इस लडकी रंजना के मस्तिष्क में आखिर क्या भरा है?पता नही प्रोफेसर साहब ने इसको किस तरह की शिक्षा दी है?देखना यह प्रोफेसर साहब को भी एक दिन मात दे देगी.

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प्रोफेसर साहब को याद है वह दिन, जब करीब सोलह वर्ष पहले वे अपनी पत्नी और पाँच वर्षीया बेटी रंजना को लेकर अमेरिका गये थे.प्रोफेसर साहब उन दिनों कम्प्यूटर पर शोध कर रहे थे और एैसे रोबो के विकास में लगे थे जो न केवल मानवों की तरह काम कर सके बल्कि मानव लगे भी.इसी सिलसिले में उनके कुछ पेपर्स अमेरिका के तकनीकी पत्रिकाओं में प़्रकाशित हुए थे.उन पेपरों के आधार पर अमेरिका के एक फर्म ने उन्हें अपने यहाँ आगे के अनुसंधान के लिये बुला लिया.उस फर्म ने प्रोफेसर साहब को एैसा अच्छा आफर दिया था कि वे इन्कार नही कर सके. प्रोफेसर साहब और उनकी पत्नी को आपना देश छोडने का दुखः तो बहुत हुआ पर अनुसन्धान की बेहतर सुविधा ने अपनी ओर खींच ही लिया.प्रोफेसर साहब ने अमेरिका में नाम और पैसा तो बहुत कमाया ,पर अपना देश उन्हें हमेशा आकर्षित करता रहा. इसी बीच उनकी पत्नी भी एक हादसे का शिकार हो गयी.प्रोफसर साहब अपनी पत्नी को बहुत प्यार करते थे.उसका वियोग उन्हें विरक्त बना गया.उनकी लाडली बेटी रंजना भी अब सयानी हो गयी थी.प्रोफेसर साहब के अन्तरमन में उसके भविष्य की चिन्ता भी थी.बेटी को भारत लौटना अच्छा तो नहीं लगा था पर पिता का प्यार उसे उनके साथ ही खींच लाया.भारत लौटते वक्त उनके साथ एक सुन्दर युवक भी आया. जो लोग प्रोफेसर साहब को जानते थे,उन्हें आश्चर्य तो हुआ,पर किसी ने पूछा नही.अन्य लोगों क्या गर्ज पडी थी कि इसकी छानबीन करते.प्रोफेसर साहब और उनकी बेटी उसे रंजन कह कर बुलाते थे.प्रोफेसर साहब ने यहाँ अपनी अनुसन्धान शाला खोल रखी थी.प्रोफेसर साहब और रंजना तो उसमे काम करते ही थे,रंजन भी उनका हाथ बँटाता था.प्रोफेसर साहब के घर की पूरी देखभाल रंजन के जिम्में थी.खाना बनाने,घर की सफाई करने और घर को सज्जा कर रखने की पूरी जिम्मेवारी उसी पर थी. रंजना भी अपने पिता का खयाल रखती थी और उनके प्रत्येक कार्य में सहयोग देती थी,पर बाप बेटी पूर्ण रूप से रंजन पर आश्रित थे.लोगों ने रंजन को उनलोगों के साथ बैठ कर खाते नही देखा था,पर उनलोगों के व्यस्त जीवन में एैसे मौके ही कितने आते थे जब लोगों से उनका मिलना हो सके.

रंजन और रंजना एक दूसरे से बहुत घुले मिले थे.अवसर पाते ही एक दूसरे से वार्तालाप में निमग्न हो जाते थे.प्रोफेसर साहब ने भी इधर एक खास बात देखी थी. आजकल रंजना कुछ अन्यमनस्क रहने लगी थी.उसका ध्यान अपने प्रयोगों पर ज्यादा केन्द्रित नही हो पा रहा था. बनने संवरने में भी ज्यादा दिलचस्पी लेने लगी थी.प्रोफेसर साहब ने इसे उम्र का तकाजा समझा था,पर आज जब रंजना ने रंजन से अपने प्यार का इजहार कर डाला तो प्रोफेसर सहब स्तब्ध रह गये.समझाने का भी जब कोई प्रभाव नही पडा तो प्रोफेसर साहब ने कुछ दिनों तक चुप रहने में ही भलाई समझी,पर उनकी अनुभवी निगाहें अब उन दोनों का पीछा करने लगी.

3

प्रोफेसर साहब के बंगले का यह भाग बहुत ही रमणीय था.रंग बिरंगे फूलों से सज्जा हुआ था यह हिस्सा.पेड पौधों की बहुलता इसे एक सुन्दर उद्दान का रूप प्रदान करती थी.इस उद्दान की देख भाल के लिये एक माली रक्खा हुआ था.फले तो इसकी ओर देखने को भी बाप बेटी को फुर्सत नही थी.प्रोफेसर साहब और रंजना इस ओर तभी आते थे,जब मेहमानों की अधिकता होती थी.लेकिन आजकल रंजना इधर अक्सर आने लगी थी.रंजन भी उसके साथ होता था. वे दोनो टहलते हुए बातें किया करते थे. बातों का कोई खास सिलसिला नही होता था.उनकी बातचीत सुनकर कोई यह सोच भी नही सकता था कि यह वही लडकी है जिसने कम्प्यूटर क्षेत्र में धूम मचा रखी है.वे कभी मौसम की बातें करते तो कभी फूलों और बादलों की.

