लेखक परिचय

श्याम नारायण रंगा

श्याम नारायण रंगा

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श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’

वर्तमान शिक्षा प्रणाली पूरे देश में एक चिंता का विषय बनी हुई है। कोई व्यक्ति इसके पक्ष में अपनी राय प्रकट कर सकता है तो कोई विपक्ष में अपने विचार रख सकता है लेकिन इन सब तथ्यों और बातों पर गौर किया जाए तो एक बात तो तय है कि सारे व्यक्ति व संस्थाएँ वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में बदलाव तो अवश्य ही चाहते हैं। उस बदलाव का स्वरूप कैसा हो इस पर अलग अलग राय हो सकती है। हमारी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था कैसे नागरिकों का निर्माण कर रही है और कैसी व्यवस्था बना रही है यह अब सबके सामने है। आजादी के बाद हमारी शिक्षा व्यवस्था ने जो कुछ भी दिया है आज वही सब कुछ हमारे सामने नजर आ रहा है। अगर देश में भ्रष्टाचार है, अलगाववाद है, आतंकवाद है, जातिवाद है या कोई और समस्या है तो इन सब के मूल में शिक्षा व्यवस्था ही है। एक बच्चा शिक्षा से ही नागरिक बनता है और आदमी बनता है। भगवान उसको पैदा करता है मिट्टी की तरह या यूं कहे कोरे कागज की तरह और अब इस मिट्टी को क्या और कैसा स्वरूप देना है या इस कागज पर क्या लिखना है, इसकी पूरी जिम्मेदारी हमारी शिक्षा व्यवस्था की है।

 

यह जानकर आश्चर्य होता है कि विष्व के सबसे बड़े लोकतंत्र व दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश के पास एक भी ऐसा शिक्षण संस्थान नहीं है जिसकी गिनती विश्व स्तर पर तो क्या एशिया स्तर पर भी करवाई जा सके। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि बड़ी आबादी वाले इस देश में स्तरीय शिक्षा का अभाव है और यही कारण है कि हमारा देश बेरोजगारी व भूखमरी जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है तथा भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबा है। शिक्षा के स्तर में सुधार के लिए यशपाल समिति या ज्ञान आयोग की रिपोर्ट तो कभी की आ चुकी है और उनमें बताए गए तथ्य भी चिंता जनक है और इससे स्पष्ट होता है कि शिक्षा के स्तर को सुधारने की अब बेहद आवष्यकता है।

 

यह बात आज बड़ी अजीब लगती है कि हमारे देश में पाँचवी कक्षा से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन व प्रोफेशनल डिग्रीयों तक की व्यवस्था में पढ़ाने का एक ही तरीका काम में लिया जाता है। वही एक घण्टा चपरासी लगाता है और एक की जगह दूसरा शिक्षक आता है तथा पैंतालीस मिनट की अपनी नौकरी पूरी करके चला जाता है। क्या पाँचवीं कक्षा की शिक्षा पध्दति में व उच्च स्तर की शिक्षा व्यवस्था में कोई फर्क नहीं होना चाहिए। क्या पाँचवीं के विद्यार्थी में और अधिस्नातक के शोधार्थी में कोई फर्क नहीं है। वर्तमान में यहाँ पर बदलाव के नाम पर यही नजर आता है कि एक संस्था विद्यालय कहलाती है और संस्था महाविद्यालय। परन्तु इनमें महा जैसा कोई अर्थ स्पष्ट होता नजर नहीं आता है। इस व्यवस्था में कोई ऐसा सुधार किया जाए ताकि इन दोनों ही स्तरों पर एक स्तरीय भेद किया जा सके और वो भेद ऐसा हो कि दोनों ही स्तरों पर शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ावा मिले। विद्यालय व महाविद्यालय और विश्वविद्यालय ये सब शिक्षा के साथ साथ मनुष्य निर्माण के भी केन्द्र बने और यहाँ से अच्छे और सुधी नागरिक निकले ताकि एक मजबूत और समर्थ भारत का निर्माण किया जा सके।

 

