लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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-प्रमोद भार्गव-
BRICS-countries

कभी-कभी पूर्वानुमान हकीकत की कसौटी पर खरे उतरते हैं। 2008 में जब दुनिया आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रही थी, तब ब्रिटेन के तात्कालीन विदेश मंत्री डेविड मिलीबैंड ने अपने देश के राजनायिकों से कहा था कि वे विश्व संदर्भ में अपना दृष्टिकोण बदलें, क्योंकि विश्व अर्थव्यवस्था के साथ, भारत और चीन के मजबूती से जुड़ जाने के कारण भविष्य में शक्ति केंद्र पश्चिम से हस्तांतरित होकर पूरब का रूख करने की तैयारी में है। ब्राजील के समुद्रतटीय शहर फोर्तालेजा में ब्रिक्स देशों के शिखर सम्मेलन में शक्ति-केंद्र का रूख बदलने की बुनियाद विश्व बैंक के समानांतर अंतरराष्ट्रीय नया विकास बैंक स्थापित करने की घोषणा के साथ डाल गई है। ब्रिक्स मसलन ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका देशों के इस नेतृत्व को महत्वपूर्ण और दूरदर्शी माना जाना चाहिए, क्योंकि उन्होंने परस्पर मुंहजोरी से ऊपर उठकर अमेरिका और यूरोपीय अर्थव्यवस्था के बरक्ष विकल्प खड़े करने का नायाब तरीका अपनाया है। ब्रिक्स के यह साझा प्रयास इस बात का भी संकेत हैं कि अब विश्व एक ध्रुवीय नहीं रह गया है। यह स्थिति अमेरिका की दादागिरी पर अंकुश लगाएगी और वह अपना आर्थिक एजेंडा खासतौर से पूरब के देशों पर नहीं थोप पाएगा।

दरअसल, अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों की साझा पहल के चलते, अब से 70 साल पहले विश्व बेंक की बुनियाद रख दी गई थी। यह पहल 44 देशों ने मिलकर की थी। अमेरिका के न्यू हैंपशर नगर में विश्व-बैंक के साथ अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोश की भी स्थापना की गई थी। कालांतर में विश्व-बैंक और आईएमएफ अमेरिका को बड़ी और प्रभावशाली शक्ति के रूप में उभारा। अमेरिका और पश्चिमी देश इन संस्थाओं की ताकत का कूटनीतिक इस्तेमाल भी करते रहे हैं। गरीबी, शिक्षा और स्वास्थ्य मदों में विकासशील देशों को ब्याज मुक्त कर्ज देने के बहाने अमेरिका अपना आर्थिक एजेंडा भी विकासशील देशों पर थोपता रहा है। ब्याज मुक्त त्रृण में कुटिल चालाकी यह होती है कि यूरोपीय देश इस धन की वसूली डॉलर की वर्तमान दरों में करते हैं। हम सभी जानते हैं कि रूपए की तुलना डॉलर में लगातार उछाल आता रहता है। इस वजह से इस वजह से बेंक ब्याज की अंतरराष्ट्रीय मानक दरों से कहीं ज्यादा ये देश धन वसूल लेते है। अब दो साल बाद जब बिक्स बैंक वजूद में आ जाएगा तो ब्रिक्स के सदस्य देश अमेरिकी साहूकारी की इन इकतरफा शर्तों द्वारा किए जाने वाले आर्थिक षोशण से बचेंगे। इस नए बैंक की भूमिका में विकासशील देशों को ढांचागत परियोजनाओं के साथ शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाने के लिए कर्ज मिलेगा। यह बैंक प्राकृतिक आपदाओं के समय आकस्मिक निधि से भी प्रभावित देशों को धन उपलब्ध कराएगा। जाहिर है, वैश्विक अर्थव्यस्था दो धु्रवों पर केंद्रित हो जाने के कारण यूरोपीय देशों का रूख भी लाचीला होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पड़ोसी और एशिआई देशों से मधुर संबंध बनें, इस दृष्टि से प्रारंभ से ही सोच-समझकर एक-एक कदम आगे बढ़ा रहे हैं। अपने शपथ-समारोह के दौरान उन्होंने सभी सार्क देशों को आमंत्रित करके एक कूटनीतिक चाल चली थी। फिर मोदी ने अनेक यूरोपीय देशों के आमंत्रण के बावजूद बेहद छोटे से पड़ोसी देश भूटान को पहली विदेश यात्रा के लिए चुना। और अब बहुपक्षीय बातचीत के लिए ब्राजील को चुनकर ब्रिक्स देशों ने ब्रिक्स बैंक की स्थापना के सिलसिले में जो सफलता प्राप्त की है, उसमें मोदी के नेतृत्व कौशल और निर्णयात्मक क्षमता की अह्म भूमिका रही है। मोदी की नेतृत्व शक्ति इसलिए देखने में आई, क्योंकि वे मनमोहन सिंह की तरह अमेरिका के प्रभामंडन से न तो सम्मोहित हैं और न ही भौंचक्के। क्योंकि जब आप किसी व्यक्ति या शक्ति के अतिरिक्त प्रभाव में आ जाते हैं तो आप हीनता बोध से ग्रसित होकर अपना विवेक और आत्मविश्वास खोने लग जाते हैं। अंग्रेजी में संपूर्ण दक्ष नहीं होने के बावजूद मोदी ने न केवल अपने आत्मविश्वास को कायम रखा, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान की अहमियत बनाए रखते हुए भारत से कहीं ज्यादा शक्तिशाली देश रूस और चीन के प्रमुखों से पेश आए। राष्ट्र बोध का यह मनोविज्ञान कालांतर में भी उन्हें सफलता के शिखर की और बढ़ाता रहेगा।