उस दिन मौसम,फूल और बादलों की बातें करते करते कब वे एक दूसरे से प्यार की बातें करने लगे,उन्हें पता भी नही चला.रंजन ने फिर कहा कि वह रंजना से प्यार करता है.रंजना तो उसके प्यार में इस कदर डूब गयी थी कि रंजन की प्रत्येक बात में उसे प्यार छलकता हुआ नजर आता था.रंजना को फूल बहुत प्रिय थे.उसकी इच्छा हुई कि रंजन एक फूल तोडकर उसके बालों में लगा दे.बातचीत के सिलसिले में न जाने एैसा क्या हुआ कि रंजन ने सचमुच एक फूल तोडकर उसके जुडे में खोंस दिया.रंजना आत्मविभोर हो गयी.उसे लगा कि वह बढ कर रंजन को गले से लगा ले,पर न जाने क्या सोचकर वह एैसा न कर सकी.इसी बीच बारिश होने लगी और वे बंगले के अन्दर चले गये.

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प्रोफेसर सहब की परेशानियां बढती जा रही थी. वे रंजना को कुछ कह नही पा रहे थे,पर भीतर ही भीतर घुट रहे थे.काम पर भी इसका असर पड रहा था.वे अपने प्रयोगों में उतना ध्यान नही दे पा रहे थे.र8जना की अन्यमनस्कता भी इसका कारण थी.अब उनके समझ में आा रहा था कि कितना निर्भर थे वे रंजना पर.रंजना के भविष्य की चिन्ता भी उन्हें खाये जा रही थी.रंजन के प्यार का पागलपन उसे कहाँ ले जायेगा?क्या गुल खिलायेगा यह पागलपन इसका अन्दाजा भी वे नही लगा पा रहे थे.कभी कभी उनका मन करता था कि वे अपनी बेटी से इसके बारे में बातचीत करें,पर कुछ सोच कर चुप रह जाते थे.बेटी भी, जो अपने बाप से इतना प्यार करती थी,अब उनसे थोडी कटी कटी रहने लगी थी. एक खतरा जो उनलोगों के सर पर मडरा रहा था और जो शायद सबकुछ समाप्त कर सकता था,काश! उसकी ओर उनका ध्यान जाता.

5

प्रोफेसर साहब और रंजना का कमरा साथ साथ था और उसके बाद था रंजन का कमरा.रंजन घर का सब काम निपटा कर करीब 11 बजे रात को अपने कमरे में जाता और फिर सुबह छः बजे उठकर अपने काम में लग जाता था.तीनों कमरे श्रेष्ठ आधुनिक सुविधाओं से युक्त थे,अतः कौन अपने कमरे में क्या करता है,यह पता लगाना बहुत कठिन था. पहले तो रंजना अपने पापा से बिना बात किए और कम से कम बिना आधा घंटा उनके साथ बिताये अपने कमरे में नही जाती थी,पर जबसे यह रंजन वाला किस्सा सामने आया था,वह प्रोफेसर साहब से केवल थोडी बहुत बात करके उनको गुडनाइट कहकर अपने कमरे में चली जाती थी.उस दिन भी एैसा ही हुआ.प्रोफेसर साहब भी अपने विचारों में मग्न विस्तर पर पडे रहे.पर, रंजना उस रात अपने कमरे में नही गयी. वह रंजन के कमरे के बाहर उसका इन्तजार करती रही.रंजन जब वहां आया तो वह रंजन के साथ ही उसके कमरे में दाखिल हो गयी.रंजन काम की अधिकता से थके हुये आदमी की तरह अपने कमरे में जाते ही विस्तर पर लेट गया.रंजना उसके पास ही बैठी बैठी बातें करती रही.कमरे में धीमी रोशनी का वल्ब जल रहा था.उस रात्रि वेला में कुछ तो वातवरण का प्रभाव,कुछ रंजना की मानसिक स्थिति.बातचीत ने कुछ एैसा मोड लिया कि रंजना यकायक रंजन से लिपट गयी.इसके बाद जो हुआ वह बहुत ही भयानक था.प्रोफेसर साहब रंजना की चीख और धमाके की आवाज सुनकर दौडे,पर रंजना के फटे हुये सर और खून से लथपथ शरीर को देखकर पछाड खाकर गिर पडे.उनको इतना भी होश नही रहा कि वे जान पाते कि क्या हुआ था और क्यों हुआ था. असल में उन्होने रंजन के सीने के पास ,उसके शरीर की गतिवधियों को नियन्त्रित करने के लिये,कम्प्यूटर सिस्टम लगा रखा था.उस सिसटम की सुरक्षा के लिये उन्होने प्रवन्ध कर रखा था कि जो वसतु उसके सीने के निकट आने की कोशिश करेगी रंजन उसे झटके से दूर फेंक देगा.पता तो इसका रंजना को भी था,पर वह अपने होशोहवास में थी कहाँ?लेटे हुये अवस्था में भयानक उछाल ने रंजना के सर और शरीर को छत में दे मारा था और फिर वह गिरी थी फर्श पर.

रंजन अभी भी विस्तर पर पडा था, कयोंकि उसके उठने का समय तो छः बजे सुबह था और उसमे अभी भी छः सात घन्टे बाकी थे.

(प्रेरणास्रोत: अंग्रेजी टी.वी.सिरियल ‘स्माल वन्डर’).

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