वर्तमान में अगर हम स्कूलों की बात करे तो स्थितियाँ बहुत गंभीर नजर आती है। अध्यापकों का यह कहना है कि छात्र पढ़ना नहीं चाहता है, छात्र नियमित तौर पर स्कूल में नहीं आता है जबकि दूसरी ओर अभिभावकों का यह कहना है कि स्कूलों में छात्रों पर व उनकी पढ़ाई पर गौर नहीं किया जाता है। जहाँ सरकारी स्कूलों के प्रबंधन से अभिभावक नाराज है वहीं प्राईवेट स्कूलों की फीस व्यवस्था व दादागिरी से अभिभावकों को परेशानी होती है। कुल मिलाकर नुकसान छात्रों का हो रहा है। यह समझने की जरूरत है कि छात्र एक कोरा कागज है आप उस पर जो और जैसा लिखेंगे वह वैसा ही लिखा जाएगा। जहाँ अध्यापकों को अपने कत्तव्यों के प्रति निष्ठावान होना पड़ेगा वहीं अभिभावकों को भी अपने घर व समाज में शिक्षा का एक सौहार्दपूर्ण माहौल पैदा करना होगा। राज्य व केंद्र सरकारें भले कैसी भी समितियाँ बनाएँ या कोई भी उपाय कर ले जब तक शिक्षक , अभिभावक व विद्यार्थी के मध्य समन्वय नहीं होगा तब तक शिक्षा के स्तर को सुधारा नहीं जा सकता। हालात यह है कि आज विद्यार्थी व शिक्षक के मध्य एक बड़ा गैप हो गया है और दोनों के बीच में संवादहीनता की जबरदस्त स्थिति बनी हुई है। कईं शिक्षकों से बात करने पर यह बात खुल कर सामने आती है कि शिक्षकों का यह मानना है कि विद्यार्थी को ज्यादा नजदीक नहीं आने देना चाहिए क्योंकि इससे वह सिर चढ़ जाता है। और इस कारण दोनों के बीच में एक खाई बन गई है। जब तक यह मानसिकता रहेगी विद्यार्थी शिक्षकों से कुछ सीख नहीं पाएगा और न ही शिक्षक विद्यार्थीयों को कुछ दे पाएंगे।

 

एक जमाना वह था जब गुरू को माता पिता से भी बड़ा दर्जा प्राप्त था और गुरू की कही बात को इन्कार करने की हिम्मत माता पिता की नहीं होती थी। ऐसा इसलिए था क्योंकि अभिभावकों को शिक्षकों पर पूरा विश्वास था तथा वह शिक्षक भी अपने उत्तरदायित्वों को लेकर पूरी तरह सजग था। इसी का परिणाम था कि बिना केल्कुलेटर व कम्प्यूटर के बड़ी बड़ी गिनतियाँ वो लोग सैकण्डों में हल कर दिया करते थे और उस समय के हिसाब से एक स्तरीय शिक्षा विद्यार्थी को प्राप्त होती थी। मतलब यह कि स्तरीय शिक्षा समितियाँ बनाने से या सिफारिशें करने भर से नहीं आएँगी, इनके जो घटक तत्व है उनको मजबूत करना होगा। उस जमाने में गुरू शिष्य के बीच आगाढ़ प्रेम के संबंध होते थे और गुरू शिष्य को पुत्रवत् स्नेह देता था और इसी का परिणाम था कि उस दौर में अच्छे व राष्ट्रभक्त नागरिकों का निर्माण होता था।

 

एक तथ्य यह भी है कि शिक्षा के व्यावसायिकरण ने शिक्षा व्यवस्था के माहौल को खराब कर रखा है। टयूषन प्रवृत्ति इसी की कोख से निकला परिणाम है। व्यावसायिकरण ने विद्यार्थी को ग्राहक व शिक्षक को दुकानदार बना दिया है। यहाँ शिक्षा के बाजार में दुकानदार ग्राहक के सामने लुभावनी व मनभावन स्कीमें रखता है और ग्राहक को आकर्षित कर अपना उत्पाद बेचने का प्रयास करता है। हमारी संस्था में एयरकंडीशनर लगा है भव्य बिल्डिंग है तथा आलीशान पुस्तकालय है जैसे जुमले इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है। हालात यहाँ तक बिगड़े हुए हैं कि जो छात्र अपने अध्यापक के टयूशन जाता है उसे प्रेक्टिकल में अच्छे नम्बर दिए जाते हैं और जो छात्र ऐसी टयूशन नहीं कर पाते उन्हें कम नम्बरों की सजा दी जाती है। ऐसे भी उदाहरण हमारे सामने आते हैं कि जहाँ शिक्षक स्कूलों व कॉलेजों में जाते ही इसलिए हैं कि उन्हें टयूशन रूपी व्यवसाय में कच्चा माल आसानी से प्राप्त हो जाए। अध्यापक अपने टयूशन सेंटर पर तो पूरे मनोयोग व मेहनत से पढ़ाते हैं लेकिन वो जज्बा स्कूलों के लिए नहीं दिखता है, स्पष्ट है कि अगर वह सारा कुछ स्कूलों में ही दे देंगे तो अपने टयूशन सेंटर पर क्या दे पाएंगे। टयूशन के इस कारोबार से षिक्षा की गुणवत्ता में कमी आई है। ऐसे मामले भी देखने में आते हैं कि अगर एक छात्र पाँच या सात छात्रों को अपने प्रयासों से प्रवेश दिलाता है तो उस छात्र की फीस माफ कर दी जाती है। वास्तव में ऐसे हालत काफी चिंताजनक है ओर ऐसे हालातों ने ही स्कूलों व कॉलेजों को शो रूम बनाकर रख दिया है।