ब्रिक्स देशों की अहमियत इसलिए भी है, क्योंकि ये सभी देश उभरती अर्थव्यस्था से जुड़े हैं। दुनिया की 40 फीसदी आबादी इन्हीं देशों में है। इनका संयुक्त सकल घरेलू उत्पाद 24 हजार अरब डॉलर है। इनकी समान महत्वकाक्षांए और चुनौतियां हैं। लिहाजा इन देशों के साझा प्रयास वैश्विक आर्थिक वृद्धि, शांति व स्थिरता में भी अह्म भूमिका निभाएंगे। इन लक्ष्यों की पूर्ति इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि मौजूदा परिवेश में दुनिया के कई हिस्सों में राजनीतिक अस्थिरता हिंसक टकराव, विवाद और मानवीय संकट बढ़ रहे हैं। कई सशस्त्र आतंकवादी गुटों ने सीधे सेनाओं को चुनौती देना शुरू कर दी है। इराक, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, इजराइल, यूक्रेन, मलेशिया और फिलीस्तान ऐसे ही संकटों से जूझ रहे हैं। तय है, बिक्स देशों का शांति और स्थिरता का संकल्प आपस में झगड़ रहे देशों में शांति की पहल भी करेगा।

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का विषय ‘समावेशी वृद्धि और टिकाऊ विकास‘ रखा गया था। इसी क्रम में सभी देशों ने संयुक्त राष्ट्र वैश्विक आतंकवाद रोधी रणनीति को अपनाने के प्रति प्रतिबद्धता जताई। वर्तमान परिदृष्य में सूचना तकनीक का बड़ा महत्व है। इसलिए सूचना व संचार प्रौद्योगिकी के जरिए सतत आर्थिक विकास व सामाजिक समावेश को बढ़ावा देने का संकल्प भी लिया। इसी सिलसिले में नवोन्मेश व आइसीटी शोध विकास को बढ़ावा दिया जाएगा, जिससे नौजवान प्रतिभाएं अपने देश में ही रहकर लघु व माध्यम स्तर के उपक्रमों को गतिशीलता प्रदान कर सकें, जो विकसित देश इलेक्ट्रोनिक निगरानी के जरिए विकासशील देशों की जासूसी में लगे हैं, उनकी निंदा की गई।

बावजूद ऐसा नहीं है कि ब्रिक्स देशों का सफर निष्कंटक जारी रहेगा। क्योंकि सम्मेलन के दौरान चीन और दूसरे देशों के बीच मतभेद देखने में आए। चीन इस बात पर अड़ा रहा कि नए बैंक और आकस्मिक कोष में वह ज्यादा भागीदारी करेगा, जिससे बैंक प्रबंधन में उसका अमेरिका की तरह प्रभुत्व रहे। लेकिन दूसरे देश चीन की यह शर्त मानने को राजी नहीं हुए। फिर भी चीन 41 अरब डॉलर की राशि बैंक में लगाने के साथ, इसका मुख्याल चीन की आर्थिक राजधानी शंघाई ले जाने में सफल रहा। बैंक में भारत, ब्राजील और रूस 18-18 अरब डॉलर की अंशपूंजी लगाएंगे, जबकि दक्षिण अफ्रीका पांच अरब डॉलर लगाएगा। चीन इसलिए भी अपने निर्णय थोपने में समर्थ है, क्योंकि ब्रिक्स देशों का जितना घरेलू उत्पाद है, उसमें 70 फीसदी की भागीदारी चीन की है। इतना जरूर है, एक सौ अरब की शुरूआती पूंजी वाले इस बैंक का पांच साल के लिए प्रमुख किसी भारतीय को बनाया जाएगा। इसके बाद रूस, ब्राजील और अफ्रीका का नंबर है। इस बैंक के आस्तित्व में आने से एक तो पष्चिमी देशों की मनमानी खत्म होगी, दूसरे वैश्विक अर्थव्यस्था में संतुलन की शुरूआत होगी। तीसरे, ब्रिक्स देशों में घरेलू रोजगार, उद्योग और विनिर्माण क्षेत्र मजबूत होंगे।

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