लेखक परिचय

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

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bad-teacherजरूरी है स्वायत्तता, सम्मान और विश्वास

-संजय द्विवेदी

किसी देश या समाज की सफलता दरअसल उसकी शिक्षा में छिपी होती है। भारत जैसे देश का दुनिया में लंबे अरसे तक डंका बजता रहा तो इसका कारण यहां की ज्ञान परंपरा ही रही है। आज हमारी शिक्षा व्यवस्था पर चौतरफा दबाव हैं। हम सब अभिभावक, शिक्षक और प्रशासन तीनों भूमिकाओं में खुद को विफल पा रहे हैं। देश के बुद्धिजीवी इन सवालों को उठाते तो हैं पर समाधान नहीं सुझाते। बाजार का रथ लगता है, पूरी शिक्षा को जल्दी अपने अश्वमेघ का हिस्सा बना लेगा। ज्ञान, विज्ञान और चरित्र हमारे जीवन दर्शन में शिक्षा का आधार रहा है। हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा, समग्र ज्ञान से बने जीवन दर्शन पर आधारित है। लेकिन हम देख रहे हैं कि हमारी पीढियां फैक्ट्री जैसी शिक्षा पाने के लिए विवश हैं। आज उन्हें ‘कीमत’ तो पता है पर ‘मूल्य’ को वे नहीं जानते।

हमारे देश का आदर्श ग्लोबलाइजेशन नहीं हो सकता। वसुधैव कुटुम्बकम् ही हमारी वास्तविक सोच और वैश्विक सोच को प्रगट करता है। हम अपनी ज्ञान परंपरा में सिर्फ स्वयं का नहीं बल्कि समूचे लोक का विचार करते हैं। शिक्षा से मुनाफा कमाने की होड़ के समय में हमारे सारे मूल्य धराशाही हो चुके हैं। पहले भी शिक्षा का व्यवसायिक चरित्र था किंतु आज शिक्षा का व्यापारीकरण हो रहा है। एक दुकान या फैक्ट्री खोलने की तरह एक स्कूल डाल लेने का चलन बढ़ रहा है, जबकि यह खतरनाक प्रवृत्ति है।

वैसे भी जो समाज व्यापार के बजाए शिक्षा से मुनाफा कमाने लगे उसका तो राम ही मालिक है। हमारे ऋषियों-मुनियों ने जिस तरह की जिजीविषा से शिक्षा को सेवा और स्वाध्याय से जोड़ा था वह तत्व बहुलतः शिक्षा व्यवस्था और तंत्र से गायब होता जा रहा है। इस ऐतिहासिक फेरबदल ने हमारे शिक्षा जगत से चिंतन, शोध और अनुसंधान बंद कर दिया है। पश्चिम के दर्शन और तौर-तरीकों को स्वीकार करते हुए अपनी जड़ें खोद डालीं। आज हम न तो पश्चिम की तरह बन पाए, न पूरब का सत्व और तेज बचा पाए। इसका परिणाम है कि हमारे पास इस शिक्षा से जानकारी और ज्ञान तो आ गई पर उसके अनुरूप आचरण नहीं है। जीवन में आचरण की गिरावट और फिसलन का जो दौर है वह जारी है। यह कहां जाकर रूकेगा कहा नहीं जा सकता। भारतीय जीवन मूल्य और जीवन दर्शन अब किताबी बातें लगती हैं। उन्हें अपनाने और जीवन में उतारने की कोशिशों बेमानी साबित हो रही हैं।

सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले संगठनों के कई प्रवक्ता कहते हैं ‘परमवैभव’ ही हमारा ‘विजन’ है। किंतु इसके लिए हमारी कोशिशें क्या हैं। विश्व में जो श्रेष्ठ है, सर्वश्रेष्ठ है-विश्व मानवता को उसे मिलना ही चाहिए। एक नए भारत का निर्माण ही इसका रास्ता है। वह कैसे संभव है जाहिर तौर पर शिक्षा के द्वारा। इंडिया को भारत बनाने की कठिन यात्रा हमें आज ही शुरू करनी होगी। जनमानस जाग चुका है। जगाने की जरूरत नहीं है। नई पीढ़ी भी अंगड़ाई लेकर उठ चुकी है। वह संकल्पबद्ध है। अधीर है, अपने सामने एक नया भारत गढ़ना और देखना चाहती है। वह एक ऐसे भारत का निर्माण करना चाहती है, जिसमें वह स्वाभिमान के साथ अपना विकास कर सके। सवाल उठता है कि फिर बाधक कौन है। जाहिर तौर हम, हमारी परंपरागत व्यवस्थाएं, गुलामी के अवशेष, पुरानी पीढ़ी की सोच, धारणाएं, विचारधाराएं इस परिवर्तन की बाधक हैं। आजादी के पहले जो कुछ हुआ उसके लिए हम लार्ड मैकाले को कोसते रहते हैं किंतु इन सात दशकों में जो घटा है उसका दोष किस पर देगें? एक स्वाभिमानयुक्त भारत और भारतीयों का निर्माण करने के बजाए हमने आत्मदैन्य से युक्त और परजीवी भारतीयों का निर्माण किया है। इन सात दशकों के पाप की जिम्मेदारी तो हमें ही लेनी होगी। सच्चाई तो यह है कि हमारे आईटीआई और आईआईएम जैसे महान प्रयोग भी विदेशों को मानव संसाधन देने वाले संस्थान ही साबित हुए। बाकी चर्चा तो व्यर्थ है।

किंतु समाज आज एक नई करवट ले रहा है। उसे लगने लगा है कि कहीं कुछ चूक हुयी है। सर्वश्रेष्ठ हमारे पास है, हम सर्वश्रेष्ठ हैं। किंतु अचानक क्या हुआ? वेद, नाट्यशास्त्र, न्यायशास्त्र, ज्योतिष और खगोल गणनाएं हमारी ज्ञान परंपरा की अन्यतम उपलब्धियां हैं पर फिर भी हम आत्म दैन्य से क्यों भरे हैं? देश में स्वतंत्र बुद्धिजीवियों का अकाल क्यों पड़ गया? एक समय कुलपति कहता था तो राजा उसकी मानता। कुलगुरू की महिमा अनंत थी। आज दरबारों में सिर्फ दरबारियों की जगह है। शिक्षा शास्त्रियों को विचार करना होगा कि उनकी जगह क्यों कम हुयी? साथ ही उन्हें गरिमा की पुर्नस्थापना के सचेतन प्रयास करने होगें। विश्वविद्यालय जो ज्ञान के केंद्र हैं और होने चाहिए। वे आज सिर्फ परीक्षा केंद्र बनकर क्यों रह गए हैं? अपने परिसरों को ज्ञान,शोध और परामर्श का केंद्र हम कब बनाएंगे? विश्वविद्यालय परिसरों की स्वायत्तता का दिन प्रतिदिन होता क्षरण, बढ़ता राजनीतिकरण इसके लिए जिम्मेदार है। स्वायत्तता और सम्म्मान दोनों न हो तो शिक्षा क्षेत्र में होने के मायने भी क्या हैं? कोई भी विश्वविद्यालय या परिसर स्वायत्तता, सम्मान और विश्वास से ही बनता है। क्या ऐसा बनाने की रूचि शिक्षाविदों और ऐसे बनने देने की इच्छाशक्ति हमारे राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र में है।

 

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