 

यहाँ मेरा मतलब यह कदापि नहीं है कि षिक्षा का व्यावसायिकरण न हो लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि शिक्षा का क्षेत्र सामाजिक सरोकारों से जुड़ा हुआ है जहाँ चरित्र निर्माण होता है और इसी से राष्ट्र निर्माण होता है। अत: इस व्यावसायिकरण का अंदाज ऐसा हो कि राष्ट्र निर्माण में किसी प्रकार की बाधा न आए । जहाँ तक व्यवसाय की बात है तो व्यवसाय की भी अपनी कुछ नैतिकताएँ व नीतियाँ होती है और उनका पालन किया जाना जरूरी होता है, तो शिक्षा समितियों व आयोगों के माध्यम से ऐसे उपायों की खोज की जाए कि एक शिक्षक अपना सर्वश्रेष्ठ स्कूलों में ही विद्यार्थियों को प्रदान कर दे और उन्हें टयूशन की बजाय सिर्फ मार्गदर्शन की आवश्यकता हो। और हमारे देश की स्कूलों व कॉलेजों से स्नातकों के साथ जिम्मेदार व समझदार नागरिक भी निकलें। ऐसे उपायों की खोज की जानी अत्यन्त आवश्यक है जिससे शिक्षा के व्यावसायिकरण में सामाजिक व राष्ट्रीय उत्तरदायित्व की भावना को प्रधानता मिले व एक गुणात्मक परिणाम समाज व राष्ट्र को प्रदान किया जाए ।

 

अगर हम कॉलेज व विश्वविद्यालयों की बात करे तो हालात और भी बिगड़े नजर आते है। आज हमारे देश में महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों की कक्षाओं में उपस्थिति गौण नजर आती है। छात्र कक्षाओं में बैठना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। यहाँ तक आते आते छात्र व शिक्षक के बीच का संवाद लगभग समाप्त हो चुका होता है। जहाँ छात्र कक्षाओं में बैठते नहीं है वहीं उनके शिक्षक भी उन्हें इस बात के लिए समझाते नजर नहीं आते। प्राध्यापकों का यह मानना है कि कक्षा में कौन छात्र बैठता है और कौन नहीं बैठता है इससे उन्हें कोई मतलब नहीं है। अगर एक छात्र भी आए तो हम उन्हें पढ़ा देंगे लेकिन अगर दूर खड़ा देख रहा है तो उसे आवाज नहीं लगाएंगे। होना यह चाहिए कि महाविद्यालय का शिक्षक छात्र को समझाएँ व उसे सही राह बताए कि उसके लिए कक्षा में बैठना कितना जरूरी है। इस सारे माहौल का परिणाम यह हुआ कि छात्र परीक्षा के दिनों में महत्वपूर्ण प्रश्न ढूँढ़ते फिरते हैं तथा दस बारह प्रश्नों के उत्तर रट कर याद कर लेते हैं और उसी से उनकी नैया पार हो जाती है और इस तरह त्रिवर्षीय डिग्री कोर्स पैंतीस तीस प्रश्नों को याद करके ही पूरा कर लिया जात है। ऐसी स्थिति में गुणात्मक शिक्षा की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

 

