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डॉ.अमित प्रताप सिंह

 

समय के साथ साथ दिन प्रतिदिन सरकारी कामकाज में तकनीक का प्रयोग बढ़ता जा रहा है, खासतौर से जब से प्रधानमंत्री जी ने डिजिटल इंडिया का नारा बुलंद किया है तब से तो जिसे देखो वो बिना कुछ आगे-पीछे सोचे ई-गवर्नेंस, एम-गवर्नेंस के नाम पर नित नया ज्ञान बाँट रहा है. इसी क्रम में सरकारें भी बिना सोचे समझे नित नई वेबसाइट्स और मोबाईल एप्स जारी करती जा रही हैं. ठीक भी है, देश के भ्रष्ट तंत्र में तकनीक का समावेश ही शायद भ्रष्टाचार पर कुछ हद तक काबू पा सकेगा पर असलियत में वर्तमान में तकनीक के नाम पर शासन व्यवस्था में हो रहे नित नए प्रयोग ही सरकारी कर्मचारियों व जनता के गले की फांस तथा भ्रष्टाचार के केंद्र बिंदु बने हुए हैं. तकनीकी मामलों में भारतीय कानून अभी बहुत ज्यादा स्पष्टता लिए हुए नहीं हैं इसी कारण से इस सम्बन्ध में वृहद स्तर पर दिशा-निर्देश बनाये जाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है. वर्तमान में तकनीक के उपयोग के नाम पर कहाँ क्या गलत हो रहा है, यह मुद्दा तो बहस से ही बाहर है.

देश-विदेश में व्यापमं घोटाले के लिए बदनाम हुए मध्य प्रदेश की सरकार भी अपनी छवि सुधारने के लिए जोर-शोर से सरकारी कामकाज में तकनीक का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करने की राह पर अग्रसर है. केवल स्कूल शिक्षा विभाग को ही देखें तो स्कूलों की अनुमति से लेकर छात्रवृत्ति आदि से सम्बंधित समस्त कार्य वेव पोर्टल्स के जरिये ऑनलाइन करने के दावे किये जाने लगे हैं.

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा शिक्षकों से काम करवाने व स्कूलों में शिक्षा की स्थिति सुधरने के नाम पर ‘शिक्षा मित्र’ नाम के एक मोबाईल एप का प्रयोग प्रारंभ किया गया है जो जारी होने के दिन से ही विवाद का विषय है, सही मायने में यह किसी लिहाज से उचित कहा भी नहीं जा सकता.

सरकार द्वारा मोबाईल सन्देश और ‘शिक्षा मित्र’ मोबाईल एप के माध्यम से शिक्षकों की उपस्थिति दर्ज करने के नाम पर शिक्षकों की लोकेशन ट्रेक की जाती है. अभी इस व्यवस्था की सफलता-असफलता व प्रभावों का निर्णय होना बाक़ी है पर शिक्षकों में यह विवाद का विषय अवश्य है.

भारत में व्यक्ति की निजता को लेकर कानूनी तौर पर अस्पष्टता जरूर है पर फिर भी जबरदस्ती किसी भारतीय नागरिक की व्यक्तिगत जानकारी प्राप्त करना व उस पर निगरानी करना भारतीय संविधान के द्वारा भारतीय नागरिक को धारा 19 तथा 21 में दिए गए स्वतंत्रता के प्रावधानों के विपरीत दिखाई देता है. भारत का संविधान सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में भी बिना पक्के सबूत व सक्षम अधिकारी की अनुमति के किसी नागरिक की निगरानी की अनुमति नहीं देता.

भले ही सरकारें कुछ भी सोचती हों पर यदि किसी व्यक्ति की अनुमति के बिना उसकी निजता में हस्तक्षेप किया जा रहा हो तो क्या सच में यह स्वतंत्रता कहलाएगी? हाल ही में एक मामले में सर्वोच्च न्यायलय भारतीय नागरिकों के ‘निजता के अधिकार’ के मामले में केंद्र सरकार को फटकार भी लगा चुका है तथा इस आशय को परिभाषित करने के लिए ‘निजता के अधिकार’ का मुद्दा सर्वोच्च नयायालय की पाँच सदस्यीय बेंच के पास विचाराधीन है.

अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए दूसरों पर ऐसे नियम नहीं लादे जा सकते जिनसे उनकी स्वतंत्रता प्रवाभित होती हो. व्यवस्था सुधारना भी आवश्यक है पर इसके लिए किसी को बलि का बकरा तो नहीं बनाया जा सकता. सरकारी मशीनरी के बड़े-बड़े कक्षों में एयर कंडीशनर चलाकर अठारह डिग्री की ठंडक में बैठे लोग गाँव की हकीकत भूल गए हैं उन्हें गांवों में लाना पड़ेगा, उनकी जिम्मेदारियां तय करने के  साथ ही असफलता के लिए सख्त सजा का प्रावधान लाना पड़ेगा. तकनीक का प्रयोग इसके लिए करना पड़ेगा, सबकुछ स्वतः ही नहीं चलता रह सकता.

शिक्षक समाज का सबसे सम्माननीय सदस्य होता है, होना भी चाहिए. शिक्षक के हाथ में देश का भविष्य होता है. शिक्षक को सम्मान मिलना ही चाहिए. कुछ गलत लोगों के लिए आप सभी को दोषी नहीं ठहरा सकते. सरकार को अपनी मानसिकता बदलने की आवश्यक्ता है. ‘सभी चोर हैं’ की मानसिकता के साथ देश का भला नहीं कर सकते. यदि गांवों के लिए कुछ करना ही है तो गाँव आना ही पड़ेगा और अंततः ‘जन-जाग्रति’ ही सर्वोत्तम उपाय है.

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1 Comment on "शिक्षा मित्र या शिक्षा शत्रु?"

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राजेन्‍द्र बंधु
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राजेन्‍द्र बंधु

लेकिन शिक्षा मित्र का आर्थिक बोझ शिक्षकों पर क्‍यों डाला जा रहा है। इन्‍दौर में होईकोर्ट द्वारा ई अडेंटेंस को एच्छिक होने के आदेश के बावजूद प्रशासनिक अधिकारियों ने डरा-धमकाकर शिक्षकों को एनराईड मोबाईल खरीदने के लिए विवश किया। आदेश देने वाले हाईकोर्ट ने भी सुमोटो नहीं लिया, जबकि एच्छिक का आदेश उसी का था। अब शिक्षा मित्र के लागू होने पर हर महीने इंटरनेटर के बिल को भी बोझ आएगा। सरकार का यह अधिकार है कि वह कोई भ्‍ाी व्‍यवस्‍था लागू करें, लेकिन उसका व्‍यय सरकार को ही करना चाहिए।

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