वहीं दूसरी और बड़े पैमाने पर शिक्षा के निजीकरण ने आग में घी डालने का काम किया है । निजीकरण रूपी इस हाथी पर सरकार का अंकुष ही नहीं रहा है जिससे यह मदमस्त होकर शिक्षा का बेड़ा गर्क करने में लगा हुआ है। इस पर अंकुश की निहायत आवश्यकता है। निजी क्षेत्र में महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों की बाढ़ सी आ रही है। ये विश्वविद्याल व महाविद्यालय ज्ञान के केन्द्र होने के बजाय डिग्रीयाँ बेचने के केन्द्र के रूप में उभर रहे है। यहाँ छात्रों से मोटी रकम फीस के नाम पर वसूली जाती है और उन्हें मुंह मागी डिग्रीयॉ उपलब्ध करवाई जा रही है। ऐसे कईं विश्वविद्यालयों के उदाहरण आए दिन सामने आ रहे है। सरकार के हुक्मरानों से ये बात छिपी नहीं है लेकिन निजीकरण की अधी दौड़ में इन पर अंकुश रखने के उपाय इन्हें भी या तो नजर नहीं आ रहे है या जानबूझकर नजरअंदाज किए जा रहे है और ये भी एक बात है कि बहुत से महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के मालिक ये ही हूक्मरान है। निजी महाविद्यालयों में खुले आम छात्रों को नकल करवाई जाती है ताकि महाविद्यालय का परिणाम श्रेष्ठ रहे और ज्यादा से ज्यादा एडमिशन अगले साल महाविद्यालय को मिले। छात्र भी इन महाविद्यालयों में प्रवेष इसी कारण लेते हैं कि परीक्षा के दिनों में उन्हें ज्यादा मेहनत न करनी पड़े। अभिभावक इन तथ्यों को जानकर भी परिस्थितियों से समझौता कर रहे हैं ताकि लाडले की अंकतालिका अच्छी बनी रहे। ऐसी स्थिति में कैसे भारत निर्माण व विकास की बात की जा सकती है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि बड़ी संख्या तो छात्र स्नातक व अधिस्नातक तो हो रहे है लेकिन उनमें स्तरीय ज्ञान का अभाव होता है।

 

कुल मिलाकर पूरे परिदृश्य पर नजर डाले तो हालात भयंकर ही लगते हैं। इन पर सिर्फ सरकारी प्रयासों या समितियों या सिफारिशों से ही नियंत्रण नहीं किया जा सकता जब तक आम आदमी का राष्ट्रीय चरित्र व नैतिक चरित्र ऊंचा नहीं उठेगा तब तक स्थितियाँ और विकट होगी । जरूरत है ऐसा माहौल पैदा करने की ताकि प्रत्येक शिक्षार्थी, शिक्षक , व अभिभावक के मन में नैतिक मूल्यों का विकास हो और भारतीय चरित्र निर्माण की उत्कंठ इच्छा हो। अगर ऐसा हो गया तो हमें किसी अन्ना हजारे की जरूरत नहीं होगी या किसी आंदोलन की जरूरत नहीं होगी, इस देश की सारी समस्याएँ अपने आप ही मिट जाएगी और राष्ट्र के जिम्मेदार नागरिकों को यह अहसास होगा कि पहले देश है फिर परिवार या खुद का व्यक्तित्व।

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3 Comments on "शिक्षा वही जो जिम्मेदार नागरिक बनाएँ"

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श्याम नारायण रंगा
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आपका धन्यवाद् की आपने मेरा लेख पसंद किया और आप इससे सहमत है और उम्मीद है आगे भी आप लोगो के होस्लाफजई मिलती रहेगी आप लोगो का ye pyar hi है की mai आगे se आगे likhta rahta hu

ABHIMANUE SHRMA
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रंगा जी बहुत अच्छा लिखा है और इसके लिए आप बधाई के पात्र है. आप के लिखे हुए को पढने पर ये लगा की आज के हालातो का आपने सही चित्रण किया है और ऐसे हिम्मत दिखने के लिए आपको बधाई है और लगता है आप इन हालातो से रूबरू हो चुके है और धरातल पर आपको पकड़ ये साबित करती है की आप एक अच्छे लेखक तो है ही साथ ही साथ आपने साडी एस्थितियो को गौर से देखा और समजा है आपको ये भी पूछना चाहूँगा की एन हालातो से लड़ने पर आपके सामने जो समस्याए आती है… Read more »
दिवस दिनेश गौड़
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रंगा जी आपका लेख बहुत अच्छा लगा| शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की जरुरत है, मै भी इसे मानता हूँ| और आजकल तो कॉलेज शिक्षा का मंदिर न हो कर प्यार मोहब्बत का अड्डा बन गए हैं| पहले तो यह केवल बड़े बड़े शहरों में था किन्तु अब तो यह बिमारी छोटे शहरों में भी पहुँच गयी है| मै भी बीकानेर का मूल निवासी हूँ| अभी कुछ वर्षों से जयपुर में रह रहा हूँ| बीकानेर का मेडिकल कॉलेज देश में माना हुआ संस्थान है, साथ ही अभी कुछ वर्ष पहले शुरू हुए दोनों सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज भी उन्नति की और हैं|… Read more »
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